28 May 2022

कालीदास

कालिदास तीसरी- चौथी शताब्दी मेे गुप्त साम्राज्य के संस्कृत भाषा के महान कवि और नाटककार थे. उन्होंने भारत की पौराणिक कथाओं और दर्शन को आधार बनाकर रचनाएँ की और उनकी रचनाओं में भारतीय जीवन और दर्शन के विविध रूप और मूल तत्त्व निरूपित हैं. कालिदास अपनी इन्हीं विशेषताओं के कारण राष्ट्र की समग्र राष्ट्रीय चेतना को स्वर देने वाले कवि माने जाते हैं और कुछ विद्वान उन्हें राष्ट्रीय कवि का स्थान तक देते हैं. 
अभिज्ञानशाकुंतलम् कालिदास की सबसे प्रसिद्ध रचना है. यह नाटक कुछ उन भारतीय साहित्यिक कृतियों में से है जिनका सबसे पहले यूरोपीय भाषाओं में अनुवाद हुआ था. यह पूरे विश्व साहित्य में अग्रगण्य रचना मानी जाती है. मेघदूतम् कालिदास की सर्वश्रेष्ठ रचना है जिसमें कवि की कल्पनाशक्ति अपने सर्वोत्कृष्ट स्तर पर है और प्रकृति के मानवीकरण का अद्भुत वर्णन काव्य में दिखता है.

महर्षि वाल्मीकि

वाल्मीकि, संस्कृत रामायण के प्रसिद्ध रचयिता हैं जो आदिकवि के रूप में प्रसिद्ध हैं. उन्होंने संस्कृत मे रामायण की रचना की है. महर्षि वाल्मीकि द्वारा रची रामायण वाल्मीकि रामायण कहलाई. रामायण एक महाकाव्य है जो कि राम के जीवन के माध्यम से हमें जीवन के सत्य व कर्तव्य से, परिचित करवाता है. वाल्मीकि जी के जीवन से बहुत सीखने को मिलता हैं, उनका व्यक्तितव साधारण नहीं था. उन्होंने अपने जीवन की एक घटना से प्रेरित होकर अपना जीवन पथ बदल दिया, जिसके फलस्वरूप वे महान पूज्यनीय कवियों में से एक बने. यही चरित्र उन्हें महान बनाता हैं और हमें उनसे सीखने के प्रति प्रेरित करता हैं. 
वाल्मीकि जी का जन्म आश्विन मास की पूर्णिमा को हुआ था, इसी दिन को हिन्दू धर्म कैलेंडर में वाल्मीकि जयंती कहा जाता हैं. 

24 May 2022

भारतीय इतिहास




जम्बूद्वीप से अखंड भारत बनने और फिर टुकड़े-टुकड़े में खंडित होने की कहानी 

अखंड बोलना इसलिए पड़ता है क्योंकि सबकुछ खंड-खंड हो चला है. जम्बूद्वीप से छोटा है भारतवर्ष. भारतवर्ष में ही आर्यावर्त स्थित था. आज न जम्बूद्वीप है न भारतवर्ष और न आर्यावर्त. आज सिर्फ हिन्दुस्थान है और सच कहें तो यह भी नहीं. आओ जानते हैं भारतवर्ष के बनने की कहानी:

इंद्र के बाद व्यवस्थाएं बदली और स्वायंभुव मनु संपूर्ण धरती के शासन बने. उनके काल में धरती सात द्वीपों में बंटी हुई थी. जम्बू, प्लक्ष, शाल्मली, कुश, क्रौंच, शाक एवं पुष्कर. इसमें से जम्बू द्वीप सभी के बीचोबीच स्थित है. जिसमें से सिर्फ जम्बूद्वीप पर ही अधिकांश आबादी रहती थी. बाकी द्वीपों पर नाम मात्र के ही जीव रहते थे. स्वायंभुव मनु के बाद उनके पुत्र प्रियव्रत धरती के राजा बने. राजा प्रियव्रत ने विश्वकर्मा की पुत्री बहिर्ष्मती से विवाह किया था जिनसे आग्नीध्र, यज्ञबाहु, मेधातिथि आदि 10 पुत्र उत्पन्न हुए. प्रियव्रत की दूसरी पत्नी से उत्तम, तामस और रैवत ये 3 पुत्र उत्पन्न हुए, जो अपने नाम वाले मन्वंतरों के अधिपति हुए.

महाराज प्रियव्रत के 10 पुत्रों में से कवि, महावीर तथा सवन ये 3 नैष्ठिक ब्रह्मचारी थे और उन्होंने संन्यास धर्म ग्रहण किया था. राजा प्रियव्रत ने धरती का विभाजन कर अपने 7 पुत्रों को अलग-अलग द्वीप का शासक बना दिया. आग्नीध्र को जम्बूद्वीप मिला. वृद्धावस्था में आग्नीध्र ने अपने 9 पुत्रों को जम्बूद्वीप के विभिन्न 9 स्थानों का शासन का दायित्व सौंपा. जम्बूद्वीप के 9 देश थे- इलावृत, भद्राश्व, किंपुरुष, नाभि (भारत), हरि, केतुमाल, रम्यक, कुरु और हिरण्यमय. .इन 9 पुत्रों में सबसे बड़े थे नाभि जिन्हें हिमवर्ष का भू-भाग मिला. इन्होंने हिमवर्ष को स्वयं के नाम अजनाभ से जोड़कर अजनाभवर्ष प्रचारित किया. यह हिमवर्ष या अजनाभवर्ष ही प्राचीन भारत देश था. राजा नाभि के पुत्र थे ऋषभ. ऋषभदेव के 100 पुत्रों में भरत ज्येष्ठ एवं सबसे गुणवान थे. उनके नाम पर इस देश का नाम भरत पड़ा.

प्राचीनकाल में यह अखंड भारतवर्ष हिन्दूकुश पर्वत माला से अरुणाचल और अरुणाचल से बर्मा, इंडोनेशिया तक फैला था. दूसरी ओर यह कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी-श्रीलंका तक और हिन्दूकुश से नीचे सिंधु के अरब सागर में मिलने तक फैला था. यहां की प्रमुख नदियां सिंधु, सरस्वती, गंगा, यमुना, कुम्भा, ब्रह्मपुत्र, कृष्णा, कावेरी, नर्मदा, महानदी, शिप्रा आदि हैं. 16 जनपदों में बंटे इस क्षेत्र को भारतवर्ष कहते हैं. समुद्र के उत्तर तथा हिमालय के दक्षिण में भारतवर्ष स्थित है. इसका विस्तार 9 हजार योजन है. इसमें 7 कुल पर्वत हैं : महेन्द्र, मलय, सह्य, शुक्तिमान, ऋक्ष, विंध्य और पारियात्र.

भारत में कई छोटे और बड़े युद्ध होते रहे. जैसे, देवासुर संग्राम, इंद्र और वृत्तासुर युद्ध, दाशराज्ञ का युद्ध, हैहय-परशुराम युद्ध, राम-रावण का युद्ध, चंद्रगुप्त मौर्य-धननंद का युद्ध, सम्राट अशोक-कलिंग का युद्ध. लेकिन उक्त सभी युद्ध के दौरान भारत को अंखंड किए जाने का कार्य ही किया जाता रहा. हालांकि सिकंदर और पोरस युद्ध के बाद भारत में स्थितियां बदलती गई. अखंड भारत खंड-खंड होता चला गया. अखंड भारत में आज के अफगानिस्थान, पाकिस्तान , तिब्बत, भूटान, म्यांमार, बांग्लादेश, श्रीलंका आते है केवल इतना ही नहीं कालांतर में भारत का साम्राज्य में आज के मलेशिया, फिलीपीन्स, थाईलैण्ड, दक्षिण वियतनाम, कम्बोडिया ,इण्डोनेशिया आदि में सम्मिलित थे.

सन् 1875 तक (अफगानिस्थान, पाकिस्तान , तिब्बत, भूटान, म्यांमार, बांग्लादेश, श्रीलंका) भारत का ही हिस्सा थे लेकिन 1857 की क्रांति के पश्चात ब्रिटिश साम्राज्य की नींव हिल गई थी उन्हें लगा की इतने बड़े भू-भाग का दोहन एक केन्द्र से करना सम्भव नहीं है एवं फुट डालो एवं शासन करो की नीति अपनायी एवं भारत को अनेकानेक छोटे-छोटे हिस्सो में बाँट दिया केवल इतना ही नहीं यह भी सुनिश्चित किया की कालान्तर में भारतवर्ष पुनः अखण्ड न बन सके. विघटन की इस शृंखला का प्रारम्भ अफ़गानिस्तान से हुआ जब सन् 1876 में रूस एवं ब्रिटैन के बीच हुई गण्डामक सन्धि के बाद अफ़गानिस्तान बना.

कब क्या खोया भारतवर्ष नें :
अफ़गानिस्तान अलग हुआ 1876 में
भूटान अलग हुआ 1906 में
श्रीलंका अलग हुआ 1935 में
बर्मा(म्यामार) अलग हुआ 1937 में
पाकिस्तान अलग हुआ 1947 में
बंग्लादेश अलग हुआ 1971 में

अखंड भारत में शासन व्यवस्था और मगध सम्राज्य का उदय
प्राचीन काल में छठी शताब्दी ईoपूo में अखण्ड भारत में शासन व्यवस्था चलाने के लिए अखण्ड भारत को सोलह महाजनपदों में बाटा गया था. इसकी जानकारी बौद्ध ग्रन्थ अंगुत्तर निकाय और जैन ग्रन्थ भगवतीसूत्र से प्राप्त होती है. इन 16 महाजनपदों में से 14 राजतंत्र और दो (वज्जि, मल्ल) गणतंत्र थे. बुद्ध काल में सर्वाधिक शक्तिशाली महाजनपद था– वत्स, अवन्ति, मगध, कोसल.

सोलह महाजनपद और उसकी राजधानी :
*गांधार : पाकिस्तान स्थित पश्चिमोत्तर क्षेत्र रावलपिंडी से 18 मील उत्तर की ओर, राजधानी तक्षशिला
*कंबोज : आधुनिक अफगानिस्तान, राजधानी राजापुर
*कुरु : दिल्ली, हरियाणा, पंजाब, उत्तर प्रदेश के पश्चिमी भाग, राजधानी पहले ‍हस्तिनापुर और बाद में इन्द्रप्रस्थ
*पंचाल : बरेली, बदायूं और फर्रूखाबाद, राजधानी अहिच्छत्र तथा काम्पिल्य
* कोशल : अवध, राजधानी साकेत और श्रावस्ती
* शूरसेन : मथुरा के आसपास का क्षेत्र, राजधानी मथुरा
* काशी : वाराणसी, राजधानी वाराणसी
* मगध : दक्षिण बिहार, राजधानी गिरिव्रज (आधुनिक राजगृह)
* वत्स : प्रयाग (इलाहाबाद) और उसके आसपास, राजधानी कौशांबी
* अंग : भागलपुर, राजधानी चंपा
* मत्स्य : जयपुर, राजधानी विराट नगर
* वज्जि : जिला दरभंगा और मुजफ्फरपुर, राजधानी मिथिला, जनकपुर और वैशाली
* मल्ल : ज़िला देवरिया, राजधानी कुशीनगर और पावा (आधुनिक पडरौना)
* चेदि : बुंदेलखंड, राजधानी शुक्तिमती (वर्तमान बांदा के पास)
* अवंति : मालवा, राजधानी उज्जयिनी
* अश्मक : गोदावरी घाटी, राजधानी पांडन्य

मगध महाजनपद: मगध प्राचीन भारत के 16 महाजनपदों में से एक था. आधुनिक पटना तथा गया जिला इसमें शामिल थे. इसकी राजधानी गिरिव्रज (वर्तमान राजगीर) और बाद में पाटलिपुुुत्र थी. भगवान बुद्ध के पूर्व बृहद्रथ तथा जरासंध यहाँ के प्रतिष्ठित राजा थे. अभी इस नाम से बिहार में एक प्रंमडल है - मगध प्रमंडल. मगध बुद्धकालीन समय में एक शक्‍तिशाली राजतन्त्रों में से एक था. यह दक्षिणी बिहार में स्थित था जो कालान्तर में उत्तर भारत का सर्वाधिक शक्‍तिशाली महाजनपद बन गया. यह गौरवमयी इतिहास और राजनीतिक एवं धार्मिकता का विश्‍व केन्द्र बन गया.

मगध महाजनपद की सीमा उत्तर में गंगा से दक्षिण में विन्ध्य पर्वत तक, पूर्व में चम्पा से पश्‍चिम में सोन नदी तक विस्तृत थीं. मगध की प्राचीन राजधानी राजगृह थी. यह पाँच पहाड़ियों से घिरा नगर था. कालान्तर में मगध की राजधानी पाटलिपुत्र में स्थापित हुई. मगध राज्य में तत्कालीन शक्‍तिशाली राज्य कौशल, वत्स व अवन्ति को अपने जनपद में मिला लिया. इस प्रकार मगध का विस्तार अखण्ड भारत के रूप में हो गया और प्राचीन मगध का इतिहास ही भारत का इतिहास बना.


मगध के राजवंश :
1. हर्यक राजवंश (544–413 ई.पू)
2. शिशुनाग राजवंश (413–345 ई.पू)
3. नंद साम्राज्य (345–322 ई.पू)
4. मौर्य साम्राज्य (321 ई.पू. - 185 ई.पू.)
5. शुंग साम्राज्य (185 ईसा पूर्व - 75 ईसा पूर्व)
6. कण्व वंश (75 ईसा पूर्व – 60 ईसा पूर्व)
7. सातवाहन वंश (60ई.पू. –225ईस्वी )
8. गुप्त साम्राज्य (275ईस्वी –550 ईस्वी)
9. पुष्यभूति राजवंश/वर्धन राजवंश (600–647 ईस्वी)
10.पाल साम्राज्य (750–1174 ईस्वी)

मगध पर हर्यक वंश के संस्थापक बिंबिसार
बिम्बिसार को मगध साम्राज्य का वास्तविक संस्थापक/राजा माना जाता है. बिम्बिसार ने हर्यक वंश की स्थापना 544 ई.पू. में की थी. इसके साथ ही राजनीतिक शक्‍ति के रूप में बिहार का सर्वप्रथम उदय हुआ. बिम्बिसार ने गिरिव्रज (राजगीर) को अपनी राजधानी बनायी. बिम्बिसार एक कूटनीतिज्ञ और दूरदर्शी शासक था. उसने प्रमुख राजवंशों में वैवाहिक सम्बन्ध स्थापित कर राज्य को फैलाया. सबसे पहले उसने लिच्छवि गणराज्य के शासक चेतक की पुत्री चेलना के साथ विवाह किया. दूसरा प्रमुख वैवाहिक सम्बन्ध कौशल राजा प्रसेनजीत की बहन महाकौशला के साथ विवाह किया. इसके बाद भद्र देश की राजकुमारी क्षेमा के साथ विवाह किया.

महावग्ग के अनुसार बिम्बिसार की 500 रानियाँ थीं. उसने अवंति के शक्‍तिशाली राजा चन्द्र प्रद्योत के साथ दोस्ताना सम्बन्ध बनाया. सिन्ध के शासक रूद्रायन तथा गांधार के मुक्‍कु रगति से भी उसका दोस्ताना सम्बन्ध था. उसने अंग राज्य को जीतकर अपने साम्राज्य में मिला लिया था वहाँ अपने पुत्र अजातशत्रु को उपराजा नियुक्‍त किया था. बिम्बिसार महात्मा बुद्ध का मित्र और संरक्षक था. बुद्ध से मिलने के बाद उसने बौद्ध धर्म को ग्रहण किया, लेकिन जैन और ब्राह्मण धर्म के प्रति उसकी सहिष्णुता थी. बिम्बिसार ने करीब 52 वर्षों तक शासन किया.

महात्मा बुद्ध के विरोधी देवव्रत के उकसाने पर उसके पुत्र अजातशत्रु ने उसे बन्दी बनाकर कारागार में डाल दिया था जहाँ 492 ई.पू. में उसका निधन हो गया. जिसके बाद अजातशत्रु मगध के सिंहासन पर बैठा. इसके बचपन का नाम कुणिक था. वह अपने पिता की हत्या कर गद्दी पर बैठा. अजातशत्रु ने अपने पिता के साम्राज्य विस्तार की नीति को चरमोत्कर्ष तक पहुँचाया. अजातशत्रु के सिंहासन मिलने के बाद वह अनेक राज्य संघर्ष एवं कठिनाइयों से घिर गया लेकिन अपने बाहुबल और बुद्धिमानी से सभी पर विजय प्राप्त की.

महत्वाकांक्षी अजातशत्रु ने अपने पिता को कारागार में डालकर कठोर यातनाएँ देकर मार दिया था जिससे दुखित होकर कौशल रानी की भी मृत्यु हो गई. बिम्बिसार की पत्‍नी (कौशल) की मृत्यु से प्रसेनजीत बहुत क्रोधित हुआ और अजातशत्रु के खिलाफ संघर्ष छेड़ दिया. आजतशत्रु ने युद्ध में प्रसेनजीत को पराजित कर उसकी पुत्री वाजिरा से विवाह कर लिया जिसके उपरांत प्रसेनजीत ने काशी को दहेज में दे दिया. इसके बाद अजातशत्रु ने लिच्छवी और मल्ल संघ पर भी आक्रमण करके जीत लिया और अपने राज्य में मिला लिया . इस प्रकार पूर्वी उत्तर प्रदेश का एक बड़े भू-भाग मगध साम्राज्य का अंग बन गया. अजातशत्रु ने अपने प्रबल प्रतिद्वन्दी अवन्ति राज्य पर आक्रमण करके विजय प्राप्त की.

अजातशत्रु धार्मिक उदार सम्राट था. विभिन्‍न ग्रन्थों के अनुसार वे बौद्ध और जैन दोनों मत के अनुयायी माने जाते हैं. उसने अपने शासनकाल के आठवें वर्ष में बुद्ध के महापरिनिर्वाण के बाद उनके अवशेषों पर राजगृह में स्तूप का निर्माण करवाया और 483 ई.पू. राजगृह की सप्तपर्णि गुफा में प्रथम बौद्ध संगीति का आयोजन किया. इस संगीति में बौद्ध भिक्षुओं के सम्बन्धित पिटकों को सुतपिटक और विनयपिटक में विभाजित किया. उसने लगभग 32 वर्षों तक शासन किया और 460 ई.पू. में अपने पुत्र उदयन द्वारा मारा गया था. अजातशत्रु के शासनकाल में ही महात्मा बुद्ध 482 ई.पू. महापरिनिर्वाण तथा महावीर का भी निधन 469 ई.पू. हुआ था.

अजातशत्रु के बाद उसका पुत्र उदयन 460 ई.पू. में मगध का राजा बना. इसकी माता का नाम पद्‍मावती था. उदयन शासक बनने से पहले चम्पा का उपराजा था. वह पिता की तरह ही वीर और विस्तारवादी नीति का पालक था. इसने पाटलि पुत्र (गंगा और सोन के संगम) को बसाया तथा अपनी राजधानी राजगृह से पाटलिपुत्र स्थापित की. मगध के प्रतिद्वन्दी राज्य अवन्ति के गुप्तचर द्वारा उदयन की हत्या कर दी गई. उदयन के तीन पुत्र अनिरुद्ध, मंडक और नागदशक थे. उदयन के तीनों पुत्रों ने राज्य किया. अन्तिम राजा नागदशक था. जो अत्यन्त विलासी और निर्बल था. शासनतन्त्र में शिथिलता के कारण व्यापक असन्तोष जनता में फैला. राज्य विद्रोह कर उनका सेनापति शिशुनाग ने उदयन की हत्या कर दिया और स्वंय मगध का राजा बना. इस प्रकार हर्यक वंश का अन्त और शिशुनाग वंश की स्थापना 413 ई.पू. हुई.

मगध सम्राज्य पर शिशुनाग राजवंश एंव नन्द सम्राज्य की स्थापना
मगध में हर्यक वंश के राजा नागदशक को उसका सेनापति शिशुनाग ने राज्य विद्रोह कर 413 ई.पू. में हत्या कर दिया और स्वंय मगध का राजा बन गया और मगध पर इस प्रकार शिशुनाग वंश की स्थापना की. शिशुनाग लिच्छवि राजा के वेश्या पत्‍नी से उत्पन्‍न पुत्र था. पुराणों के अनुसार वह क्षत्रिय था. इसने सर्वप्रथम मगध के प्रबल प्रतिद्वन्दी राज्य अवन्ति पर आक्रमण कर उसे अपने राज्य में मिलाया. मगध की सीमा पश्‍चिम मालवा तक फैल गई और वत्स को मगध में मिला दिया. वत्स और अवन्ति के मगध में विलय से, पाटलिपुत्र को पश्‍चिमी देशों से व्यापारिक मार्ग के लिए रास्ता खुल गया.

शिशुनाग ने मगध से बंगाल की सीमा से मालवा तक विशाल भू-भाग पर अधिकार कर लिया. शिशुनाग एक शक्‍तिशाली शासक था जिसने गिरिव्रज के अलावा वैशाली नगर को भी अपनी राजधानी बनाया. 394 ई.पू. में इसकी मृत्यु हो गई जिसके बाद उसका पुत्र कालाशोक मगध का शासक बना. महावंश में इसे कालाशोक तथा पुराणों में काकवर्ण कहा गया है. कालाशोक ने अपनी राजधानी को पाटलिपुत्र स्थानान्तरित कर दिया था. इसने 28 वर्षों तक शासन किया. कालाशोक के शासनकाल में ही बौद्ध धर्म की द्वितीय संगीति का आयोजन हुआ. कालाशोक को राजधानी पाटलिपुत्र में घूमते समय महापद्यनन्द नामक व्यक्‍ति ने चाकू मारकर हत्या कर दी थी. 366 ई.पू. कालाशोक की मृत्यु हो गई. कालाशोक के दस पुत्र थे, जिन्होंने मगध पर 22 वर्षों तक शासन किया. शिशुनाग वंश का अंतिम राजा महानन्दि था. महानन्दि का हत्या उसी के शूद्र दासी के साथ हुए पुत्र महापद्मनन्द द्वारा नगर विहार के दौरान कर दी गई और महापद्मनन्द मगध का राजा बनकर नन्द वंश की स्थापना की. इस प्रकार 344 ई.पू. में शिशुनाग वंश का अन्त हो गया और नन्द वंश का उदय हुआ.

पुराणों में महापद्मनन्द को महापद्म तथा महाबोधिवंश में उग्रसेन कहा गया है. यह नाई जाति का था. इन्हें महापद्म एकारट, सर्व क्षत्रान्तक आदि उपाधियों से विभूषित किया गया है. महापद्मनन्द पहला शासक था जो गंगा घाटी की सीमाओं का अतिक्रमण कर विन्ध्य पर्वत के दक्षिण तक विजय पताका लहराई. नन्द वंश के समय मगध राजनैतिक दृष्टि से अत्यन्त समृद्धशाली साम्राज्य बन गया. भारतीय इतिहास में पहली बार एक ऐसे साम्राज्य की स्थापना हुई जो कुलीन नहीं था तथा जिसकी सीमाएं गंगा के मैदानों को लांघ गई. ये एक एक अखंड राजतंत्र था, जिसके पास अपार सैन्यबल, धनबल और जनबल था. महापद्मनंद ने निकटवर्ती सभी राजवंशो को जीतकर एक विशाल साम्राज्य की स्थापना की एवं केंद्रीय शासन की व्यवस्था लागू की. इसीलिए सम्राट महापदम नंद को "केंद्रीय शासन पद्धति का जनक" कहा जाता है.

महापद्मनंद के आठ पुत्र थे- पंडूक, पाण्डुगति, भूतपाल, राष्ट्रपाल, योविषाणक, दशसिद्धक, कैवर्त और धनानन्द. घनानन्द मगध नंदवंश का अंतिम राजा था. इसके शासन काल में भारत पर आक्रमण सिकन्दर द्वारा किया गया. सिकन्दर के भारत से जाने के बाद मगध साम्राज्य में अशान्ति और अव्यवस्था फैली. धनानन्द एक लालची और धन संग्रही शासक था, जिसे असीम शक्‍ति और सम्पत्ति के बावजूद वह जनता के विश्‍वास को नहीं जीत सका. उसने एक महान विद्वान ब्राह्मण चाणक्य को अपमानित किया था. चाणक्य ने अपनी कूटनीति से धनानन्द को पराजित कर सूर्यवंशी चन्द्रगुप्त मौर्य को मगध का शासक बनाया. धननंद 322 ईसापूर्व में अपदस्थ हुआ और इसके साथ ही मौर्य काल का आरम्भ हो गया. इस प्रकार 22 वर्षों तक मगध पर नन्दवंश का राज रहा.

ब्राह्मण चाणक्य का अपमान करने के कारण राजा घनानंद का हुआ सत्यानाश

चाणक्य भारत के महान अर्थशास्त्री, राजनीति के ज्ञाता मानें जाते हैं. वे बचपन से ही अन्य बालकों से भिन्न थे. उनके तार्किकता का कोई जवाब नहीं था. चाणक्य को बचपन से ही वेद पुराणों में बहुत रूचि थी. इतिहास में उनका नाम एक कुशल नेतृत्वकर्ता व बड़े रणनीतिकारों में शामिल है. इनके सर्वगुणसंपन्न होने की ही वजह से ही इनको अनेक नामों से पुकारा जाता है, जिसमें कौटिल्य, विष्णुगुप्त, वात्स्यान, मल्ल्नाग व् अन्य नाम शामिल हैं. चाणक्य का जन्म 350 ई.पू. में तक्षशिला में हुआ था. उनके पिता चणक मुनि एक महान शिक्षक थे. इनके पिता ने बचपन में उनका नाम कौटिल्य रखा था. एक शिक्षक होने के नाते चणक मुनि अपने राज्य की रक्षा के लिए बेहद चिंतित थे.

शायद यही कारण था कि, चणक क्रूर राजा धनानंद की गलत नीतियों के खिलाफ थे. उन्होंने अपने मित्र अमात्य शकटार के साथ एक राजा के विरुद्ध एक रणनीति बनाई. इसके बाद वे राजा धनानंद को सत्ता से उखाड़ फेंकने की प्रतिज्ञा ले ली. लेकिन, जब इनकी इस योजना का पता धनानंद को लगता है. तो ऐसे में वो चणक को कैद करने का हुक्म दे देता है. फिर, राजा ने चणक पर राजद्रोह का आरोप लगाते हुए सिर कलम करने का आदेश दे दिया. उसकी क्रूरता का ये आलम था कि उसने उनके कटे सिर को राज्य के मुख्य चौराहे पर लटका दिया था. पिता की मौत से चाणक्य को गहरा दुःख हुआ.

नन्हें कौटिल्य बिलकुल बेसहारा हो चुके थे. उन्होंने अपने आपको किसी तरह संभाला और पिता के कटे हुए सिर के साथ उनका दाह संस्कार किया. इसके बाद ने चाणक्य ने अपने हाथों में पवित्र गंगा जल लेकर शपथ खाई कि जब तक धनानंदके वंश का नाश नहीं देता, तब तक पका हुआ भोजन ग्रहण नही करूँगा. चाणक्य की कड़ी प्रतिज्ञा राजद्रोह की ओर संकेत कर रहा था. हालांकि, उनको इस बात का भी डर था कि कहीं क्रूर राजा उन्हें भीं न मरवा दे. ऐसे में वे अपना घर बार छोड़कर जंगल की ओर चल पड़े. चाणक्य जंगल में भागते-भागते थक कर मुर्छित अवस्था में पहुँच गये. तभी जंगल के मार्ग से एक संत गुजर रहे थे. उन्होंने मुर्छित अवस्था में चाणक्य को देखा. उन्होंने उस बालक को उठाकर उनका नाम पूछा. चाणक्य ने धनानंदके डर से उन्हें अपना नाम विष्णुगुप्त बताया. उस बालक की अवस्था को देख संत को दया आ गई. वे चाणक्य को अपने साथ ले गये. उन्होंने ही चाणक्य को शिक्षा-दीक्षा दिया. अब कल का कौटिल्य आज का विष्णुगुप्त बन चुका था.

उन्होंने जल्द ही अपनी मेहनत और लगन से उच्च शिक्षा प्राप्त कर ली. बाद में उनकी निपुणता को देखते हुए उन्हें तक्षशिला का शिक्षक बना दिया गया. उस समय तक्षशिला पाकिस्तान के रावलपिंडी जिले में था. शिक्षक के पद पर रहते हुए विष्णुगुप्त अपनी बुद्धिमानी व कुशलता से पूरे तक्षशिला में ख्याति प्राप्त कर ली. उन्हें एक प्रकांड विद्वान की दृष्टि से देखा जाने लगा था. वहां के लोग उनकी बातों से बहुत प्रभावित रहते थे.

इसी बीच सिकंदर ने भारत में आकर विनाशक तांडव मचाता है. सिकंदर के भय से चाणक्य को राज्य की चिंता सताए जा रही थी. यही करण था कि वे दुश्मन धनानंदके दरबार में बिन बुलाये मेहमान की तरह पहुंच जाते है. वहां पहुचकर वे राज्य की दयनीय स्थिति का स्मरण करते हैं. इसके बाद वे राजा धनानंदको सिकंदर के भारी उत्पात से आगाह करते हैं. वे राजा को बताते है कि महाराज दुश्मन मगध साम्राज्य की ओर बढ़ता आ रहा है, मगर भोग विलास में डूबा धनानंद उनकी एक बात नहीं सुनी बल्कि उल्टा उन्हीं को तिरस्कृत कर देता है.

पिता के हत्यारे से तिरस्कृत होना चाणक्य के लिए असहनीय बात थी. ऐसे में चाणक्य का राजा के प्रति और क्रोध उत्पंन हो जाता है. ऐसे में उनके प्रतिशोध की ज्वाला भड़क उठती है. वे दोबारा धनानंद से बदला लेने के लिए प्रतिज्ञा लेते है. चाणक्य कसम खाते कि जब तक बदला पूरा नहीं हो जाता, तब तक मैं अपनी शिखा को नहीं बांधूंगा. इसके बाद वो अपने पिता के मित्र अमात्य शकटार से मिलते हैं. वे उनके साथ राज्य में हो रहे अनैतिक कार्यों को लेकर मंत्रणा करते हैं. शकटार उनको बताते है कि राज्य की जनता धनानंद की गलत नीतियों से बहुत त्रस्त हो चुकी है. जनता से जबरन कर वसूला जा रहा है. इन बातों से चाणक्य को गहरा दुःख पहुँचता है. ऐसे में दोनों धनानंद के शासन को उखाड़ फेंकने का संकल्प लेते हैं.

चाणक्य शकटार से कहते हैं कि इस साम्राज्य को चलाने के लिए एक ऐसे युवक की ज़रुरत है, जिसमें राजा बनने के सभी गुण मौजूद हो. तब शकटार उन्हें धनानंदके दरबार में काम करने वाली एक दासी के बारे में बताता है, जिसका नाम मुरा था. उस दासी को भी धनानंद ने तिरस्कार करके दरबार से बाहर फेंकवा दिया था. उसी दासी का एक पुत्र चन्द्रगुप्त मोर्य है, जिसमें शासक बनने के सभी गुण मौजूद हैं. ऐसे में चाणक्य ने चन्द्रगुप्त से मिलने की इच्छा जताई. फिर, दोनों चन्द्रगुप्त के घर जाते है. वे उनकी मां से मिलते हैं. चाणक्य चन्द्र गुप्त की माँ से कहते है कि आपके पुत्र में एक राजा बनने योग्य है. इस बालक में एक राजा के सम्पूर्ण गुण दिखाई देते हैं. उनकी माँ चाणक्य की बातों से सहमत होती हैं. चाणक्य चन्द्रगुप्त को अपने साथ आश्रम में ले आते हैं. वे उन्हें उच्च शिक्षा देना प्रारंभ कर देते है.चाणक्य उनको धनानंदसे बदला लेने के लिए हर प्रकार से तैयार करते हैं.


इसी कड़ी में दिलचस्प यह था कि चाणक्य ने चन्द्रगुप्त की शक्तियों को बढ़ाने के लिए धर्म का सहारा लेते हैं. वे इस बार फिर अपना नाम बदलकर 'वात्स्यान मुनि' बन जाते हैं. धर्म की आड़ में चाणक्य लोगों को अपना प्रवचन सुनाते और युवाओं को चंद्रगुप्त की सेना में जाने का सुझाव भी दिया करते थे. कुछ ही समय में चंद्रगुप्त की एक मजबूत सेना तैयार हो जाती है. इसी बीच एक अमात्य गुप्तचर द्वारा चाणक्य की साजिश का पता धनानंद को लगता है. परन्तु अब बहुत देर हो चुकी थी. चाणक्य द्वारा तैयार किये गए चक्रव्यूह में धनानंद पूरी तरह से फंस चुका था.


चन्द्रगुप्त अपनी बहादुर सेना के साथ मगध पर आक्रमण करने के लिए तैयार था. ऐसे में भोग-विलास में डूबे धनानंद को कुछ समझ नही आ रहा था. वह चाणक्य की रणनीति के विरुद्ध कोई फैसला लेने में असमक्ष था. उनकी नीतियाँ धनानंद के गले की फांस बन चुकी थी. ऐसे में चाणक्य इस वक़्त को भुनाते हैं और चन्द्रगुप्त को मगध पर आक्रमण करने का हुक्म दे देते हैं. उनकी आज्ञा का पालन करते हुए चन्द्रगुप्त मौर्य मगध पर आक्रमण कर देते हैं. चन्द्रगुप्त ने अपने कुशल नेतृत्व में धनानंद समेत उसके पूरे वंश को मौत के घाट उतार देते हैं. इस तरह चंद्रगुप्त चाणक्य के प्रतिशोध को पूरा करते हैं. चाणक्य ने अपनी कुशल कूटनीति से धनानंद से बदला लेने में कामयाब हो जाते हैं. इसके साथ ही एक क्रूर और अत्याचारी शासक का अंत हो जाता है और मगध पर मौर्य साम्राज्य की स्थापना होता है. चन्द्रगुप्त मौर्या मगध का राजा बनता है और चाणक्य को अपना महामंत्री बनाता है.

चंद्रगुप्त मौर्य जिन्होंने नंदवंश के राजा घनानंद को पराजित कर मौर्य साम्राज्य की स्थापना की

चन्द्रगुप्त मौर्य ने अपने गुरू चाणक्य की सहायता से 322 ई.पू. में धनानन्द की हत्या कर मौर्य वंश की नींव डाली थी. चन्द्रगुप्त मौर्य ने नन्दों के अत्याचार व घृणित शासन से मुक्‍ति दिलाई और देश को एकता के सूत्र में बाँधा और मौर्य साम्राज्य की स्थापना की. चन्द्रगुप्त पिप्पलिवन के सूर्यवंशी मौर्य वंश का था. चन्द्रगुप्त के पिता पिप्पलिवन के नगर प्रमुख थे. जब वह गर्भ में ही था तब उसके पिता की मृत्यु युद्धभूमि में हो गयी थी. चंद्र गुप्त मौर्य की माता का नाम मुरा था. जब चन्द्रगुप्त 10 वर्ष के थे तो उनकी मां मुरा का भी देहांत हो गया था और तब से उनकी परवरिश एक गोपालक द्वारा किया गया था. चरावाह तथा शिकारी रूप में ही राजा-गुण होने का पता आचार्य चाणक्य ने कर लिया था तथा उसे एक हजार में खरीद लिया. तत्पश्‍चात्‌ तक्षशिला लाकर सभी विद्या में निपुण बनाया.

जिस समय चन्द्रगुप्त राजा बना था भारत की राजनीतिक स्थिति बहुत खराब थी. उसने सबसे पहले एक सेना तैयार की और सिकन्दर के विरुद्ध युद्ध प्रारम्भ किया. 317 ई.पू. तक उसने सम्पूर्ण सिन्ध और पंजाब प्रदेशों पर अधिकार कर लिया. अब चन्द्रगुप्त मौर्य सिन्ध तथा पंजाब का एकक्षत्र शासक हो गया. पंजाब और सिन्ध विजय के बाद चन्द्रगुप्त तथा चाणक्य ने धनानन्द का नाश करने हेतु मगध पर आक्रमण कर दिया. युद्ध में धनानन्द मारा गया अब चन्द्रगुप्त भारत के एक विशाल साम्राज्य मगध का शासक बन गया. सिकन्दर की मृत्यु के बाद सेल्यूकस उसका उत्तराधिकारी बना. वह सिकन्दर द्वारा जीता हुआ भू-भाग प्राप्त करने के लिए उत्सुक था. इस उद्देश्य से 305 ई. पू. उसने भारत पर पुनः चढ़ाई की. चन्द्रगुप्त ने पश्‍चिमोत्तर भारत के यूनानी शासक सेल्यूकस निकेटर को पराजित कर समस्त भू-भाग को अधिकृत कर विशाल भारतीय साम्राज्य की स्थापना की. सेल्यूकस ने अपनी पुत्री हेलन का विवाह चन्द्रगुप्त से कर दिया. उसने मेगस्थनीज को राजदूत के रूप में चन्द्रगुप्त मौर्य के दरबार में नियुक्‍त किया.

चन्द्रगुप्त मौर्य ने पश्‍चिम भारत में सौराष्ट्र तक प्रदेश जीतकर अपने प्रत्यक्ष शासन के अन्तर्गत शामिल किया. दक्षिण में चन्द्रगुप्त मौर्य ने उत्तरी कर्नाटक तक विजय प्राप्त की. चन्द्रगुप्त मौर्य के विशाल साम्राज्य में काबुल, हेरात, कन्धार, बलूचिस्तान, पंजाब, गंगा-यमुना का मैदान, बिहार, बंगाल, गुजरात था तथा विन्ध्य और कश्मीर के भू-भाग सम्मिलित थे, लेकिन चन्द्रगुप्त मौर्य ने अपना साम्राज्य उत्तर-पश्‍चिम में ईरान से लेकर पूर्व में बंगाल तथा उत्तर में कश्मीर से लेकर दक्षिण में उत्तरी कर्नाटक तक विस्तृत किया था. अन्तिम समय में चन्द्रगुप्त मौर्य जैन मुनि भद्रबाहु के साथ श्रवणबेलगोला चला गया था और उपवास द्वारा चन्द्रगुप्त मौर्य ने अपना शरीर त्याग दिया.

चन्द्रगुप्त मौर्य के निधन के बाद उसका पुत्र बिन्दुसार उसका उत्तराधिकारी था. यह 298 ई. पू. मगध साम्राज्य के सिंहासन पर बैठा. बिन्दुसार के समय में भारत का पश्‍चिम एशिया से व्यापारिक सम्बन्ध अच्छा था. बिन्दुसार के दरबार में सीरिया के राजा एंतियोकस ने डायमाइकस नामक राजदूत भेजा था. प्रशासन के क्षेत्र में बिन्दुसार ने अपने पिता का ही अनुसरण किया. दिव्यादान के अनुसार अशोक अवन्ति का उपराजा था. बिन्दुसार की सभा में 500 सदस्यों वाली मन्त्रिपरिषद्‍ थी जिसका प्रधान खल्लाटक था. बिन्दुसार ने 25 वर्षों तक राज्य किया अन्ततः 273 ई.पू. उसकी मृत्यु हो गयी.

बिन्दुसार के निधन के बाद उसके पुत्र सम्राट अशोक 273 ई.पू. में मगध की राजगद्दी प्राप्त होने के बाद अशोक को अपनी आन्तरिक स्थिति सुदृढ़ करने में चार वर्ष लगे. इस कारण राज्याभिषेक चार साल बाद 269 ई.पू. में हुआ था. अभिलेखों में उसे देवाना प्रिय एवं राजा आदि उपाधियों से सम्बोधित किया गया है. मौर्य राजवंश के चक्रवर्ती सम्राट अशोक ने अखण्ड भारत पर राज्य किया है तथा उनका मौर्य साम्राज्य उत्तर में हिन्दुकुश, तक्षशिला की श्रेणियों से लेकर दक्षिण में गोदावरी नदी, सुवर्णगिरी पहाड़ी के दक्षिण तथा मैसूर तक तथा पूर्व में बांग्लादेश, पाटलीपुत्र से पश्चिम में अफ़गानिस्तान, ईरान, बलूचिस्तान तक पहुँच गया था. सम्राट अशोक का साम्राज्य आज का सम्पूर्ण भारत, पाकिस्तान, अफ़ग़ानिस्तान, नेपाल, बांग्लादेश, भूटान, म्यान्मार के अधिकांश भूभाग पर था. यह विशाल साम्राज्य उस समय तक से आज तक का सबसे बड़ा भारतीय साम्राज्य रहा है. चक्रवर्ती सम्राट अशोक विश्व के सभी महान एवं शक्तिशाली सम्राटों एवं राजाओं की पंक्तियों में हमेशा शीर्ष स्थान पर ही रहे हैं. सम्राट अशोक ही भारत के सबसे शक्तिशाली एवं महान सम्राट है. सम्राट अशोक को ‘चक्रवर्ती सम्राट अशोक’ कहा जाता है, जिसका अर्थ है - ‘सम्राटों का सम्राट’, और यह स्थान भारत में केवल सम्राट अशोक को मिला है.

अशोक ने अपने राज्याभिषेक के 8वें वर्ष 261 ई.पू. में कलिंग पर आक्रमण किया था. कलिंग युद्ध में एक लाख 50 हजार व्यक्‍ति बन्दी बनाकर निर्वासित कर दिए गये, एक लाख लोगों की हत्या कर दी गयी. सम्राट अशोक ने भारी नरसंहार को अपनी आँखों से देखा. कलिंग युद्ध ने अशोक के हृदय में महान परिवर्तन कर दिया. उसका हृदय मानवता के प्रति दया और करुणा से उद्वेलित हो गया. उसने युद्ध क्रियाओं को सदा के लिए बन्द कर देने की प्रतिज्ञा की. यहाँ से आध्यात्मिक और धम्म विजय का युग शुरू हुआ. उसने बौद्ध धर्म को अपना धर्म स्वीकार किया. अशोक ने शान्ति, सामाजिक प्रगति तथा धार्मिक प्रचार किया. अशोक को अपने शासन के चौदहवें वर्ष में निगोथ नामक भिक्षु द्वारा बौद्ध धर्म की दीक्षा दी गई थी. तत्पश्‍चात्‌ मोगाली पुत्र निस्स के प्रभाव से वह पूर्णतः बौद्ध हो गया था. अपने शासनकाल के दसवें वर्ष में उन्होंने सर्वप्रथम बोधगया की यात्रा की. तदुपरान्त अपने राज्याभिषेक के बीसवें वर्ष में लुम्बिनी की यात्रा की थी तथा लुम्बिनी ग्राम को करमुक्‍त घोषित कर दिया था.

मगध साम्राज्य के महान मौर्य सम्राट अशोक की मृत्यु लगभग 236 ई.पू. में हुई थी. मौर्य सम्राट की मृत्यु के उपरान्त करीबन दो सदियों से चले आ रहे शक्‍तिशाली मौर्य साम्राज्य का विघटन होने लगा. अशोक के उपरान्त अगले पाँच दशक तक उनके निर्बल उत्तराधिकारी शासन संचालित करते रहे. मौर्य सम्राज्य का अन्तिम सम्राट वृहद्रथ था जिसके शासन काल में भारत पर विदेशी आक्रमण बढते जा रहे थे. सम्राट बृहद्रथ ने उनका मुकाबला करने से मना कर दिया. तब प्रजा और सेना में विद्रोह होने लगा. उस समय पुष्यमित्र शुंग मगध का सेनापति था. एक दिन राष्ट्र और सेना के बारे में अप्रिय वचन कहने के कारण क्रोधित होकर सेनापति पुष्यमित्र शुंग ने राजा बृहद्रथ की हत्या कर दी. इस कार्य के पश्चात सेना और प्रजा ने पुष्यमित्र शुंग का साथ दिया. इसके बाद मौर्य सम्राज्य समाप्त हो गया और पुष्यमित्र शुंग ने स्वयं को सम्राट घोषित किया और एक नये राजवंश शुंग सम्राज्य की स्थापना की.

मगध पर शुंगवंश, कण्ववंश एंव सातवाहन वंश की स्थापना

मगध साम्राज्य के महान मौर्य सम्राट अशोक की मृत्यु लगभग 236 ई.पू. में हुई थी. मौर्य सम्राट की मृत्यु के उपरान्त करीबन दो सदियों से चले आ रहे शक्‍तिशाली मौर्य साम्राज्य का विघटन होने लगा. अशोक के उपरान्त अगले पाँच दशक तक उनके निर्बल उत्तराधिकारी शासन संचालित करते रहे. मौर्य सम्राज्य का अन्तिम सम्राट वृहद्रथ था जिसके शासन काल में भारत पर विदेशी आक्रमण बढते जा रहे थे. सम्राट बृहद्रथ ने उनका मुकाबला करने से मना कर दिया. तब प्रजा और सेना में विद्रोह होने लगा. उस समय पुष्यमित्र शुंग मगध का सेनापति था. एक दिन राष्ट्र और सेना के बारे में अप्रिय वचन कहने के कारण क्रोधित होकर सेनापति पुष्यमित्र शुंग ने राजा बृहद्रथ की हत्या कर दी. इस कार्य के पश्चात सेना और प्रजा ने पुष्यमित्र शुंग का साथ दिया. इसके बाद मौर्य सम्राज्य समाप्त हो गया और पुष्यमित्र शुंग ने स्वयं को सम्राट घोषित किया और एक नये राजवंश शुंग सम्राज्य की स्थापना की.

शुंग ब्राह्मण थे. बौद्ध धर्म के प्रचार-प्रसार के फ़लस्वरुप अशोक द्वारा यज्ञों पर रोक लगा दिये जाने के बाद उन्होंने पुरोहित का कर्म त्यागकर सैनिक वृति को अपना लिया था. दीर्घकाल तक मौर्यों की सेना का सेनापति होने के कारण पुष्यमित्र इसी रूप में विख्यात था तथा राजा बन जाने के बाद भी उसने अपनी यह उपाधि बनाये रखी. शुंग काल में संस्कृत भाषा का पुनरुत्थान हुआ था मनुस्मृति के वर्तमान स्वरुप की रचना इसी युग में हुई थी. परवर्ती मौर्यों के निर्बल शासन में मगध का सरकारी प्रशासन तन्त्र शिथिल पड़ गया था एवं देश को आन्तरिक एवं बाह्य संकटों का खतरा था. ऐसी विकट स्थिति में पुष्यमित्र शुंग ने मगध साम्राज्य पर अपना अधिकार जमाकर जहाँ एक ओर यवनों के आक्रमण से देश की रक्षा की और देश में शान्ति और व्यवस्था की स्थापना कर वैदिक धर्म का प्रचार-प्रसार किया जो अशोक के शासनकाल में अपेक्षित हो गये थे. इसी कारण इसका काल वैदिक प्रतिक्रिया अथवा वैदिक पुनर्जागरण का काल कहलाता है.

पुष्यमित्र शुंग ने यवनों को पराजित कर मध्य देश से निकालकर सिन्धु के किनारे तक खदेङ दिया था. यह पुष्यमित्र के काल की सबसे महत्वपूर्ण घटना थी. पुष्यमित्र शुंग के समय मगध साम्राज्य की राजधानी पाटलिपुत्र थी. पुष्यमित्र प्राचीन मौर्य साम्राज्य के मध्यवर्ती भाग को सुरक्षित रख सकने में सफ़ल रहा. पुष्यमित्र का साम्राज्य उत्तर में हिमालय से लेकर दक्षिण में बरार तक तथा पश्‍चिम में पंजाब से लेकर पूर्व में मगध तक फ़ैला हुआ था. साम्राज्य के विभिन्न भागों में राजकुमार या राजकुल के लोगो को राज्यपाल नियुक्‍त करने की परम्परा चलती रही. पुष्यमित्र ने अपने पुत्रों को साम्राज्य के विभिन्न क्षेत्रों में सह -शाशक नियुक्‍त कर रखा था और उसका पुत्र अग्निमित्र विदिशा का उपराजा था. पुष्यमित्र की मृत्यु के पश्‍चात उसका पुत्र अग्निमित्र शुंग वंश का राजा हुआ. उसने कुल 8 वर्षों तक शासन कीया. अग्निमित्र के बाद वसुज्येष्ठ, वसुमित्र, भद्रक, पुलिंदक, घोष, वज्रमित्र, भागवत और देवभूति क्रमशः राजा हुए. शुंग वंश के अन्तिम सम्राट देवभूति की हत्या करके उसके सचिव वसुदेव ने 75 ई.पू. में कर दी जिसके बाद शुंगवंश समाप्त हो गया और वसुदेव ने कण्ववंश की नींंव डाली.

कण्व वंश ने 75ई.पू. से 60ई.पू. तक शासन किया. वसुदेव पाटलिपुत्र के कण्व वंश का प्रवर्तक था. वैदिक धर्म एवं संस्कृति संरक्षण की जो परम्परा शुंगो ने प्रारम्भ की थी उसे कण्व वंश ने जारी रखा. इस वंश का अन्तिम सम्राट सुशमी कण्य अत्यन्त अयोग्य और दुर्बल था जिसके कारन इसके समय में मगध क्षेत्र संकुचित होने लगा. कण्व वंश का साम्राज्य बिहार, पूर्वी उत्तर प्रदेश तक सीमित हो गया और अनेक प्रान्तों ने अपने को स्वतन्त्र घोषित कर दिया. अन्त में सुशमी को सातवाहन वंश के संस्थापक सिमुक ने पदच्युत कर दिया और कण्ववंश को समाप्त कर सातवाहन वंश की स्थापना की. इस प्रकार कण्ववंश के चार राजाओं ने 75ई.पू.से 30ई.पू.तक शासन किया.

सिमुक ने 60ई.पू. में सातवाहन वंश की स्थापना करने के बाद प्रतिष्ठांन (आन्ध्र प्रदेश के औरंगाबाद जिले)में अपनी राजधानी स्थापित की. सातवाहन राजाओं ने 300 वर्षों तक शासन किया. सातवाहन वंश में राजा सिमुक , शातकर्णी, गौतमीपुत्रशातकर्णी, वशिस्थिपुत्र, पुलुमावी शातकर्णी, यज्ञश्री शातकारणी प्रमुख राजा थे. सातवाहन राजाओं ने 300 वर्षों तक शासन किया. सातवाहन साम्राज्य की राजकीय भाषा प्राकृत वा लिपि ब्राम्ही थी. इस समय अमरावती कला का विकास हुआ था. सातवाहन राजवंश में मातृसत्तात्मक प्रचलन में था अर्थात राजाओं के नाम उनकी माता के नाम पर (गौतमीपुत्र सातकारणी) रखने की प्रथा थी लेकिन सातवाहन राजकुल पितृसत्तात्मक था क्योंकि राजसिंहासन का उत्तराधिकारी वंशानुगत ही होता था. सातवाहन राजवंश के द्वारा अजंता एवं एलोरा की गुफाओं का निर्माण किया गया था. सातवाहन राजाओं ने चांदी, तांबे, सीसे, पोटीन और कांसे के सिक्कों का प्रचलन किया. ब्राम्हणों को भूमि दान करने की प्रथा का आरंभ सर्वप्रथम सातवाहन राजाओं ने किया था.

सातवाहन राजवंश के सबसे प्रतापी वा महान राजा शालीवाहन थे. उनके शासनकाल में यह राजवंश अपनी चरम सीमा पर था. राजा शालीवाहन की मां गौतमी प्रजापति थी. इसलिए राजा शालिवाहन को गौतमी पुत्र शातकर्णी भी कहा जाता था. राजा शालीवाहन का बचपन समस्याओं से भरा हुआ था परंतु राजा शालीवाहन को ईश्वर की घोर तपस्या के फलस्वरूप अनेकों वरदान प्राप्त हुए, जिससे राजा सलीवाहन ने राजपाठ और युद्ध के क्षेत्र में महारथ हासिल की इसलिए इन्हे दक्षिणपथ का स्वामी एवं वर्दिया (वरदान प्राप्त करने वाला) कहा जाता है. लगभग आधी शताब्दी की उठापटक तथा शक शासकों के हाथों मानमर्दन के बाद गौतमी पुत्र श्री शातकर्णी ने अपनी खोई हुई प्रतिष्ठा को पुर्नस्थापित कर लिया और 25 वर्षों तक शासन करते हुए न केवल अपने साम्राज्य की खोई प्रतिष्ठा को पुर्नस्थापित किया बल्कि शक, यवन तथा पहलाव शासको को पराजित कर एक विशाल साम्राज्य की भी स्थापना की. लेकिन तीसरी शताब्दी में सातवाहन वंश की शक्ति बहुत कमजोर हो गया था और लगभग 225 ई. में यह राजवंश समाप्त हो गया.

मगध पर गुप्तवंश की स्थापना

गुप्त राजवंश प्राचीन भारत के प्रमुख राजवंशों में से एक था. इतिहासकारों द्वारा इस अवधि को भारत का स्वर्ण युग माना जाता है. मौर्य वंश के पतन के बाद दीर्घकाल में भारत में राजनीतिक एकता स्थापित नहीं रही. मौर्य वंश के पतन के पश्चात नष्ट हुई राजनीतिक एकता को पुनः स्थापित करने का श्रेय गुप्त वंश को है. गुप्त साम्राज्य की नींव तीसरी शताब्दी के चौथे दशक में तथा उत्थान चौथी शताब्दी की शुरुआत में हुआ। गुप्त वंश का प्रारम्भिक राज्य आधुनिक उत्तर प्रदेश और बिहार में था. गुप्त राजवंश की स्थापना महाराजा गुप्त ने लगभग 275 ई.में की थी. उनका वास्तविक नाम श्रीगुप्त था. श्रीगुप्त के समय में महाराजा की उपाधि सामन्तों को प्रदान की जाती थी, अतः श्रीगुप्त किसी के अधीन शासक था. प्रसिद्ध इतिहासकार के. पी. जायसवाल के अनुसार श्रीगुप्त भारशिवों के अधीन छोटे से राज्य प्रयाग का शासक था. श्रीगुप्त ने मगध के मृग शिखावन में एक मन्दिर का निर्माण करवाया था तथा मन्दिर के व्यय में 24 गाँव को दान दिये थे.
श्रीगुप्त के बाद उसका पुत्र घटोत्कच गद्दी पर बैठा. लगभग 280 ई. में श्रीगुप्त ने घटोत्कच को अपना उत्तराधिकारी बनाया था. घटोत्कच तत्सामयिक शक साम्राज्य का सेनापति था. उस समय शक जाति ब्राह्मणों से बलपूर्वक क्षत्रिय बनने को आतुर थी. घटोत्कच ने 'महाराज' की उपाधि को धारण किया था. शक राज परिवार तो क्षत्रियत्व हस्तगत हो चला था, किन्तु साधारण राजकर्मी अपनी क्रूरता के माध्यम से क्षत्रियत्व पाने को इस प्रकार लालायित हो उठे थे, कि उनके अत्याचारों से ब्राह्मण त्रस्त हो उठे. ब्राह्मणों ने क्षत्रियों की शरण ली, किन्तु वे पहले से ही उनसे रुष्ट थे, जिस कारण ब्राह्मणों की रक्षा न हो सकी. ठीक इसी जाति-विपणन में पड़कर एक ब्राह्मण की रक्षा हेतु घटोत्कच ने 'कर्ण' और 'सुवर्ण' नामक दो शक मल्लों को मार गिराया. ‘मधुमती’ नामक क्षत्रिय कन्या से घटोत्कच का पाणिग्रहण (विवाह) हुआ था. लिच्छिवियों ने घटोत्कच को शरण दी, साथ ही उनके पुत्र चंद्रगुप्त प्रथम के साथ अपनी पुत्री कुमारदेवी का विवाह भी कर दिया. महाराज घटोत्कच ने लगभग 319 ई. तक शासन किया था.

सन् 320 में चन्द्रगुप्त प्रथम अपने पिता घटोत्कच के बाद राजा बना. चन्द्रगुप्त गुप्त वंशावली में पहला स्वतन्त्र शासक था. इसने महाराजाधिराज की उपाधि धारण की थी. उन्होंने महान पूर्ववर्ती शासक बिम्बिसार की भाँति लिच्छवि राजकुमारी कुमार देवी के साथ विवाह कर द्वितीय मगध साम्राज्य की स्थापना की. कुमार देवी के साथ विवाह-सम्बन्ध करके चन्द्रगुप्त प्रथम ने वैशाली राज्य प्राप्त किया. चन्द्रगुप्त ने विवाह की स्मृति में जो सिक्के चलाए उसमें चन्द्रगुप्त और कुमारदेवी के चित्र अंकित होते थे. लिच्छवियों के दूसरे राज्य नेपाल के राज्य को उसके पुत्र समुद्रगुप्त ने मिलाया. चन्द्रगुप्त प्रथम ने अपने राज्य को राजनैतिक दृष्टि से सुदृढ़ तथा आर्थिक दृष्टि से समृद्ध बना दिया. चन्द्रगुप्त प्रथम ने कौशाम्बी तथा कौशल के महाराजाओं को जीतकर अपने राज्य में मिलाया तथा साम्राज्य की राजधानी पाटलिपुत्र में स्थापित की.

चन्द्रगुप्त प्रथम के बाद 335 ई. में उसका तथा कुमारदेवी का पुत्र समुद्रगुप्त राजगद्दी पर बैठा. सम्पूर्ण प्राचीन भारतीय इतिहास में महानतम शासकों के रूप में वह नामित किया जाता है. इन्हें परक्रमांक कहा गया है. समुद्रगुप्त का शासनकाल राजनैतिक एवं सांस्कृतिक दृष्टि से गुप्त साम्राज्य के उत्कर्ष का काल माना जाता है. इस साम्राज्य की राजधानी पाटलिपुत्र थी. समुद्रगुप्त ने 'महाराजाधिराज' की उपाधि धारण की. समुद्रगुप्त एक असाधारण सैनिक योग्यता वाला महान विजित सम्राट था. समुद्रगुप्त एक अच्छा राजा होने के अतिरिक्त एक अच्छा कवि तथा संगीतज्ञ भी था. उसे कला मर्मज्ञ भी माना जाता है. समुद्रगुप्त ने एक विशाल साम्राज्य का निर्माण किया जो उत्तर में हिमालय से लेकर दक्षिण में विन्ध्य पर्वत तक तथा पूर्व में बंगाल की खाड़ी से पश्‍चिम में पूर्वी मालवा तक विस्तृत था. कश्मीर, पश्‍चिमी पंजाब, पश्‍चिमी राजस्थान, सिन्ध तथा गुजरात को छोड़कर समस्त उत्तर भारत इसमें सम्मिलित थे. दक्षिणापथ के शासक तथा पश्‍चिमोत्तर भारत की विदेशी शक्‍तियाँ उसकी अधीनता स्वीकार करती थीं. समुद्रगुप्त के काल में सदियों के राजनीतिक विकेन्द्रीकरण तथा विदेशी शक्‍तियों के आधिपत्य के बाद आर्यावर्त पुनः नैतिक, बौद्धिक तथा भौतिक उन्‍नति की चोटी पर जा पहुँचा था.

समुद्रगुप्त के दो पुत्र थे- रामगुप्त तथा चन्द्रगुप्त. रामगुप्त बड़ा होने के कारण पिता की मृत्यु के बाद गद्दी पर बैठा, लेकिन वह निर्बल एवं कायर था. वह शकों द्वारा पराजित हुआ और अत्यन्त अपमानजनक सन्धि कर अपनी पत्‍नी ध्रुवस्वामिनी को शकराज को भेंट में दे दिया था, लेकिन उसका छोटा भाई चन्द्रगुप्त द्वितीय बड़ा ही वीर एवं स्वाभिमानी व्यक्‍ति था. चन्द्रगुप्त द्वितीय ने अपने बड़े भाई रामगुप्त की हत्या कर दी और उसकी पत्‍नी से विवाह कर लिया और गुप्त वंश का शासक बन बैठा. चन्द्रगुप्त द्वितीय 375 ई. में सिंहासन पर आसीन हुआ. वह समुद्रगुप्त की प्रधान महिषी दत्तदेवी से हुआ था. वह विक्रमादित्य के नाम से इतिहास में प्रसिद्ध हुआ. उसने 375 से 415 ई. तक शासन किया. चन्द्रगुप्त द्वितीय ने शकों पर अपनी विजय हासिल की जिसके बाद गुप्त साम्राज्य एक शक्तिशाली राज्य बन गया.

चन्द्रगुप्त द्वितीय के समय में क्षेत्रीय तथा सांस्कृतिक विस्तार हुआ. उसने नागवंश, वाकाटक और कदम्ब राजवंश के साथ वैवाहिक सम्बन्ध स्थापित किये. चन्द्रगुप्त द्वितीय ने नाग राजकुमारी कुबेर नागा के साथ विवाह किया जिससे एक कन्या प्रभावती गुप्त पैदा हुई. वाकाटकों का सहयोग पाने के लिए चन्द्रगुप्त ने अपनी पुत्री प्रभावती गुप्त का विवाह वाकाटक नरेश रूद्रसेन द्वितीय के साथ कर दिया. उसने ऐसा संभवतः इसलिए किया कि शकों पर आक्रमण करने से पहले दक्कन में उसको समर्थन हासिल हो जाए. उसने प्रभावती गुप्त के सहयोग से गुजरात और काठियावाड़ की विजय प्राप्त की. वाकाटकों और गुप्तों की सम्मिलित शक्‍ति से शकों का उन्मूलन किया. चन्द्रगुप्त के पुत्र कुमारगुप्त प्रथम का विवाह कदम्ब वंश में हुआ. शक उस समय गुजरात तथा मालवा के प्रदेशों पर राज कर रहे थे. शकों पर विजय के बाद उसका साम्राज्य न केवल मजबूत बना बल्कि उसका पश्चिमी समुद्र पत्तनों पर अधिपत्य भी स्थापित हुआ. इस विजय के पश्चात उज्जैन गुप्त साम्राज्य की राजधानी बना. चन्द्रगुप्त द्वितीय के शासनकाल को स्वर्ण युग भी कहा गया है. चन्द्रगुप्त द्वितीय का काल कला-साहित्य का स्वर्ण युग कहा जाता है.

चन्द्रगुप्त द्वितीय की मृत्यु के बाद कुमारगुप्त प्रथम सन् 415 में सत्तारूढ़ हुआ. अपने दादा समुद्रगुप्त की तरह उसने भी अश्वमेघ यज्ञ के सिक्के जारी किये. कुमारगुप्त ने चालीस वर्षों तक शासन किया. वह चन्द्रगुप्त द्वितीय की पत्‍नी ध्रुवदेवी से उत्पन्‍न सबसे बड़ा पुत्र था, जबकि गोविन्दगुप्त उसका छोटा भाई था. कुमारगुप्त प्रथम का शासन शान्ति और सुव्यवस्था का काल था. साम्राज्य की उन्‍नति के पराकाष्ठा पर था. इसने अपने साम्राज्य का अधिक संगठित और सुशोभित बनाये रखा. गुप्त सेना ने पुष्यमित्रों को बुरी तरह परास्त किया था. कुमारगुप्त ने अपने विशाल साम्राज्य की पूरी तरह रक्षा की जो उत्तर में हिमालय से दक्षिण में नर्मदा तक तथा पूर्व में बंगाल की खाड़ी से लेकर पश्‍चिम में अरब सागर तक विस्तृत था. उसी के शासनकाल में नालन्दा विश्‍वविद्यालय की स्थापना की गई थी. नालंदा को दुनिया का पहला अंतरराष्ट्रीय निवासी विश्वविद्यालय माना जाता है.

गुप्त साम्राज्य का 550 ई. में पतन हो गया. गुप्तवंश का अंतिम राजा विष्णुगुप्त अयोग्य निकले और हूणों के आक्रमण का सामना नहीं कर सके जिसके कारण हूणों ने ग्वालियर तथा मालवा तक के एक बड़े क्षेत्र पर अधिपत्य कायम कर लिया. इसके बाद सन् 606 में हर्ष का शासन आने के पहले तक आराजकता छाई रही.

मगध पर वर्धन वंश का शासन

पुष्यभूति राजवंश जिसे वर्धन वंश के रूप में भी जाना जाता है, ने छठी और सातवीं शताब्दी के दौरान उत्तरी भारत के कुछ हिस्सों पर शासन किया. पुष्यभूति श्रीकांत जनपद (आधुनिक कुरुक्षेत्र जिला ) में रहते थे, जिनकी राजधानी थानेसर थी. शिव के एक भक्त, पुष्यभूति "दक्षिण" के एक शिक्षक, भैरवाचार्य के प्रभाव में, एक श्मशान भूमि पर एक तांत्रिक अनुष्ठान में शामिल हो गए. इस अनुष्ठान के अंत में, एक देवी ने उन्हें राजा का अभिषेक किया और उन्हें एक महान राजवंश के संस्थापक के रूप में आशीर्वाद दिया. पुष्यभूति वंश ने मूल रूप से अपनी राजधानी थानेसर के आसपास के एक छोटे से क्षेत्र पर शासन किया. इतिहासकारों के अनुसार, उनके शासक आदित्य-वर्धन कन्नौज के मौखरी राजा शरवा-वर्मन के सामंत थे. उनके उत्तराधिकारी प्रभाकर-वर्धन भी अपने शुरुआती दिनों में मौखरी राजा अवंती-वर्मन के सामंत थे. प्रभाकरवर्धन की माता गुप्त वंश की राजकुमारी महासेनगुप्त नामक स्त्री थी. अपने पड़ोसी राज्यों, मालव, उत्तर-पश्चिमी पंजाब के हूणों तथा गुर्जरों के साथ युद्ध करके प्रभाकरवर्धन ने काफ़ी प्रतिष्ठा प्राप्त की थी.

प्रभाकर-वर्धन पुष्यभूति वंश का प्रथम शासक था जिसने थानेश्वर को अपनी राजधानी बनाया था. यह "प्रतापशील" के नाम से विख्यात था. इस वंश के शासकों में सर्वप्रथम महाराजाधिराज की उपाधि प्रभाकरवर्धन ने ही धारण की. इसकी मृत्यु के बाद इसकी पत्नी यशोमती सती हो गयी. यशोमती की तीन संतान थी – राज्यवर्धन, हर्षवर्धन, राज्यश्री. राजयश्री का विवाह मौखरि नरेश ग्रहवर्मा से हुआ था. 605 ई. में प्रभाकरवर्धन की मृत्यु के बाद, मालवा के राजा ने गौड़ के शासक द्वारा समर्थित कन्नौज पर हमला किया. मालव राजा ने ग्रह-वर्मन को मार डाला, और राज्यश्री को पकड़ लिया. प्रभाकर के बड़े पुत्र राज्य-वर्धन ने मालव शासक को हराया, लेकिन गौड़ राजा शशांक ने उसे मार डाला. प्रभाकर के छोटे पुत्र हर्ष-वर्धन ने गौड़ राजा शशांक और उनके सहयोगियों को नष्ट करने की कसम खाई थी.

हर्ष वर्धन 16 वर्ष की छोटी उम्र में राजा बना. बड़े भाई राज्यवर्धन की हत्या के बाद हर्षवर्धन को राजपाट सौंप दिया गया. खेलने-कूदने की उम्र में हर्षवर्धन को राजा शशांक के खिलाफ युद्ध के मैदान में उतरना पड़ा. शशांक ने ही राज्यवर्धन की हत्या की थी. हर्षवर्धन ने एक विशाल सेना तैयार की और करीब 6 साल में गुजरात, पंजाब, उड़ीसा बंगाल, मिथिला और कन्नौज उत्तर प्रदेश जीत कर पूरे उत्तर भारत पर अपना दबदबा कायम कर लिया. जल्दी ही हर्षवर्धन का साम्राज्य पश्चिम में गुजरात से लेकर पूर्व में असाम तक और उत्तर में कश्मीर से लेकर दक्षिण में नर्मदा नदी तक फैल गया. माना जाता है कि सम्राट हर्षवर्धन की सेना में 1 लाख से अधिक सैनिक थे. यही नहीं, सेना में 60 हजार से अधिक हाथियों को रखा गया था. हर्ष परोपकारी सम्राट थे. सम्राट हर्षवर्धन ने भले ही अलग-अलग राज्यों को जीत लिया, लेकिन उन राज्यों के राजाओं को अपना शासन चलाने की इजाज़त दी. शर्त एक थी कि वे हर्ष को अपना सम्राट मानेंगे. हालांकि इस तरह की संधि कन्नौज और थानेश्वर के राजाओं के साथ नहीं की गई थी.

हर्ष ने ‘सती’ प्रथा पर लगाया प्रतिबंध. हर्षवर्धन ने सामाजिक कुरीतियों को जड़ से खत्म करने का बीड़ा उठाया था. उनके राज में सती प्रथा पर पूरी तरह प्रतिबंध लगा दिया गया. कहा जाता है कि सम्राट हर्षवर्धन ने अपनी बहन को भी सती होने से बचाया था. वह सभी धर्मों का समान आदर और महत्व देता थे. पारम्परिक हिन्दू परिवार में जन्म लेने के बाद उन्होंने बौद्ध धर्म अपनाया. बौद्ध धर्म हो या जैन धर्म, हर्ष किसी भी धर्म में भेद-भाव नहीं करते थे. सम्राट हर्षवर्धन ने शिक्षा को देश भर में फैलाया. हर्षवर्धन के शासनकाल में नालंदा विश्वविद्यालय एक शिक्षा के सर्वश्रेष्ठ केन्द्र के रूप में प्रसिद्ध हुआ.

हर्ष एक बहुत अच्छे लेखक ही नहीं, बल्कि एक कुशल कवि और नाटककार भी थे. हर्ष की ही देख-रेख में ‘बाणभट्ट’ और ‘मयूरभट्ट’ जैसे मशहूर कवियों का जन्म हुआ था. यही नहीं, हर्ष खुद भी एक बहुत ही मंजे हुए नाटककार के रूप में सामने आए. ‘नागनन्दा’, ‘रत्नावली’ और ‘प्रियदर्शिका’ उनके द्वारा लिखे गए कुछ नामचीन नाटक हैं. प्रयाग में हर साल होने वाला ‘कुम्भ मेला’, जो सदियों से चला आ रहा है और हिन्दू धर्म के प्रचारकों के बीच काफी प्रसिद्ध है; माना जाता है कि वो भी राजा हर्ष ने ही शुरु करवाया था. भारत की अर्थव्यवस्था ने हर्ष के शासनकाल में बहुत तरक्की की थी. भारत, जो मुख्य तौर पर एक कृषि-प्रधान देश माना जाता है; हर्ष के कुशल शासन में तरक्की की उचाईयों को छू रहा था. हर्ष के शासनकाल में भारत ने आर्थिक रूप से बहुत प्रगति की थी.

हर्ष के बाद उनके राज्य को संभालने के लिए उनका कोई भी वारिस नहीं था. हर्षवर्धन के अपनी पत्नी दुर्गावती से 2 पुत्र थे- वाग्यवर्धन और कल्याणवर्धन. पर उनके दोनों बेटों की अरुणाश्वा नामक मंत्री ने हत्या कर दी. इस वजह से हर्ष का कोई वारिस नहीं बचा. 647 ई. में हर्ष के मरने के बाद, उनका साम्राज्य भी धीरे-धीरे बिखरता चला गया और फिर समाप्त हो गया. उनके बाद जिस राजा ने कन्नौज की बागडोर संभाली थी, वह बंगाल के राजा के विरुद्ध जंग में हार गया. वारिस न होने की वजह से, सम्राट हर्षवर्धन का साम्राज्य छिन्न-भिन्न हो गया.

मगध पर पालवंश की स्थापना

पालवंश पूर्व मध्यकालीन राजवंश था जिन्होंने मगध पर 750ई. से लेकर 1174 ई. तक शासन किया. जब हर्षवर्धन काल के बाद समस्त उत्तरी भारत में राजनीतिक, सामाजिक एवं आर्थिक गहरा संकट उत्पन६न हो गया, तब बिहार, बंगाल और उड़ीसा के सम्पूर्ण क्षेत्र में पूरी तरह अराजकत फैली थी. इसी समय गोपाल ने बंगाल में एक स्वतन्त्र राज्य घोषित किया. जनता द्वारा गोपाल को सिंहासन पर आसीन किया गया था. वह योग्य और कुशल शासक था, जिसने 750 ई. से 770 ई. तक शासन किया. इस दौरान उसने औदंतपुरी (बिहार शरीफ) में एक मठ तथा विश्‍वविद्यालय का निर्माण करवाया. पाल शासक बौद्ध धर्म को मानते थे. आठवीं सदी के मध्य में पूर्वी भारत में पाल वंश का उदय हुआ. गोपाल को पाल वंश का संस्थापक माना जाता है.

गोपाल के बाद उसका पुत्र धर्मपाल 770 ई. में सिंहासन पर बैठा. धर्मपाल ने 40 वर्षों तक शासन किया. धर्मपाल ने कन्‍नौज के लिए त्रिदलीय संघर्ष में उलझा रहा. उसने कन्‍नौज की गद्दी से इंद्रायूध को हराकर चक्रायुध को आसीन किया. चक्रायुध को गद्दी पर बैठाने के बाद उसने एक भव्य दरबार का आयोजन किया तथा उत्तरापथ स्वामिन की उपाधि धारण की. धर्मपाल बौद्ध धर्मावलम्बी था. उसने काफी मठ व बौद्ध विहार बनवाये. उसने भागलपुर जिले में स्थित विक्रमशिला विश्‍वविद्यालय का निर्माण करवाया था. उसके देखभाल के लिए सौ गाँव दान में दिये थे. उल्लेखनीय है कि प्रतिहार राजा नागभट्ट द्वितीय एवं राष्ट्रकूट राजा ध्रुव ने धर्मपाल को पराजित किया था.

धर्मपाल के बाद उसका पुत्र देवपाल गद्दी पर बैठा. इसने अपने पिता के अनुसार विस्तारवादी नीति का अनुसरण किया. इसी के शासनकाल में अरब यात्री सुलेमान आया था. उसने मुंगेर को अपनी राजधानी बनाई. उसने पूर्वोत्तर में प्राज्योतिषपुर, उत्तर में नेपाल, पूर्वी तट पर उड़ीसा तक विस्तार किया. कन्‍नौज के संघर्ष में देवपाल ने भाग लिया था. उसके शासनकाल में दक्षिण-पूर्व एशिया के साथ भी मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध रहे. उसने जावा के शासक बालपुत्रदेव के आग्रह पर नालन्दा में एक विहार की देखरेख के लिए 5 गाँव अनुदान में दिए. देवपाल ने 850ई. तक शासन किया था.

देवपाल के बाद पाल वंश की अवनति प्रारम्भ हो गयी. मिहिरभोज और महेन्द्रपाल के शासनकाल में प्रतिहारों ने पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार के अधिकांश भागों पर अधिकार कर लिया. 11वीं सदी में महीपाल प्रथम ने शासन किया. महीफाल को पाल वंश का द्वितीय संस्थापक कहा जाता है. उसने समस्त बंगाल और मगध पर शासन किया. महीपाल के बाद पाल वंशीय शासक निर्बल थे जिससे आन्तरिक द्वेष और सामन्तों ने विद्रोह उत्पन्‍न कर दिया था. गोविन्द पाल, पाल राजवंश के अंतिम राजा थे. उन्होंने 1162 से 1174 तक बंगाल पर राज किया. इसके बाद बंगाल पर सेन राजवंश का शासन प्रारंभ हुआ.

भारत के महान वीर योद्धा पोरस जिन्होंने विश्व विजेता सिकंदर को नानी याद दिला दिया

सिकंदर (356 ईपू से 323 ईपू) मेसेडोनिया. का ग्रीक प्रशासक था. वह एलेक्ज़ेंडर तृतीय तथा एलेक्ज़ेंडर मेसेडोनियन नाम से भी जाना जाता है. सिकंदर अपने पिता की मृत्यु के पश्चात अपने सौतेले व चचेरे भाइयों का कत्ल करने के बाद यूनान के मेसेडोनिया के सिन्हासन पर बैठा था. अपनी महत्वाकांक्षा के कारण वह विश्व विजय को निकला. उसकी खास दुश्मनी ईरानियों से थी. सिकंदर ने ईरान के पारसी राजा दारा को पराजित कर दिया और विश्व विजेता कहलाने लगा. यहीं से उसकी भूख बड़ गई. इतिहास में वह कुशल और यशस्वी सेनापतियों में से एक माना गया है. अपनी मृत्यु तक वह उन सभी भूमि मे से लगभग आधी भूमि जीत चुका था. उसने अपने कार्यकाल में इरान, सीरिया, मिस्र, मसोपोटेमिया, फिनीशिया, जुदेआ, गाझा, बॅक्ट्रिया तक के प्रदेश पर विजय प्राप्त की थी लेकिन भारत के महान राजा पोरस ने उसे पराजित कर दिया.

जब सिकंदर ईरान से आगे बड़ा तो उसका सामना भारतीय सीमा पर बसे छोटे छोटे राज्यों से हुआ. भारत की सीमा में पहुंचते ही छोटे-छोटे राजाओ को पराजित कर उनके राज्अय पर अधिकार कर लिया और आगे बढ़ने पर भारत के गांधार-तक्षशिला के राजा आम्भी ने सिकंदर से लड़ने के बजाय उसका भव्य स्वागत किया. आम्भी ने ऐसे इसलिए किया क्योंकि उसे राजा पोरस से शत्रुता थी और दूसरी ओर उसकी सहायता करने वाला कोई नहीं था. गांधार-तक्षशिला के राजा आम्भी ने पोरस के खिलाफ सिकंदर की गुप्त रूप से सहायता की. सिकंदर ने पोरस के पास एक संदेश भिजवाया जिसमें उसने पोरस से सिकंदर के समक्ष समर्पण करने की बात लिखी थी, लेकिन पोरस एक महान योद्ध था उसने सिकंदर की अधीनता अस्वीकार कर दी और युद्ध की तैयारी करना शुरू कर दी. पुरुवंशी महान सम्राट पोरस का साम्राज्य विशालकाय था. महाराजा पोरस सिन्ध-पंजाब सहित एक बहुत बड़े भू-भाग के स्वामी थे. पोरस का साम्राज्य जेहलम (झेलम) और चिनाब नदियों के बीच स्थित था. पोरस अपनी बहादुरी के लिए विख्यात था.

सिकंदर अपने चुने हुए 11 हजार आम्भी की सेना भारतीय और सिकंदर की सेना के यूनानी सैनिकों को लेकर झेलम पार की. राजा पुरु जिसको स्वयं यवनी 7 फुट से ऊपर का बताते हैं, अपनी शक्तिशाली गजसेना के साथ यवनी सेना पर टूट पड़े. पोरस की हस्ती सेना ने यूनानियों का भयंकर रूप से संहार किया उससे सिकंदर और उसके सैनिक आतंकित हो उठे. इस युद्ध में पहले दिन ही सिकंदर की सेना को जमकर टक्कर मिली. सिकंदर की सेना के कई वीर सैनिक हताहत हुए. यवनी सरदारों के भयाक्रांत होने के बावजूद सिकंदर अपने हठ पर अड़ा रहा और अपनी विशिष्ट अंगरक्षक एवं अंत: प्रतिरक्षा टुकड़ी को लेकर वो बीच युद्ध क्षेत्र में घुस गया. कोई भी भारतीय सेनापति हाथियों पर होने के कारण उन तक कोई खतरा नहीं हो सकता था, राजा की तो बात बहुत दूर है. राजा पुरु के भाई अमर ने सिकंदर के घोड़े बुकिफाइलस (संस्कृत-भवकपाली) को अपने भाले से मार डाला और सिकंदर को जमीन पर गिरा दिया. ऐसा यूनानी सेना ने अपने सारे युद्धकाल में कभी होते हुए नहीं देखा था.

सिकंदर जमीन पर गिरा तो सामने राजा पुरु तलवार लिए सामने खड़ा था. सिकंदर बस पलभर का मेहमान था कि तभी राजा पुरु ठिठक गया. यह डर नहीं था, बल्कि यह आर्य राजा का क्षात्र धर्म था, कि किसी निहत्थे राजा को यूं न मारा जाए. यह सहिष्णुता पोरस के लिए भारी पड़ गई. पोरस कुछ समझ पाता तभी सिकंदर के अंगरक्षक उसे तेजी से वहां से उठाकर भगा ले गए. सिकंदर की सेना का मनोबल भी इस युद्ध के बाद टूट गया था और उसने नए अभियान के लिए आगे बढ़ने से इंकार कर दिया था. इसके बाद सिकंदर वापस अपने प्रदेश को लौटने लगा और रास्ते में ही बीमार पर गया जहाँ उसका निधन हो गया.

भारत पर मोहम्मद बिन कासिम का आक्रमण

मुहम्मद बिन क़ासिम इस्लाम के शुरूआती काल में उमय्यद ख़िलाफ़त के एक अरब सिपहसालार थे. उनहोंने 17 साल की उम्र में भारतीय उपमहाद्वीप के पश्चिमी इलाक़ों पर हमला बोला और सिन्धु नदी के साथ लगे सिंध और पंजाब क्षेत्रों पर क़ब्ज़ा कर लिया. यह अभियान भारतीय उपमहाद्वीप में आने वाले मुस्लिम राज का एक बुनियादी घटना-क्रम माना जाता है. इन्होंने राजा दाहिर को रावर के युद्ध में बुरी तरह परास्त किया. मुहम्मद बिन क़ासिम का जन्म आधुनिक सउदी अरब में स्थित ताइफ़ शहर में हुआ था. वह उस इलाक़े के अल-सक़ीफ़ क़बीले का सदस्य था. उसके पिता क़ासिम बिन युसुफ़ का जल्द ही देहांत हो गया और उसके ताऊ हज्जाज बिन युसुफ़ ने (जो उमय्यादों के लिए इराक़ के राज्यपाल थे) उसे युद्ध और प्रशासन की कलाओं से अवगत कराया. उसने हज्जाज की बेटी ज़ुबैदाह से शादी कर ली और फिर उसे सिंध पर मकरान तट के रास्ते से आक्रमण करने के लिए रवाना कर दिया गया.

मुहम्मद बिन क़ासिम के भारतीय अभियान को हज्जाज कूफ़ा के शहर में बैठा नियंत्रित कर रहा था. 710 ईसवी में ईरान के शिराज़ शहर से 6000 सीरियाई सैनिकों, 600 ऊंटों की सेना तथा 3000 सामान ढोने वाले बाख्त्री ऊंट थे और अन्य दस्तों को लेकर मुहम्मद बिन क़ासिम पूर्व की ओर निकला. मकरान में वहाँ के राज्यपाल ने उसे और सैनिक दिए. उस समय मकरान पर अरबों का राज था और उसे पूर्व जाते हुए फ़न्नाज़बूर और अरमान बेला में विद्रोहों को भी कुचलना पड़ा. फिर वे किश्तियों से सिंध के आधुनिक कराची शहर के पास स्थित देबल की बंदरगाह पर पहुंचे, जो उस ज़माने में सिंध की सबसे महत्वपूर्ण बंदरगाह थी.

देबल से अरब फ़ौजें पूर्व की ओर निकलती गई और रास्ते में नेरून और सहवान जैसे शहरों को कुचलती गई. यहाँ उन्होंने बहुत बंदी बनाए और उन्हें गुलाम बनाकर भारी संख्या में हज्जाज और ख़लीफ़ा को भेजा. बहुत सा ख़ज़ाना भी भेजा गया और कुछ सैनिकों में बाँटा गया. बातचीत करके अरबों ने कुछ स्थानीय लोगों को भी अपने साथ मिला लिया. सिन्धु नदी के पार रोहड़ी में दाहिर सेन की सेनाएँ थीं जो हराई गई. दाहिर सेन की मृत्यु हो गई और मुहम्मद बिन क़ासिम का सिंध पर क़ब्ज़ा हो गया. दाहिर सेन के सगे-सम्बन्धियों को दास बनाकर हज्जाज के पास भेज दिया गया. ब्राह्मनाबाद और मुल्तान पर भी अरबी क़ब्ज़ा हो गया. यहाँ से मुहम्मद बिन क़ासिम ने सौराष्ट्र की तरफ दस्ते भेजे लेकिन राष्ट्रकूटों के साथ संधि हो गई. उसने भी बहुत से भारतीय राजाओं को ख़त लिखे की वे इस्लाम अपना लें और आत्म-समर्पण कर दें. उसने कन्नौज की तरफ 10000 सैनिकों की सेना भेजी लेकिन कूफ़ा से उसे वापस आने का आदेश आ गया और यह अभियान रोक दिया गया।.

मुहम्मद बिन क़ासिम भारत में अरब साम्राज्य के आगे विस्तार की तैयारी कर रहा था जब हज्जाज की मृत्यु हो गई और ख़लीफ़ा अल-वलीद प्रथम का भी देहांत हो गया. अल वलीद का छोटा भाई सुलयमान बिन अब्द-अल-मलिक अगला ख़लीफ़ा बना. अपने तख़्त पर आने के लिए वह हज्जाज के राजनैतिक दुश्मनों का आभारी था और उसने फ़ौरन हज्जाज के वफ़ादार सिपहसालारों, मुहम्मद बिन क़ासिम और क़ुतैबाह बिन मुस्लिम, को वापस बुला लिया. उसने याज़िद बिन अल-मुहल्लब को फ़ार्स, किरमान, मकरान और सिंध का राज्यपाल नियुक्त किया. याज़िद को कभी हज्जाज ने बंदी बनाकर कठोर बर्ताव किया था इसलिए उसने तुरंत मुहम्मद बिन क़ासिम को बंदी बनाकर बेड़ियों में डाल दिया. मुहम्मद बिन क़ासिम की मौत की दो कहानियाँ बताई जाती हैं:

'चचनामा' नामक ऐतिहासिक वर्णन के अनुसार मुहम्मद बिन क़ासिम ने राजा दाहिर सेन की बेटियों सूर्या और परिमला को तोहफ़ा बनाकर ख़लीफ़ा के पास भेजा था. जब ख़लीफ़ा उनके पास आया तो उन्होंने अपने पिता की मृत्यु का बदला लेने के लिए कहा कि मुहम्मद बिन क़ासिम पहले ही उनकी इज़्ज़त लूट चूका है और अब ख़लीफ़ा के पास भेजा है. ख़लीफ़ा ने मुहम्मद बिन क़ासिम को बैल की चमड़ी में लपेटकर वापस दमिश्क़ मंगवाया और उसी चमड़ी में बंद होकर दम घुटने से वह मर गया. जब ख़लीफ़ा को पता चला कि बहनों ने उस से झूठ कहा था तो उन्हें ज़िन्दा दीवार में चुनवा दिया.

मोहम्मद बिन कासिम हज्जाज बिन युसुफ़ का दामाद भी था और इराक और ईरान के साहिलों इलाकों में हज्जाज बिन युसुफ़ का दखल इतना बढ़ चुका था कि चाह कर भी खलीफा उसकी मुखालिफत नहीं कर सकता था. सिंध में लगातार हो रही नाकामी के बावजूद भी वलीद बिन अब्दुल मलिक नहीं चाहते थे कि हज्जाज अपने दामाद मोहम्मद बिन कासिम को लश्करकशी का जिम्मा सौपें लेकिन हज्जाज ने यही किया, और यहीं से उस कहानी की शुरुआत हुई कि जिसका अंजाम मोहम्मद बिन कासिम के साथ खत्म हुआ.

भारत पर महमूद गजनवी का आक्रमण

महमूद गजनवी गजनी का प्रमुख शासक था जिसने 997 से 1030 तक शासन किया. वह सुबक्त्गीन का पुत्र था. भारत की धन-संपत्ति से आकर्षित होकर, गजनवी ने भारत पर कई बार आक्रमण किए. वास्तव में गजनवी ने भारत पर 17 बार आक्रमण किया. उसके आक्रमण का मुख्य मकसद भारत की संपत्ति को लूटना था. महमूद गजनी ने पहली बार 1001 ईस्वी में आधुनिक अफ़्गानिस्तान और पाकिस्तान पर हमला किया था. इसने हिन्दू शासक जयपाल को पराजित किया जिसने बाद में आत्महत्या कर ली और उसका पुत्र आनंदपाल उसका उत्तराधिकारी बना.

गजनी ने भाटिया पर 1005 ईस्वी में और मुल्तान पर 1006 ईस्वी में हमला किया. इसी दौरान आनंदपाल ने उस पर हमला किया. गजनी के महमूद ने भटिंडा के शासक सुखपाल पर 1007 ईस्वी में हमला किया और उसे कुचल दिया. गजनी ने पंजाब के पहाड़ियों में नगरकोट पर 1011 ईस्वी में हमला किया. महमूद ने, आनंदपाल के शाही राज्य पर आक्रमण किया और उसे वैहिंद के युद्ध में, पेशावर के निकट हिन्द शाही राजधानी में 1013 ईस्वी में हरा दिया. गजनी के महमूद ने 1014 ईस्मेंवी थानेसर पर और 1015 ईस्वी में कश्मीर पर आक्रमण किया. इसने 1018 ईस्वी में मथुरा पर आक्रमण किया और शासकों के गठबंधन को हरा दिया, जिसमे चन्द्रपाल नाम का शासक भी था.

महमूद ने 1021 ईस्वी में कनौज के राजा चन्देल्ला गौड़ को हराकर, कनौज को जीत लिया. महमूद गजनी के द्वारा ग्वालियर पर 1023 ईस्वी में हमला हुआ और उस पर कब्जा कर लिया. महमूद गजनी ने 1025 ईस्वी में सोमनाथ मंदिर पर हमला किया ताकि मंदिर के अंदर की धन संपत्ति को लूट कर एकत्रित कर सके. अपने आखिरी आक्रमण के दौरान मलेरिया के कारण महमूद गजनवी की 1030 AD में मृत्यु हो गई.

महमूद गजनवी भारत की अधिक धन संपत्ति से आकर्षित था. इसी कारण उसने भारत पर एक के बाद एक हमले किए. इसने भारत पर आक्रमण के दौरान धार्मिक आयाम को भी जोड़ा. गजनी ने सोमनाथ, कांगड़ा, मथुरा और ज्वालामुखी के मंदिरों को नष्ट कर के “मूर्ति तोड़” के रूप में नाम कमाना चाहा. यद्यपि भारत पर गजनवी के आक्रमणों का कोई गहरा राजनीतिक असर नहीं है. इन आक्रमणों ने राजपूत राजाओं की युद्ध रणनितियों की कमियों के बारे में खुलासा कर दिया. इससे एक खुलासा और हुआ कि भारत में राजनीतिक एकरूपता नहीं थी और इस बात ने भविष्य में ज्यादा हमलों को बुलावा दिया.

मुहम्मद गौरी का भारत पर आक्रमण और पृथ्वी राज चौहान से युद्ध

शिहाबुद्दीन उर्फ़ मुइज़ुद्दीन मुहम्मद ग़ौरी 12वीं शताब्दी का अफ़ग़ान सेनापति था जो 1202 ई. में ग़ौरी साम्राज्य का सुल्तान बना. ग़ोरी राजवंश की नीव अला-उद-दीन जहानसोज़ ने रखी और सन् 1161 में उसके देहांत के बाद उसका पुत्र सैफ़-उद-दीन ग़ोरी सिंहासन पर बैठा. अपने मरने से पहले अला-उद-दीन जहानसोज़ ने अपने दो भतीजों - शहाबुद्दीन (मुहम्मद ग़ोरी) और ग़ियास-उद-दीन - को क़ैद कर रखा था लेकिन सैफ़-उद-दीन ने उन्हें रिहा कर दिया. उस समय ग़ोरी वंश ग़ज़नवियों और सलजूक़ों की अधीनता से निकलने के प्रयास में था. उन्होंने ग़ज़नवियों को तो 1148-1149 में ही ख़त्म कर दिया था लेकिन सलजूक़ों का तब भी ज़ोर था और उन्होंने कुछ काल के लिए ग़ोर प्रान्त पर सीधा क़ब्ज़ा कर लिए था, हालांकि उसके बाद उसे ग़ोरियों को वापस कर दिया था. सलजूक़ों ने जब इस क्षेत्र पर नियंत्रण किया था जो उन्होंने सैफ़-उद-दीन की पत्नी के ज़ेवर भी ले लिए थे. गद्दी ग्रहण करने के बाद एक दिन सैफ़-उद-दीन ने किसी स्थानीय सरदार को यह ज़ेवर पहने देख लिया और तैश में आकर उसे मार डाला. जब मृतक के भाई को कुछ महीनो बाद मौक़ा मिला तो उसने सैफ़-उद-दीन को बदले में भाला मरकर मार डाला. इस तरह सैफ़-उद-दीन का शासनकाल केवल एक वर्ष के आसपास ही रहा. ग़ियास-उद-दीन नया शासक बना और उसके छोटे भाई शहाबुद्दीन ने उसका राज्य विस्तार करने में उसकी बहुत वफ़ादारी से मदद करी. शहाबुद्दीन उर्फ़ मुहम्मद ग़ोरी ने पहले ग़ज़ना पर क़ब्ज़ा किया, फिर 1175 में मुल्तान और ऊच पर और फिर 1186 में लाहौर पर. जब उसका भाई 1202 में मरा तो शहाबुद्दीन मुहम्मद ग़ोरी सुलतान बन गया.

उस समय दिल्ली पर पृथ्वीराज के नाना तोमरवंश के अनंगदेव का आधिपत्य था. उनका कोई वारिस नहीं था. अपने नवासे के युद्ध कौशल और राज-काज से प्रभावित होकर अनंगदेव ने पृथ्वीराज को दिल्ली का साम्राज्य सौंप दिया. उसके बाद पृथ्वीराज ने आस-पास के छोटे राज्यों को फतह कह अपने अधीन कर लिया. 1182 में तब के जेजाकभूक्ति के राजा परमर्दिदेव को हराकर अपने साम्राज्य के अधीन कर लिया. आज का बुंदेलखंड ही तब जेजाकभूक्ति के नाम से जाना जाता था. इस युद्ध में कन्नौज के राजा जयचंद ने परमर्दिदेव का साथ दिया था लिहाजा पृथ्वीराज ने कन्नौज पर भी धावा बोला. अपने साम्राज्य का विस्तार करते हुए पृथ्वीराज चौहान ने गुजरात के चालुक्य शासक भीम प्रथम को भी परास्त किया.

जिन वर्षों में भारतवर्ष के अंदर पृथ्वीराज अपने अजेय अभियान पर थे उसी दौरान मोहम्मद गोरी अफगानिस्तान और उसके आस-पास के क्षेत्रों को जीतने में जुटा था. 1186 में लाहौर जीतकर गोरी ने सियालकोट के किले पर कब्जा कर लिया. जाहिर है उसकी नजर दिल्ली पर थी. लेकिन पृथ्वीराज चौहान जैसे प्रतापी राजा से सीधे टकराने की हिम्मत वो नहीं कर पा रहा था. लिहाजा उसने अपनी सैन्य शक्ति बढ़ानी शुरू कर दी. इसी दौरान पृथ्वी राज से खार खाए बैठे जयचंद ने गोरी को दिल्ली पर हमले के लिए उकसाया और हर तरह से मदद का भरोसा दिया. शह पाकर गोरी ने 1 लाख 20 हजार की विशाल सेना के साथ 1191 में दिल्ली की ओर बढ़ना शुरू किया. परमवीर पृथ्वीराज को जब इसकी सूचना मिली तो उन्होंने गोरी को रोकने के लिए अपनी विशाल सेना के साथ कूच कर दिया. हरियाणा के तराइन में दोनों विशाल सेनाओं के बीच महासंग्राम हुआ. गोरी की सेना में घुड़सवार थे तो पृथ्वीराज की सेना में हजारों हाथी थे. गोरी की ज्यादातर सेना मारी गई. बचे खुचे सैनिक युद्धभूमि छोड़कर भागने लगे. जख्मी गोरी को पृथ्वीराज की सेना ने अपने कब्जे में ले लिया. माफ़ी माँगी तो छोड़ दिया गोरी को

पृथ्वीराज के हत्थे चढ़ा मोहम्मद गोरी काफी शातिर था. उसे पता था कि भारत के शूरवीर दया और करुणा के भाव से भी भरे होते हैं. लिहाजा उसने माफी की मांग के साथ कई तरह की कसमें खाईं दिल्ली पर आइंदा नजर उठाकर भी नहीं देखने का स्वांग किया और यहीं हो गई पृथ्वीराज से भूल. हालांकि उनके दरबारियों ने मोहम्मद गोरी को रिहा नहीं करने के लिए उन्हें बहुत समझाया लेकिन दया की भीख मांगने वाले को दंड देना उन्हें अनुचित लगा और उन्होंने उसे रिहा कर दिया.

तराइन के दूसरे युद्ध ने बदल दिया हिन्दुस्तान का इतिहास हमेशा के लिए. पर युद्ध की चर्चा से पहले पृथ्वी राज चौहान के अनोखे प्रेम प्रसंग की चर्चा जरूरी है. कन्नौज के राजा जयचंद की पुत्री संयोगिता बला की खूबसूरत थीं. कहते हैं उनके महल में एक बार एक चित्रकार आया जिसके पास दूसरी तस्वीरों के अलावा पृथ्वीराज चौहान की भी तस्वीर थी. पृथ्वी राज की तस्वीर को देखते ही संयोगिता का दिल उनपर आ गया. मन ही मन संयोगिता ने पृथ्वी राज को पति के रूप में स्वीकार भी कर लिया. उसी चित्रकार ने संयोगिता का भी बेहतरीन चित्र बनाया और उसे ले जाकर पृथ्वीराज चौहान को दे दिया. दिलकश संयोगिता की तस्वीर देखकर पृथ्वीराज चौहान अपनी सुध-बुध खो बैठे. उन्होंने हर हाल में संयोगिता को अपना बनाने का संकल्प लिया.

इसी दौरान जयचंद ने संयोगिता के स्वयंवर का ऐलान किया और दूर देश के राजाओं को भी निमंत्रण भेजा. पर पृथ्वीराज को जानबूझ कर नहीं बुलाया. अलबत्ता उसने महल के बाहर एक दरबान के रूप में पृथ्वी राज का बुत बनाकर खड़ा कर दिया. ताकि उनकी बेइज्जती हो. पृथ्वीराज को सारी कहानी पता चल गई थी. इसलिए वो बगैर किसी को बताए स्वयंवर में पहुंच गए थे. तय कार्यक्रम के मुताबिक संयोगिता वरमाला लेकर आगे बढ़ी लेकिन किसी राजा के गले में न डालकर पृथ्वीराज के बुत के गले में डालने की कोशिश की. पृथ्वीराज अपने ही बुत के पीछे खड़े थे इस तरह वरमाला उनके गले में पड़ गई. ये देख जयचंद आग बबूला हो उठा लेकिन इससे पहले कि वो कुछ करता पृथ्वीराज संयोगिता को लेकर वहां से निकल लिए.

जयचंद पृथ्वीराज से पहले से ही नफरत करता था. स्वयंवर की घटना के बाद उसने पृथ्वीराज को नेस्तनाबूद करने की मुहिम में जुट गया. उधर तराइन के पहले युद्ध में पृथ्वीराज से बुरी तरह शिकस्त खा चुका मोहम्मद गोरी अपनी हार और रुसवाई का बदला लेने को मचल रहा था. 1192 में पहले से भी बड़ी सेना लेकर उसने दोबारा कूच किया. उसी तराइन की युद्ध भूमि में एक बार फिर भीषण कोहराम मचा. इस बार भी प्रतापी पृथ्वीराज और उनकी बहादुर सेना गोरी के सैनिकों पर भारी पड़ने लगी.

कहते हैं कि इसी बीच जयचंद ने मोहम्मद गोरी को एक तरकीब सुझाई. उसने कहा कि हिन्दुस्तान की ये सदियों पुरानी परंपरा रही है कि सूर्यास्त के बाद और सूर्योदय से पहले यहां के सैनिक दुश्मनों पर हथियार नहीं उठाते. लिहाजा गोरी की सेना पृथ्वीराज पर तब आक्रमण करे जब उनके सैनिक सो रहे हों. मोहम्मद गोरी को जयचंद की ये अमानवीय सलाह पसंद आ गई और उसने ऐसा ही किया. सोए सैनिकों पर अचानक हमला बोल दिया गया. जबतक पृथ्वीराज और उनके सैनिक हथियार उठाते तबतक बहुत रक्त बह चुका था. आखिरकार छल और अमानवीय करतूत के बूते गोरी युद्ध जीतने में कामयाब रहा. उसने पृथ्वीराज को बंदी बना लिया.

बंदी बनाने के बाद मोहम्मद गोरी ने पृथ्वीराज को अपने साथ अफगानिस्तान ले गया और वहां उन्हें काफी यातनाएं दी और गर्म सलाखों से उनकी दोनों आंखें फोड़ दी. चंद बरदाई पृथ्वीराज के बाल सखा थे और वे उनसे मिलने अफगानिस्तान गए. वहां पहुंचकर बरदाई ने मोहम्मद गोरी को पृथ्वीराज के शब्दभेदी वाण चलाने की कला के बारे में बताया. जब गोरी को यकीन नहीं हुआ तो चंद बरदाई ने अपनी योजना के मुताबिक पृथ्वीराज को तीर-कमान देकर अपनी आंखों से ये कला देखने की बात कही. मूर्ख मोहम्मद गोरी बरदाई की बात मान गया और उसने ऐसा ही किया. लक्ष्य तय कर दिया गया. लेकिन इसी बीच बरदाई पृथ्वीराज के पास गए और उनके कान में एक कविता पढ़ी

चार बांस चौबीस गज अंगुल अष्ट प्रमाण
ता ऊपर सुल्तान है मत चूको चौहान !!

ये सुनकर पृथ्वीराज समझ गए कि अब उन्हें क्या करना है. उन्होंने इस कविता के आधार पर प्रत्यंचा चढ़ाया और चला दिया तीर. वो तीर सीधे मोहम्मद गोरी के सीने में लगी और वो वहीं ढेर हो गया. इसके बाद चंद बरदाई को पता था कि क्या होने वाला है लिहाजा उन्होंने कटार घोंपकर पृथ्वी राज की वीरगति दे दी और उसी कटार से अपनी भी आहूति दे दी.

जानिए विश्व के प्रसिद्ध विश्वविद्यालय नालन्दा, विक्रमशिला और ओदंतपुरी को किसने जलाया

नालंदा विश्वविद्यालय: शिक्षा के मामले में आज भले ही भारत दुनिया के कई देशों से पीछे हो, लेकिन एक समय था, जब हिंदुस्तान शिक्षा का केंद्र हुआ करता था. भारत में ही दुनिया का पहला विश्वविद्यालय खुला था, जिसे नालंदा विश्वविद्यालय के नाम से जाना जाता है. इस विश्वविद्यालय की स्थापना गुप्त शासक कुमारगुप्त प्रथम (450-470) ने की थी. इस विश्वविद्यालय को नौवीं शताब्दी से बारहवीं शताब्दी तक अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त थी, लेकिन अब यह एक खंडहर बनकर रह चुका है, जहां दुनियाभर से लोग घूमने के लिए आते हैं. बिहार के नालंदा में स्थित इस विश्वविद्यालय में आठवीं शताब्दी से 12वीं शताब्दी के बीच दुनिया के कई देशों से छात्र पढ़ने आते थे. इस विश्वविद्यालय में करीब 10 हजार छात्र पढ़ते थे, जो भारत के विभिन्न क्षेत्रों के अलावा कोरिया, जापान, चीन, तिब्बत, इंडोनेशिया, फारस और तुर्की से आते थे. यहां करीब दो हजार शिक्षक पढ़ाते थे.

प्राचीन नालंदा विश्वविद्यालय स्थापत्य कला का एक अद्भुत नमूना है. आपको जानकर हैरानी होगी कि इस विश्वविद्यालय में तीन सौ कमरे, सात बड़े-बड़े कक्ष और अध्ययन के लिए नौ मंजिला एक विशाल पुस्तकालय था, जिसमें तीन लाख से भी अधिक किताबें थीं. प्राचीन नालंदा विश्वविद्यालय का पूरा परिसर एक विशाल दीवार से घिरा हुआ था, जिसमें प्रवेश के लिए एक मुख्य द्वार थ.। उत्तर से दक्षिण की ओर मठों की कतार थी और उनके सामने अनेक भव्य स्तूप और मंदिर थे. मंदिरों में बुद्ध भगवान की सुंदर मूर्तियां स्थापित थीं, जो अब नष्ट हो चुकी हैं. नालंदा विश्वविद्यालय की दीवारें इतनी चौड़ी हैं कि इनके ऊपर ट्रक भी चलाया जा सकता है.

विक्रमशिला विश्वविद्यालय: बिहार प्रांत के भागपलुर जिले में स्थित विक्रमशिला विश्वविद्यालय एक अन्तरराष्ट्रीय ख्याति का शिक्षा केन्द्र रहा है. विक्रमशिला के महाविहार की स्थापना नरेश धर्मपाल (775-800ई.) ने करवायी थी. यहाँ 160 विहार तथा व्याख्यान के लिये अनेक कक्ष बने हुये थे. धर्मपाल के उत्तराधिकारी तेरहवीं शताब्दी तक इसे राजकीय संरक्षण प्रदान करते रहे. परिणामस्वरूप विक्रमशिला लगभग चार शताब्दियों से भी अधिक समय तक अंतरराष्ट्रीय ख्याति का विश्वविद्यालय बना रहा. विश्वविद्यालय में अध्ययन के विशेष विषय व्याकरण, तर्कशास्त्र, मीमांसा, तंत्र, विधिवाद आदि थे. आचार्यों में दीपंकर श्रीज्ञान का नाम सर्वाधिक उल्लेखनीय है, जो इस विश्वविद्यालय के कुलपति थे. वर्तमान समय में विश्वविद्यालय के भग्नावशेष को देख कर इसके गौरवशाली अतीत और विख्याति की अनुभूति कर सकते है.

उदंतपुरी विश्वविद्यालय: ओदंतपुरा भारत में बौद्ध महाविहार था. यह 8 वीं शताब्दी में पाला सम्राट गोपाला प्रथम द्वारा स्थापित किया गया था. इसे नालंदा विश्वविद्यालय के बाद भारत का सबसे बड़ा और प्राचीन विश्वविद्यालय था और यह महाविहार भारत के मगध क्षेत्र के अंतर्गत हिरण्य प्रभात पर्वत नामक पहाड़ पर और पंचानन नदी के किनारे स्थित था. विक्रमाशिला के आचार्य श्री गंगा इस महाविहार में छात्र थे. तिब्बती रिकॉर्ड के मुताबिक ओडिंतपुरी में लगभग 12,000 छात्र थे और आधुनिक युग में, यह नालंदा जिले के मुख्यालय बिहार शरीफ में स्थित है. ,ओदांतपुरी में 500 बौद्ध भिक्षुक के रहने और खाने का इंतजाम था. राजा रामपाला के शासनकाल के दौरान, हिन्यान और महायान दोनों के हजारों भिक्षु ओडंतपुरी में रहते थे और कभी-कभी बारह हजार भिक्षु वहां एकत्र होते थे.

नालंदा, विक्रमशिला और ओदंतपुरी विश्वविद्यालय को जलाकर नष्ट कर दिया: तुर्की शासक बख्तियार खिलजी ने नालंदा, विक्रमशिला और ओदंतपुरी विश्वविद्यालय में आग लगाकर उसे जला दिया था. उसका पूरा नाम इख्तियारुद्दीन मुहम्मद बिन बख्तियार खिलजी था. बिहार का वह मुगल शासक था. उस समय दिल्ली के बादशाह कुतुबुद्दीन एबक ने यूपी के मिर्जापुर की जिम्मेदारी बख्तियार खिलजी को दिया था. यूपी से बिहार और बंगाल नजदीक होने के कारन उसका नजर बिहार और बंगाल पर पड़ा और वह पुरे बिहार पर अधिकार कर लिया. एक समय बख्तियार खिलजी बहुत ज्यादा बीमार पड़ गया. उसके हकीमों ने इसका काफी उपचार किया पर कोई फायदा नहीं हुआ. तब उसे नालंदा विश्वविद्यालय के आयुर्वेद विभाग के प्रमुख आचार्य राहुल श्रीभद्रजी से उपचार कराने की सलाह दी गई. उसने आचार्य राहुल को बुलवा लिया तथा इलाज से पहले शर्त लगा दी की वह किसी हिंदुस्तानी दवाई का सेवन नहीं करेगा. उसके बाद भी उसने कहा कि अगर वह ठीक नहीं हुआ तो आचार्य की हत्या करवा देगा.

अगले दिन आचार्य उसके पास कुरान लेकर गए और कहा कि कुरान की पृष्ठ संख्या इतने से इतने तक पढिए ठीक हो जाएंगे. उसने पढ़ा और ठीक हो गया. खिलजी के ठीक होने के जो वजह बताई जाती है वह यह है कि वैद्यराज राहुल श्रीभद्र ने कुरान के कुछ पृष्ठों के कोने पर एक दवा का अदृश्य लेप लगा दिया था. वह थूक के साथ मात्र दस बीस पेज चाट गया और ठीक हो गया. उसको खुशी नहीं हुई उसको बहुत गुस्सा आया कि उसके हकीमों से इन भारतीय वैद्यों का ज्ञान श्रेष्ठ क्यों है. बौद्ध धर्म और आयुर्वेद का एहसान मानने के बदले उसने भारत से आयुर्वेद को समाप्त करने के लिए 1199 में नालंदा, विक्रमशिला और ओदंतपुरी विश्वविद्यालय में ही आग लगवा दी. वहां इतनी पुस्तकेंं थीं कि आग लगी भी तो तीन माह तक पुस्तकेंं जलती रहीं. उसने हजारों धर्माचार्य और बौद्ध भिक्षु मार डाले. उसने इस एहसान का बदला नालंदा, विक्रमशिला और ओदंतपुरी विश्वविद्यालय को जलाकर दिया.

गुलाम वंश

गुलाम वंश मध्यकालीन भारत का एक राजवंश था. इस वंश का पहला शासक कुतुबुद्दीन ऐबक था जो मोहम्मद ग़ौरी का गुलाम था. ग़ुलामों को सैनिक सेवा के लिए ख़रीदा जाता था और मो. गौरी ने भी इसे खरीद कर लाया था. ये पहले ग़ौरी के सैन्य अभियानों के सहायक बने और फिर दिल्ली के सुल्तान. इन्होने गौरी की मृत्यु के बाद दिल्ली की सत्ता पर राज किया. कुतुबुद्दीन ऐबक का राज्य अभिषेक 12जून 1206 को हुआ. इस वंश ने दिल्ली की सत्ता पर 1206 से 1290 ईस्वी तक राज किया तथा भारत में इस्लामी शासन की नींव डाली. इससे पूर्व किसी भी मुस्लिम शासक ने भारत में लंबे समय तक प्रभुत्व कायम नहीं किया था. इसी समय चंगेज खाँ के नेतृत्व में भारत के उत्तर पश्चिमीक्षेत्र पर मंगोलों का आक्रमण भी हुआ था. इस वंश के निम्नलिखित शासक हुए:

1. कुतुबुद्दीन ऐबक 1206-1210
2. आरामशाह1210
3. इल्तुतमिश1210-1236
4. रूकुनुद्दीन फ़ीरोज़शाह1236
5. रजिया सुल्तान1236-1240
6. मुईज़ुद्दीन बहरामशाह1240-1242
7. अलाऊद्दीन मसूदशाह1242-1246
8. नासिरूद्दीन महमूद1246-1265
9. गयासुद्दीन बलबन1265-1287
10. शमशुद्दीन क्यूम़र्श1287-1290



मो. गौरी का गुलाम और गुलाम वंश का संस्थापक कुतुबुद्दीन ऐबक
क़ुतुबुद्दीन ऐबक दिल्ली सल्तनत के संस्थापक और ग़ुलाम वंश के पहले सुल्तान थे. 1206 में महमूद गौरी की मृत्यु के बाद कुतुबुद्दीन ऐबक दिल्ली के सिंहासन पर बैठा. इसी के साथ भारत में पहली बार गुलाम वंश की स्थापना हुई. कुतुबुद्दीन ऐबक का राज्य अभिषेक 12जून 1206 को हुआ. इसने अपनी राजधानी लाहौर को बनाया. ये ग़ौरी साम्राज्य के सुल्तान मुहम्मद ग़ौरी का गुलाम था. ग़ुलामों को सैनिक सेवा के लिए ख़रीदा जाता था. ये पहले ग़ौरी के सैन्य अभियानों के सहायक बने और फिर दिल्ली के सुल्तान. क़ुतुबुद्दीन तुर्किस्तान के निवासी थे और इनके माता पिता तुर्क थे. इस क्षेत्र में उस समय दास व्यापार का प्रचलन था और इसे लाभप्रद माना जाता था. दासों को उचित शिक्षा और प्रशिक्षण देकर उन्हें राजा के हाथ बेचना एक लाभदायी धन्धा था. बालक कुतुबुद्दीन इसी व्यवस्था का शिकार बना और उसे एक व्यापारी के हाथों बेच डाला गया. व्यापारी ने उसे फ़िर निशापुर के का़ज़ी फ़ख़रूद्दीन अब्दुल अज़ीज़ कूफी को बेच दिया. अब्दुल अजीज़ ने बालक क़ुतुब को अपने पुत्र के साथ सैन्य और धार्मिक प्रशिक्षण दिया. पर अब्दुल अज़ीज़ की मृत्यु के बाद उसके पुत्रों ने उसे फ़िर से बेच दिया और अंततः उसे मुहम्मद ग़ोरी ने ख़रीद लिया.

मुहम्मद ग़ोरी ने कुतुबुद्दीन ऐबक के साहस, कर्तव्यनिष्ठा तथा स्वामिभक्ति से प्रभावित होकर उसे शाही अस्तबल (घुड़साल) का अध्यक्ष नियुक्त कर दिया. यह एक सम्मानित पद था और उसने सैन्य अभियानों में भाग लेने का अवसर मिला. तराईन के द्वितीय युद्ध में राजपूत राजा पृथ्वीराज चौहान को बन्दी बनाने के बाद ऐबक को भारतीय प्रदेशों का सूबेदार नियुक्त किया गया. वह दिल्ली, लाहौर तथा कुछ अन्य क्षेत्रों का उत्तरदायी बना. उसने गोरी के सहायक के रूप में कई क्षेत्रों पर सैन्य अभियान में हिस्सा लिया था तथा इन अभियानों में उसकी मुख्य भूमिका रही थी. इसी से खुश होकर गोरी उसे इन क्षेत्रों का सूबेदार नियुक्त कर गया था. महमूद गोरी विजय के बाद राजपूताना में राजपूत राजकुमारों के हाथ सत्ता सौंप गया था पर राजपूत तुर्कों के प्रभाव को नष्ट करना चाहते थे. सर्वप्रथम, 1192 में उसने अजमेर तथा मेरठ में विद्रोहों का दमन किया तथा दिल्ली की सत्ता पर आरूढ़ हुआ. दिल्ली के पास इन्द्रप्रस्थ को अपना केन्द्र बनाकर उसने भारत के विजय की नीति अपनायी. भारत पर इससे पहले किसी भी मुस्लिम शासक का प्रभुत्व तथा शासन इतने समय तक नहीं टिका था.

जाट सरदारों ने हाँसी के किले को घेर कर तुर्क किलेदार मलिक नसीरुद्दीन के लिए संकट उत्पन्न कर दिया था पर ऐबक ने जाटों को पराजित कर हाँसी के दुर्ग पर पुनः अधिकार कर लिया. सन् 1194 में अजमेर के उसने दूसरे विद्रोह को दबाया और कन्नौज के शासक जयचन्द के साथ चन्दवार के युद्ध में अपने स्वामी का साथ दिया. 1195 इस्वी में उसने कोइल (अलीगढ़) को जीत लिया. सन् 1196 में अजमेर के मेदों ने तृतीय विद्रोह का आयोजन किया जिसमें गुजरात के राजपूत शासक भीमदेव का हाथ था. मेदों ने कुतुबुद्दीन के प्राण संकट में डाल दिये पर उसी समय महमूद गौरी के आगमन की सूचना आने से मेदों ने घेरा उठा लिया और ऐबक बच गया. इसके बाद 1197 में उसने भीमदेव की राजधानी अन्हिलवाड़ा को लूटा और अकूत धन लेकर वापस लौटा. 1197-98 के बीच उसने कन्नौज, चन्दवार तथा बदायूँ पर अपना कब्जा कर लिया. इसके बाद उसने सिरोही तथा मालवा के कुछ भागों पर अधिकार कर लिया. पर ये विजय चिरस्थायी नहीं रह सकी. इसी साल उसने बनारस पर आक्रमण कर दिया. 1202-03 में उसने चन्देल राजा परमर्दी देव को पराजित कर कालिंजर, महोबा पर हमला करके महोबा के राहिल देव वर्मन द्वारा नौवीं शताब्दी में निर्मित एक विशाल और प्रसिद्ध सूर्य मंदिर को ध्वस्त कर दिया और खजुराहो पर अधिकार कर अपनी स्थिति मज़बूत कर ली. इसी समय गोरी के सहायक सेनापति बख्यियार खिलजी ने बंगाल और बिहार पर अधिकार कर लिया.

ऐबक का गद्दी पर दावा कमजोर था पर उसने विषम परिस्थितियों में कुशलता पूर्वक काम किया और अंततः दिल्ली की सत्ता का शासक बना. कुतुबुद्दीन ऐबक ने यलदोज (गजनी) को दामाद, कुबाचा (मुलतान + सिंध) को बहनोई और इल्तुतमिश को अपना दामाद बनाया ताकि गौरी की मृत्यु के बाद सिंहासन का कोई और दावेदार ना बन सके. अपनी मृत्यु के पूर्व महमूद गोरी ने अपने वारिस के बारे में कुछ ऐलान नहीं किया था. उसे शाही ख़ानदान की बजाय तुर्क दासों पर अधिक विश्वास था. गोरी के दासों में ऐबक के अतिरिक्त गयासुद्दीन महमूद, यल्दौज, कुबाचा और अलीमर्दान प्रमुख थे. ये सभी अनुभवी और योग्य थे और अपने आप को उत्तराधिकारी बनाने की योजना बना रहे थे. गोरी ने ऐबक को मलिक की उपाधि दी थी पर उसे सभी सरदारों का प्रमुख बनाने का निर्णय नहीं लिया था. गोरी की हत्या 15 मार्च 1206 के बाद 12 जून 1206 को कुतुबुद्दीन ने अपना राज्याभिषेक किया पर उसने सुल्तान की उपाधि धारण नहीं की. इसका कारण था कि अन्य गुलाम सरदार यल्दौज और कुबाचा उससे ईर्ष्या रखते थे. उन्होंने मसूद को अपने पक्ष में कर ऐबक के लिए विषम परिस्थिति पैदा कर दी थी. हँलांकि तुर्कों ने बंगाल तक के क्षेत्र को रौंद डाला था फिर भी उनकी सर्वोच्चता संदिग्ध थी. राजपूत भी विद्रोह करते रहते थे पर इसके बावजूद ऐबक ने इन सबका डटकर सामना किया.

बख्तियार खिलजी की मृत्यु के बाद अलीमर्दान ने स्वतंत्रता की घोषणा कर दी थी तथा ऐबक के स्वामित्व को मानने से इंकार कर दिया था. इन कारणों से कुतुबुद्दीन का शासनकाल केवल युद्धों में ही बीता. इन्होंने केवल चार बरस (1206 –1210) ही राज किया. इसने अपने गुरु कुतुबद्दीन बख्तियार काकी की याद में कुतुब मीनार की नींव रखी परंतु वह इसका निर्माण कार्य पूरा नही करवा सका. इल्तुतमिश ने कुतुब मीनार का निर्माण कार्य पूरा करवाया. दिल्ली में स्थित कवेट-उल-इस्लाम मस्जिद और अजमेर का ढाई दिन का झोंपडा का निर्माण कुतुबुद्दीन ऐबक ने ही करवाया था. कवेट-उल-इस्लाम मस्जिद भारत में निर्मित पहली मस्जिद थी. 1210 में चौगान खेलते समय घोड़े से गिरकर इसकी मृत्यु हुई तथा इसे लाहौर में दफनाया गया था.

आरामशाह 1210
कुतुबुद्दीन ऐबक के बाद आरामशाह दिल्ली सल्तनत में गुलाम वंश का शासक बना. कुतुबुद्दीन की मृत्यु के बाद लाहौर के अमीरों ने जल्दबाजी में उसे दिल्ली का शासक बना दिया पर वो अयोग्य निकला. आरामशाह की हत्या कर इल्तुतमिश शासक बना. इसने लाहौर से राजधानी स्थानांतरित करके दिल्ली लाया. आरामशाहशाह 1210 में केेवल छ: महीने तक ही राज किया. इल्तुतमिश को गुलाम वंश का वास्तविक संस्थापक कहा जाता हैं. दिल्ली का शासक बनने से पहले यह बनदायू का राजा था. इसने दिल्ली के सिंहासन पर बैठने के बाद राजधानी को लाहौर से दिल्ली स्थांतरित किया. इल्तुतमिश इलबरी तुर्क था जो कुतुबुद्दीन ऐबक का दामाद व गुलाम था.

इल्तुतमिश (1210-1236)
इल्तुतमिश को गुलामो का ग़ुलाम कहा जाता है क्योंकि यह कुतुबुद्दीन ऐबक का गुलाम था जो (कुतुबुद्दीन ऐबक) खुद भी महमूद गौरी का गुलाम था. इल्तुतमिश इक्ता प्रथा और शुद्ध अर्बियन सिक्के चलाने वाला प्रथम शासक था. इसने सोने व चांदी के सिक्के चलाए जिसमें चांदी के सिक्कों को टंका और सोने के सिक्कों को जीतल कहा जाता था. इसको तुर्क ए चिहालगानी का फाऊंडर कहते हैं, तुर्क ए चिहालगानी चालीस गुलामों का समूह था जो हमेशा साए की तरह इल्तुतमिश के साथ रहता था. दिल्ली में स्थित नसीरुद्दीन का मकबरा इल्तुतमिश ने सुल्तान गोरही की याद में बनवाया था, यह मकबरा भारत में निर्मित प्रथम मकबरा था. इल्तुतमिश प्रथम शासक था जिसने 1229 ई.में बगदाद के खलीफा से सुल्तान की वैधानिक उपाधि हासिल की.

इसकी मृत्यु 1236 ई. में हुई. 1236 ई. में मरने से पहले इल्तुतमिश ने अपनी पुत्री रजिया को अपनी उतराधिकारी घोषित किया क्योंकि उसका बड़ा पुत्र महमूद मारा जा चुका था. परंतु तर्कों की व्यवस्ता के अनुसार कोई महिला उत्तराधिकारी नहीं बन सकती थी. जैसे ही इल्तुतमिश की मृत्यु हुई रजिया के उत्तराधिकारी घोषित किए जाने के बाद भी इल्तुतमिश की पत्नी शाह तुरकाना के नेतृत्व में उसके छोटे पुत्र रुकनुद्दीन फिरोज को सुल्तान बनाया गया. परन्तु चालीसा ने रुकनुद्दीन को गद्दी पर बिठाया.

सुल्तान रुकनुद्दीन फिरोज: (1236)
रुकनुद्दीन फिरोज 1236 में अपनी माता शाह तुरकाना के संरक्षण में सुल्तान घोषित किया गया. रुकनुद्दीन फिरोज की आलसी और विलासी प्रवृति होने के कारण यह किसी भी शासन के कार्यों में भाग नहीं लेता था जिसके चलते अधिकारी वर्ग के लोग जनता पर हावी हो रहे थे. रुकनुद्दीन फिरोज कुछ ही महीनों तक सुल्तान बना उसके बाद जनता के विद्रोह के कारण रजिया सुल्तान को सुल्ताना बनाया गया.

भारत की प्रथम महिला शासक रजिया सुल्तान: (1236-40)
देश के इतिहास में रजिया सुल्तान का नाम भारत की प्रथम महिला शासक के तौर पर दर्ज है. दिल्ली सल्तनत के दौर में गुलाम वंश के शासन कल में जब बेगमों को सिर्फ महलो के अंदर आराम के लिए रखा जाता था वही रजिया सुल्तान महल से बाहर निकलकर अपने हक के लिए युद्ध किया और शासन की बागडोर सम्भाली. रजिया सुल्तान का जन्म दिल्ली सल्तनत के मशहूर शासक एवं इतिहास के प्रसिद्ध सुल्तान शमसुद्दीन इल्तुतमिश के घर हुआ था. रजिया को इतिहास में रज़िया अल-दीन और शाही नाम जलालत उद-दिन रज़िया से भी जाना जाता है. रजिया सुल्तान तीन भाइयों में इकलौती और सबसे काबिल थी. रजिया सुल्तान का बचपन का नाम हफ्सा मोइन था लेकिन सभी उसे रजिया कहकर ही पुकारते थे. उनके पिता इल्तुतमिश ने रजिया सुल्तान की प्रतिभा को बचपन में ही भाप लिया था और उन्हें भी अपने बेटों की तरह ही सैन्य प्रशिक्षण दिया एवं उसके अंदर एक कुशल प्रशासक बनने के सभी गुण विकसित किए थे.

इल्तुतमिश ने पहले अपने बड़े बेटे को उत्तराधिकारी के रूप में तैयार किया था, लेकिन दुर्भाग्यवश उसकी अल्पायु में मृत्यु हो गयी. जिसके बाद इल्तुतमिश ने रजिया सुल्तान में कुशल प्रशासनिक व सैन्‍य गुण को पहचानते हुए अपनी उत्तराधिकारी बनाने की घोषणा कर दी. हालांकि दिल्ली के तख्त पर बैठना रजिया सुल्तान के लिए इतना आसान नहीं था. दरअसल, 1236 ई. में उनके पिता की मौत के बाद मुस्लिम समुदाय ने एक महिला को सुल्तान के रूप में स्वीकार करने से मना कर दिया था, और रजिया के भाई रुखुद्दीन फिरोज को दिल्ली के राजसिंहासन पर बैठा दिया. लेकिन रुकनुद्दीन फिरोज एक मूर्ख और अक्षम शासक साबित हुआ.

जिस पर रजिया ने आम जनमानस के सहयोग से राज्‍य पर धावा बोल कर सिंहासन पर कब्जा कर लिया. जिसके बाद रजिया की मां और भाई दोनों की हत्या कर दी गई और 10 नवंबर, 1236 ई. में रजिया सुल्तान पहली मुस्लिम शासक के रूप में दिल्ली की शासक बनी. रजिया सुल्तान ने अपनी बुद्धिमत्ता और विवेकशीलता के तर्ज पर दिल्ली का सिंहासन कुशलतापूर्वक संभाला और रुढ़िवादी मुस्लिम समाज को चौंका दिया और उन्होंने खुद को एक दूरदर्शी, न्यायप्रिय, व्यवहारकुशल, प्रजा के हित करने वाली शासिका साबित किया. उन्होंने अपने राज्य का जमकर विस्तार किया एवं विकास काम करवाए. गद्दी संभालने के बाद रज़िया ने रीति रिवाजों के विपरीत पुरुषों की तरह सैनिकों का कोट और पगड़ी पहनना पसंद किया. साथ ही युद्ध में बिना नकाब पहने शामिल होने लगी.

दिल्ली के सिंहासन पर बैठने वाली पहिला मुस्लिम महिला शासक रजिया सुल्तान एक कुशल प्रशासक थी, जिन्होंने एक आदर्श शासक की तरह अपने राज्य में विकास के काम किए. उन्होंने न सिर्फ अपने उत्तम सैन्य कुशलता के बल पर दिल्ली को सुरक्षित रखा, बल्कि अपने राज्य की कानून व्यवस्था को दुरुस्त किया, शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए कई स्कूल, कॉलेजों एवं शैक्षणिक संस्थानों का निर्माण करवाया. अपने राज्य में पानी की व्यवस्था को सुचारु ढंग से चलाने के लिए कुएं और नलकूप खुदवाए, सड़कें बनवाईं. इसके अलावा उन्होंने हिन्दू और मुस्लिम एकता के लिए काम किया और कला, संस्कृति व संगीत को भी प्रोत्साहन दिया.

रजिया सुल्तान का उनके गुलाम जमालुद्धीन याकूत के साथ मोहब्बत की कहानी की इतिहास में दर्ज है. रजिया सुल्तान को अपने सलाहकार याकूत के साथ इश्क हो गया था. दोनों का प्यार जल्द ही परवान चढ़ने लगा, जिसके बाद तमाम मुस्लिम शासकों ने इसका विरोध किया था. वहीं भटिंडा के गवर्नर इख्तिअर अल्तुनिया भी रजिया सुल्तान की खूबसूरती के कायल थे और वे किसी भी हाल में उनको पाना चाहते थे, साथ ही दिल्ली पर भी अपना कब्जा जमाना चाहते थे. जिसके चलते अल्तुनिया कई अन्‍य विद्रोहियों के साथ मिलकर ने दिल्ली पर हमला बोल दिया. रज़िया और अल्तुनिया के बीच युद्ध हुआ जिसमें याकूत मारा गया और रज़िया को बंदी बना लिया गया.

मरने के डर से रज़िया अल्तुनिया से शादी करने को तैयार हो गयी. इस बीच, रज़िया के भाई मैज़ुद्दीन बेहराम शाह ने सिंहासन हथिया लिया. अपनी सल्तनत की वापसी के लिये रज़िया और उसके पति अल्तुनिया ने बेहराम शाह से युद्ध किया, जिसमें उनकी हार हुई. उन्हें दिल्ली छोड़कर भागना पड़ा और अगले दिन वो कैथल पंहुचे, जहां उनकी सेना ने साथ छोड़ दिया. वहां डाकुओं के द्वारा 14 अक्टूबर 1240 को दोनों मारे गये। बाद में बेहराम को भी अयोग्यता के कारण गद्दी से हटना पड़ा.

दिल्ली की पहली महिला मुस्लिम शासक रजिया सुल्तान की कब्र पर आज भी इतिहासकार बंटे हुए हैं. कब्र के स्‍थान को लेकर इतिहासकारों के तीन अलग-अलग मत हैं. रजिया सुल्ताना की मजार पर दिल्ली, कैथल एवं टोंक अपना अपना दावा जताते आए हैं. लेकिन वास्तविक मजार पर अभी फैसला नहीं हो पाया है. वैसे रजिया की मजार के दावों में अब तक ये तीन दावे ही सबसे ज्यादा मजबूत हैं. इन सभी स्थानों पर स्थित मजारों पर अरबी फारसी में रजिया सुल्तान लिखे होने के संकेत तो मिले हैं लेकिन ठोस प्रमाण नहीं मिल सके हैं.

मुइज़ुधिन बहराम शाह - (1240-42)
1240 में रजिया सुल्तान की हत्या के बाद मुइजुधिन बहराम शाह सुलतान बना. बहराम शाह के शासन काल में 1241 में मंगोलों का आक्रमण हुआ जिसमें बहराम शाह मारा गया. मंगोलों ने पंजाब पर हमला किया था.

अलाउद्दीन मसूद शाह (1242-46)
बहराम शाह की मृत्यु के बाद 1242 में फिरोज शाह का पुत्र मसूद शाह सिहासन पर बैठा. मसूद शाह ने बलबन को अमीर- ए- हाजिब की उपाधि प्रदान की.

नासिरूद्दीन महमूद (1246-1265)
नासिरूद्दीन महमूद तुर्की शासक था, जिसका शासन काल 1246-1265 ई० तक रहा. जो दिल्ली सल्तनत का आठवां सुल्तान बना. बलबन ने षड़यंत्र के द्वारा 1246 में सुल्तान मसूद शाह को हटाकर नासीरुद्दीन महमूद को सुल्तान बनाया ये एक ऐसा सुल्तान हुआ जो टोपी सीकर अपनी जीविका निर्बहन करता था. बलबन ने अपनी पुत्री का विवाह नसीरूद्दीन महमूद से करवाया था. नासिरूद्दीन महमूद के जीवकोपार्जन का महत्वपूर्ण साधन कुरान को लिखकर बाजारों में बेचना था.

गयासुद्दीन बलबन (1265-1287)
गयासुद्दीन बलबन दिल्ली सल्तनत का नौवां सुल्तान था. वह 1266 में दिल्ली सल्तनत का सुल्तान बना. उसने अपने शासनकाल में चालीसा की शक्ति को क्षीण किया और सुल्तान को पद को पुनः गरिमामय बनाया. बलबन गुलाम वंश का सर्वाधिक महत्वपूर्ण शासक था. बलबन, इल्तुतमिश का दास था. इल्तुतमिश ने बलबन को खासदार नियुक्त किया था. इसके बाद बलबन को हांसी का इक्तादार भी नियुक्त किया गया. बलबन ने नासिरुद्दीन महमूद को सुल्तान बनाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया था. नासिरुद्दीन को सुल्तान बनाकर बलबन ने अधिकतर अधिकार अपने नियंत्रण में ले लिए थे. नासिरुद्दीन महमूद ने गियासुद्दीन बलबन को उलूग खां की उपाधि दी थी. नासिरुद्दीन महमूद की मृत्यु के बाद बलबन सुल्तान बना. बलबन के चार पुत्र थे सुल्तान महमूद, कैकुबाद, कैखुसरो और कैकआउस. बलबन का असली नाम बहाउधिन था. शासक बनने के बाद इसने सबसे पहले सेना का पुर्नगठन किया. सेना को दीवाने - ए- आरिज कहा जाता था. बलबन ने सिजदा और पेबोस प्रथा की शुरुआत की. इसने जिले - ए- इलाही तथा नियाबते खुदाई की उपाधि धारण की. बलबन ने इल्तुतमिश द्वारा बनाए गए चालीसा दल को समाप्त किया.

शमशुद्दीन क्यूम़र्श (1287-1290)
शमशुद्दीन क्यूम़र्श भारत में गुलाम वंश का अन्तिम शासक था. उसने दिल्ली पर ईस्वी सन 1290 तक शासन किया था. क्यूम़र्श एक तीन साल का बालक था. जलालुदीन खिलजी ने बाद में क्यूम़र्श की दोनो आंखें फोड कर सल्तनत का राजा बन गया. इसके साथ ही सन् 1290 मे खिलजी सल्तनत की स्थापना हुई.

भारत पर खिलजी वंश का शासन

खिलजी वंश मध्यकालीन भारत का एक राजवंश था. इसने दिल्ली की सत्ता पर 1290-1320 इस्वी तक राज किया. दिल्ली की मुस्लिम सल्तनत में दूसरा शासक परिवार था, हालांकि ख़िलजी क़बीला लंबे समय से अफ़ग़ानिस्तान में बसा हुआ था, लेकिन अपने पूर्ववर्ती गुलाम वंश की तरह यह राजवंश भी मूलत: तुर्किस्तान का था. ख़लजी वंश के पहले सुल्तान जलालुद्दीन फ़िरोज़ ख़लजी, गुलाम वंश के अंतिम कमज़ोर बादशाह क्यूमर्श के पतन के बाद एक कुलीन गुट के सहयोग से गद्दी पर बैठे. जलालुद्दीन ख़िलजी ने ख़िलजी वंश की स्थापना की थी. ख़िलजी वंश ने 1290 से 1320 ई. तक राज्य किया.

जलालुद्दीन फ़िरोज ख़िलजी (1290-1296 ई.) 'ख़िलजी वंश' का संस्थापक था. इसने अपना जीवन एक सैनिक के रूप में शुरू किया था. अपनी योग्यता के बल पर इसने 'सर-ए-जहाँदार/शाही अंगरक्षक' का पद प्राप्त किया तथा बाद में समाना का सूबेदार बना. कैकुबाद ने इसे 'आरिज-ए-मुमालिक' का पद दिया और 'शाइस्ता ख़ाँ' की उपाधि के साथ सिंहासन पर बिठाया. इसने दिल्ली के बजाय किलोखरी के मध्य में राज्याभिषेक करवाया. जलालुद्दीन ने अपने राज्याभिषेक के एक वर्ष बाद दिल्ली में प्रवेश किया। उसने अपने पुत्रों को ख़ानख़ाना, अर्कली ख़ाँ, एवं क़द्र ख़ाँ की उपाधि प्रदान की. जलालुद्दीन फ़िरोज ख़िलजी ने अपने अल्प शासन काल में कुछ महत्त्वपूर्ण उपलब्धियाँ प्राप्त कीं. इन उपलब्धियों में उसने अगस्त, 1290 में कड़ामानिकपुर के सूबेदार मलिक छज्जू, जिसने ‘सुल्तान मुगीसुद्दीन’ की उपाधि धारण कर अपने नाम के सिक्के चलवाये एवं खुतबा पढ़ा, के विद्रोह को दबाया. इस अवसर पर कड़ामानिकपुर की सूबेदारी उसने अपने भतीजे अलाउद्दीन ख़िलजी को दी.

उसका 1291 ई. में रणथंभौर का अभियान असफल रहा. 1292 ई. में मंडौर एवं झाईन के क़िलों को जीतने में जलालुद्दीन को सफलता मिली. दिल्ली के निकटवर्ती क्षेत्रों में उसने ठगों का दमन किया. 1292 ई. में ही मंगोल आक्रमणकारी हलाकू का पौत्र अब्दुल्ला लगभग डेढ़ लाख सिपाहियों के साथ पंजाब पर आक्रमण कर सुनाम पतक पहुँच गया, परन्तु अलाउद्दीन ने मंगोलों को परास्त करने में सफलता प्राप्त की और अन्त में दोनों के बीच सन्धि हुई. मंगोल वापस जाने के लिए तेयार हो गये. परन्तु चंगेज़ ख़ाँ के नाती उलगू ने अपने लगभग 400 मंगोल समर्थकों के साथ इस्लाम धर्म ग्रहण कर भारत में रहने का निर्णय लिया. कालान्तर में जलालुद्दीन ने उलगू के साथ ही अपनी पुत्री का विवाह किया और साथ ही रहने के लिए दिल्ली के समीप 'मुगरलपुर' नाम की बस्ती बसाई गई. बाद में उन्हें ही ‘नवीन मुसलमान’ के नाम से जाना गया.

जलालुद्दीन ने ईरान के धार्मिक पाकीर सीदी मौला को हाथी के पैरों तले कुचलवा दिया था. जलालुद्दीन के शासन काल में ही उसकी भतीजे अलाउद्दीन ख़िलजी ने शासक बनने से पूर्व ही 1292 ई. में अपने चाचा की स्वीकृति के बाद भिलसा एवं देवगिरि में लूट-मार का काम किया. उस समय देवगिरि को लूटना मुस्लिमों का दक्षिण भारत पर प्रथम आक्रमण था. इन दोनों स्थानों पर लूट-मार से अलाउद्दीन को अपार सम्पत्ति प्राप्त हुई. जलालुद्दीन ख़िलजी की हत्या इसके भतिजे एवं दामाद अलाउद्दीन ख़िलजी ने अपने भाई अलमास वेग की सहायता से 1296 ई० को कड़ामानिकपुर(इलाहाबाद) में की, जिसे बाद में 'उलूग ख़ाँ' की उपाधि से विभूषित किया गया. इस प्रकार अलाउद्दीन ख़िलजी ने चाचा की हत्या कर दिल्ली के तख्त पर 22 अक्टूबर 1296 को बलबन के लाल महल में अपना राज्याभिषेक करवाया. जलालुद्दीन ख़िलजी का शासन उदार निरंकुशता पर आधारित था. अपनी उदार नीति के कारण जलालुद्दीन ने कहा था, “मै एक वृद्ध मुसलमान हूँ और मुसलमान का रक्त बहाना मेरी आदत नहीं है.” अमीर खुसरो और इमामी दोनों ने जलालुद्दीन ख़िलजी को भाग्यवादी व्यक्ति” कहा है.

स्थापत्य कला के क्षेत्र में अलाउद्दीन खिलजी ने वृत्ताकार 'अलाई दरवाजा' अथवा 'कुश्क-ए-शिकार' का निर्माण करवाया. उसके द्वारा बनाया गया 'अलाई दरवाजा' प्रारम्भिक तुर्की कला का एक श्रेष्ठ नमूना माना जाता है. इसने सीरी के किले, हजार खम्भा महल का निर्माण किया. राज्याभिषेक के बाद उत्पन्न कठिनाईयों का सफलता पूर्वक सामना करते हुए अलाउद्दीन ने कठोर शासन व्यवस्था के अन्तर्गत अपने राज्य की सीमाओं का विस्तार करना प्रारम्भ किया. अपनी प्रारम्भिक सफलताओं से प्रोत्साहित होकर अलाउद्दीन ने 'सिकन्दर द्वितीय' (सानी) की उपाधि ग्रहण कर इसका उल्लेख अपने सिक्कों पर करवाया. उसने विश्व-विजय एवं एक नवीन धर्म को स्थापित करने के अपने विचार को अपने मित्र एवं दिल्ली के कोतवाल 'अलाउल मुल्क' के समझाने पर त्याग दिया. यद्यपि अलाउद्दीन ने ख़लीफ़ा की सत्ता को मान्यता प्रदान करते हुए ‘यामिन-उल-ख़िलाफ़त-नासिरी-अमीर-उल-मोमिनीन’ की उपाधि ग्रहण की, किन्तु उसने ख़लीफ़ा से अपने पद की स्वीकृत लेनी आवश्यक नहीं समझी. उलेमा वर्ग को भी अपने शासन कार्य में हस्तक्षेप नहीं करने दिया. उसने शासन में इस्लाम धर्म के सिद्धान्तों को प्रमुखता न देकर राज्यहित को सर्वोपरि माना. अलाउद्दीन ख़िलजी के समय निरंकुशता अपने चरम सीमा पर पहुँच गयी.

अपने चाचा को मारकर दिल्ली की गद्दी में बैठने के बावजूद, उसे 2 सालों तक कुछ विद्रोहीयों का सामना करना पड़ा. इस समस्या का सामना खिलजी ने पूरी ताकत के साथ किया. 1296 से 1308 के बीच मंगोल लगातार दिल्ली पर अपना कब्ज़ा करने के लिए, बार बार अलग अलग शासकों द्वारा हमला करते रहे. अलाउद्दीन ने जालंधर (1296), किली (1299), अमरोहा (1305) एवं रवि (1306) की लड़ाई में मंगोलियों के खिलाफ सफलता प्राप्त की. बहुत सारे मंगोल दिल्ली के आस पास ही बस गए और इस्लाम धर्म को अपना लिया. इन्हें नए मुस्लमान कहा गया. खिलजी को उन पर विश्वास नहीं था, वो इसे मंगोलियों की एक साजिश का हिस्सा मानता था. अपने साम्राज्य को बचाने के लिए खिलजी ने 1298 में एक दिन उन सभी मंगोलियों जो लगभग 30 हजार के तादाद में थे, मार डाला. जिसके बाद उन सभी के पत्नी और बच्चों को अपना गुलाम बना लिया.

1299 में खिलजी को पहली बड़ी जीत गुजरात में मिली. यहाँ के राजा ने अपने 2 बड़े जनरल उलुघ खान एवं नुसरत खान को अलाउद्दीन के समस्त प्रकट किया. यहाँ मलिक कुफुर खिलजी के मुख्य वफादार जनरल बन गए. खिलजी ने 1303 में रंथाम्बोर के राजपुताना किले में पहली बार हमला किया, जिसमे वो असफल रहा. खिलजी ने यहाँ दूसरी बार हमला किया, जिसमें उनका सामना पृथ्वीराज चौहान के वंशज के राजा राना हमीर देव से हुआ. राना हमीर बहादुरी से लड़ते हुए युद्ध में मारे गए, जिसके बाद रंथाम्बोर में खिलजी का राज्य हो गया.

1303 में वारंगल में खिलजी ने अपनी सेना भेजी, लेकिन काकतीय शासक से उनकी सेना हार गई. 1303 में खिलजी ने चित्तोर में हमला किया था. वहां रावल रतन सिंह का राज्य था, जिनकी पत्नी पद्मावती थी. पद्मावती को पाने की चाह में खिलजी ने वहां हमला किया था, जिसमें उन्हें विजय तो मिली लेकिन रानी पद्मावती ने जौहर कर लिया था. 1306 में खिलजी ने बड़े राज्य बंग्लाना में हमला किया. जहाँ राय करण का शासन था. यहाँ खिलजी को सफलता मिली और राय कारण की बेटी को दिल्ली लाकर उसका विवाह खिलजी ने अपने बड़े बेटे से किया. 1308 में खिलजी के जनरल मलिक कमालुद्दीन ने मेवाड़ के सिवाना किले में हमला किया. लेकिन खिलजी की सेना मेवाड़ की सेना से हार गई. खिलजी की सेना को दूसरी बार में सफलता मिली.

1307 में खिलजी ने अपने वफादार काफूर को देवगिरी में राजा से कर लेने के लिए भेजा. 1308 में खिलजी ने मंगोल ने राज्य अफगानिस्तान में अपने मुख्य घाजी मलिक के साथ अन्य आदमी कंधार, घजनी और काबुल को भेजा. घाज़ी ने मंगोलों को ऐसा कुचला की वे फिर भारत पर आक्रमण करने की हिम्मत नहीं जुटा पाए. 1310 में खिलजी ने होयसल सामराज्य, को कृष्णा नदी के दक्षिण में स्थित था, में बड़ी आसानी से सफलता प्राप्त कर ली. वहां के शासक वीरा बल्लाला ने बिना युद्ध के आत्मसमर्पण कर दिया और वार्षिक कर देने को राजी हो गए.

1311 में मेबार इलाके में मलिक काफूर के कहने पर अलाउद्दीन की सेना ने छापा मारा, लेकिन वहां के तमिल शासक विक्रम पंड्या के सामने उन्हें हार का सामना करना पड़ा. हालांकि काफूर भारी धन और सल्तनत लूटने में कामयाब रहे. उत्तर भारतीय राज्य प्रत्यक्ष सुल्तान शाही के नियम के तहत नियंत्रित किये गए, वहीं दक्षिण भारत में सभी प्रदेश प्रतिवर्ष भारी करों का भुगतान किया करते थे, जिससे खिलजी के पास अपार पैसा हो गया था. खिलजी ने कृषि उपज पर 50% कर माफ़ कर दिया, जिससे किसानों पर बोझ कम हो गया और वे कर के रूप में अपनी जमीन किसी को देने के लिए बाध्य नहीं रहे. काफूर ने जब दक्षिण भारत के हिस्सों में विजय प्राप्त की, तब वहां उसने मस्जिद बनवाई. ये अलाउद्दीन के बढे हुए सामराज्य को बतलाता था, जो उत्तर भारत के हिमालय से दक्षिण के आदम पुल तक फैला हुआ था.

खिलजी ने मूल्य नियंत्रण नीति लागु की, जिसके तहत अनाज, कपड़े, दवाई, पशु, घोड़े, आदि निर्धारित मूल्य पर ही बेचे जा सकते थे. मूल रूप से सभी वस्तुओं का मूल्य कम ही था, जो दिल्ली के बाजारों में बेचीं जाती थी. इसका सबसे अधिक फायदा नागरिकों और सैनिकों को होता था. जनवरी 1316 में 66 साल की उम्र में खिलजी की मृत्यु हो गई थी. वैसे यह माना जाता है कि उनके लेफ्टिनेंट मलिक नायब ने उनकी हत्या की थी. उनकी कब्र और मदरसे दिल्ली के महरौली में क़ुतुब काम्प्लेक्स के पीछे है.

अलाउद्दीन ख़िलजी ने मलिक काफ़ूर के कहने पर अपने पुत्र 'ख़िज़्र ख़ाँ' को उत्तराधिकारी न बना कर अपने 5-6 वर्षीय पुत्र शिहाबुद्दीन उमर को उत्तराधिकारी नियुक्त कर दिया. अलाउद्दीन की मृत्यु के बाद मलिक काफ़ूर ने शिहाबद्दीन को सुल्तान बना कर सारा अधिकार अपने हाथों में सुरक्षित कर लिया. लगभग 35 दिन के सत्ता उपभोग के बाद काफ़ूर की हत्या अलाउद्दीन के तीसरे पुत्र कुतुबुद्दीन मुबारक ख़िलजी ने करवा दी. काफ़ूर की हत्या के बाद वह स्वयं सुल्तान का संरक्षक बन गया और कालान्तर में उसने शिहाबुद्दीन को अंधा करवा कर क़ैद करवा दिया.

कुतुबुद्दीन मुुुबारक खिलजी ने सन 1316 ई० से 1320 ई० तक दिल्ली में शासन किया. इसके एक विश्वास-पात्र वजीर खुुुसरो खां ने इसकी हत्या 15अप्रैल,1320ई०को करके सिन्हासन पर कब्जा किया. गद्दी पर बैठने के बाद ही उसने देवगिरि के राजा हरपाल देव पर चढ़ाई की और युद्ध में विजई हुआ. बाद में इस क्रूूर शासक ने हरपाल देव को बंदी बनाकर उनकी खाल उधड़वा दी. अपने शासन काल में उसने गुजरात के विद्रोह का भी दमन किया था. अपनी इन विजयों के कारण ही उसका दिमाग फिर गया. वह अपना समय सुरा तथा सुन्दरियों में बिताने लगा. वह हिन्दू धर्म का परिवर्तित मुसलमान था एवं कहा कि इस्लाम खतरे में है. उसकी इन विजयों के अतिरिक्त अन्य किसी भी विजय का वर्णन नहीं मिलता है. क़ुतुबुद्दीन मुबारक़ ख़िलजी ने अपने सैनिकों को छः माह का अग्रिम वेतन दिया था. विद्धानों एवं महत्त्वपूर्ण व्यक्तियों की छीनी गयी जागीरें उन्हें वापस कर दीं. अलाउद्दीन ख़िलजी की कठोर दण्ड व्यवस्था एवं बाज़ार नियंत्रण आदि व्यवस्था को उसने समाप्त कर दिया था. क़ुतुबुद्दीन मुबारक़ ख़िलजी को नग्न स्त्री-पुरुषों की संगत पसन्द थी. अपनी इसी संगत के कारण कभी-कभी वह राज्य दरबार में स्त्री का वस्त्र पहन कर आ जाता था. वह कभी-कभी नग्न होकर दरबारियों के बीच दौड़ा करता था. उसने ‘अल इमाम’, ‘उल इमाम’ एवं ‘ख़िलाफ़़त-उल्लाह’ की उपाधियाँ धारण की थीं. उसने ख़िलाफ़़त के प्रति भक्ति को हटाकर अपने को ‘इस्लाम धर्म का सर्वोच्च प्रधान’ और ‘स्वर्ण तथा पृथ्वी के अधिपति का 'ख़लीफ़ा घोषित किया था. साथ ही उसने ‘अलवसिक विल्लाह’ की धर्म की प्रधान उपाधि भी धारण की थी. मुबारक के वज़ीर खुसरो खां ने 15 अप्रैल 1320 को उसकी हत्या कर दी.

भारत के महान वीरांगना पद्मावती जिन्होंने जौहर कर ली लेकिन खिलजी के अधिपत्य को कभी स्वीकार नही की

आज कहानी है एक ऐसे रानी की, जो इतिहास की सबसे चर्चित रानियों में से एक है. आज भी राजस्थान में चित्तौड़ की इस रानी की सुंदरता के साथ-साथ शौर्य और बलिदान के किस्से प्रसिद्ध हैं. लेकिन इन्हें ख्याति मिली कुछ वर्ष पूर्व जब उनके और क्रूर मुस्लिम शासक अलाउद्दीन खिलजी पर फ़िल्म बनी और पूरे इतिहास को तोड़ मरोड़ कर हमारे समक्ष प्रस्तुत कर दिया गया. हम बात कर रहे हैं चितौड़ की शेरनी जिसे रानी पद्मावती के नाम से भी जानते हैं.

जायसी द्वारा रचित पद्मावत महाकाव्य के अनुसार, राजकुमारी पद्मिनी का जन्म 1270 ईसवी में सिंहल देश (मौजूदा श्रीलंका) के राजा गंधर्वसेन और रानी चंपावती के महल में हुआ था. बचपन में पदमिनी के पास “हीरामणी ” नाम का बोलता तोता हुआ करता था, जिससे साथ वो अपना अधिकतर समय बिताती थीं. रानी पदमिनी बचपन से ही बहुत सुंदर थी और बड़ी होने पर उनके पिता ने उनका स्वयंवर आयोजित किया. इस स्वयंवर में उनके पिता ने सभी हिन्दू राजाओं और राजपूतों को बुलाया. राजा रावल रतन सिंह भी पहले से ही अपनी एक पत्नी नागमती होने के बावजूद स्वयंवर में गए थे. प्राचीन समय में राजा एक से अधिक विवाह करते थे, ताकि वंश को अधिक उत्तराधिकारी मिले. राजा रावल रतन सिंह वहाँ एक योगी के वेश में पहुंचे और उन्होंने मलखान सिंह (अनाम छोटे प्रदेश के राजा) को स्वयंवर में हराकर पदमिनी से विवाह कर लिया. विवाह के बाद वो अपनी दुसरी पत्नी पदमिनी के साथ वापस चित्तौड़ लौट आए.

रावल रतन सिंह का राज चितौड़ पर था, एक अच्छे शासक और पति होने के अलावा रतन सिंह कला के संरक्षक भी थे. उनके दरबार में कई प्रतिभाशाली लोग थे जिनमे से राघव चेतन संगीतकार भी एक था. एक दिन राघव चेतन की किसी बुरी आदत से नाराज़ होकर राजा ने उसका मुंह काला करवाकर और गधे पर बिठाकर अपने राज्य से निर्वासित कर दिया. राजा रतन सिंह की इस कठोर सजा के कारण राघव चेतन उनका दुश्मन बन गया और दिल्ली दरबार जाकर अलाउदीन ख़िलजी से मिल गया. राघव चेतन ने सुल्तान को रानी पद्मिनी की सुन्दरता का बखान किया जिसे सुनकर खिलजी की रानी को पाने के लिए लालायित हो उठा. अपनी राजधानी पहुचने के तुरंत बात उसने अपनी सेना को चित्तौड़ पर आक्रमण करने को कहा क्योंकि उसका सपना रानी पद्मावती को अपने हरम में रखना था. बेचैनी से चित्तौड़ पहुचने के बाद अलाउदीन को चित्तौड़ का किला भारी सुरक्षा में दिखा. उस प्रसिद्ध सुन्दरी की एक झलक पाने के लिए वो पागल हो रहा था और उसने राजा रतन सिंह को ये कहकर भेजा कि वो रानी पदमिनी को अपनी बहन समान मानता है और उससे मिलना चाहता है. सुल्तान की बात सुनते ही रतन सिंह ने उसके रोष से बचने और अपना राज्य बचाने के लिए उसकी बात से सहमत हो गया. रानी पदमिनी अलाउदीन को कांच में अपना चेहरा दिखाने के लिए राजी हो गयी. जब अलाउदीन को ये खबर पता चली कि रानी पदमिनी उससे मिलने को तैयार हो गयी है वो अपने चुनिन्दा योद्धाओं के साथ सावधानी से किले में प्रवेश कर गया. रानी पदमिनी के सुंदर चेहरे को कांच के प्रतिबिम्ब में जब अलाउदीन खिलजी ने देखा तो उसने सोच लिया कि रानी पदमिनी को अपनी बनाकर रहेगा.वापस अपने शिविर में लौटते वक़्त अलाउदीन कुछ समय के लिए रतन सिंह के साथ चल रहा था. खिलजी ने मौका देखकर रतन सिंह को बंदी बना लिया और पदमिनी की मांग करने लगा.

चौहान राजपूत सेनापति गोरा और बादल ने सुल्तान को हराने के लिए एक चाल चलते हुए खिलजी को संदेश भेजा कि अगली सुबह पद्मिनी को सुल्तान को सौप दिया जाएगा. अगले दिन सुबह भोर होते ही 150 पालकियां किले से खिलजी के शिविर की तरफ रवाना की गई. पालकियां वहाँ रुक गयी जहा पर रतन सिंह को बंदी बना रखा था. पालकियों को देखकर रतन सिंह ने सोचा, कि ये पालकियां किले से आयी है और सम्भवतः उनके साथ रानी भी यहाँ आयी होगी, लेकिन उन पालकियों में ना ही उनकी रानी और ना ही दासियां थीं और अचानक से उसमे से पूरी तरह से सशस्त्र सैनिक निकले और रतन सिंह को छुड़ा दिया और खिलजी के अस्तबल से घोड़े चुराकर तेजी से घोड़ो पर पर किले की ओर भाग गये. किंतु गोरा इस मुठभेड़ में बहादुरी से लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हो गये जबकि बादल,रतन सिंह को सुरक्षित किले में पहुचा दिया.

जब सुल्तान को पता चला कि उसकी योजना नाकाम हो गयी, तब सुल्तान ने गुस्से में आकर अपनी सेना को चित्तौड़ पर आक्रमण करने का आदेश दिया. सुल्तान के सेना ने किले में प्रवेश करने की कड़ी कोशिश की लेकिन नाकाम रहा. अब खिलजी ने किले की घेराबंदी करने का निश्चय किया और ये घेराबंदी इतनी कड़ी थी कि किले में खाद्य आपूर्ति धीरे धीरे समाप्त हो गयी. अंत में राजा रतन सिंह ने द्वार खोलने का आदेश दिया, लेकिन ख़िलजी और उसके सैनिकों से लड़ते हुए रतन सिंह वीरगति को प्राप्त हो गए. ख़िलजी ने किले के अंदर सूचना भिजवाया कि रानी पद्मिनी को दासियों के साथ उसके हवाले कर दिया जाए या फिर वो चित्तौड़ के सभी पुरुषों को खोजकर मार डालेगा. ये सुचना सुनकर रानी पद्मिनी ने सोचा कि अब सुल्तान की सेना चितौड़ के सभी पुरुषो को मार देगी. अब चित्तौड़ की औरतों के पास दो विकल्प थे या तो वो जौहर के लिए प्रतिबद्ध हो या विजयी सेना के समक्ष अपना निरादर सहे.

सभी महिलाओं का पक्ष जौहर की तरफ था. इसके बाद एक विशाल चिता जलाई गयी और रानी पदमिनी के बाद चित्तौड़ की सारी औरतें उसमें कूद गयी और इस प्रकार दुश्मन बाहर खड़े देखते रह गये. अपनी महिलाओं की मौत पर चित्तौड़ के पुरुष के पास जीवन में कुछ नही बचा था. चित्तौड़ के सभी पुरुषों ने साहस प्रदर्शन करने का प्रण लिया जिसमे प्रत्येक सैनिक केसरी वस्त्र और पगड़ी पहनकर दुश्मन सेना से तब तक लड़े जब तक कि वो सभी खत्म नही हो गये. विजयी ख़िलजी सेना ने जब किले में प्रवेश किया तो उनको राख और जली हुई हड्डियों के अतिरिक्त कुछ नहीं मिला. जिन महिलाओं ने जौहर किया उनकी याद आज भी लोकगीतों में जीवित है जिसमे उनके गौरवान्वित कार्य का बखान किया जाता है.

दिल्ली पर तुगलक वंश का शासन

तुग़लक़ वंश दिल्ली सल्तनत का एक राजवंश था जिसने सन् 1320 से लेकर सन् 1414 तक दिल्ली की सत्ता पर राज किया. तुग़लक़ वंश की स्थापना गयासुद्दीन तुगलक के द्वारा किया गया था, जिसने 1412 तक राज किया. इस वंश में तीन योग्य शासक हुए. ग़यासुद्दीन (1320-25), उसका पुत्र मुहम्मद बिन तुग़लक़ (1325-51) और उसका उत्तराधिकारी फ़िरोज शाह तुग़लक़ (1351-87). इनमें से पहले दो शासकों का अधिकार क़रीब-क़रीब पूरे देश पर था. फ़िरोज का साम्राज्य उनसे छोटा अवश्य था, पर फिर भी अलाउद्दीन ख़िलजी के साम्राज्य से छोटा नहीं था. फ़िरोज की मृत्यु के बाद दिल्ली सल्तनत का विघटन हो गया और उत्तर भारत छोटे-छोटे राज्यों में बंट गया. यद्यपि तुग़लक़ 1412 तक शासन करत रहे.

गयासुद्दीन तुगलक: गयासुद्दीन तुगलक ने तुगलक राजवंश की स्थापना की और 1320 से 1325 तक दिल्ली की सल्तनत पर शासन किया. मंगोलो के विरुद्ध गयासुद्दीन की नीति कठोर थी. उसने मंगोल कैदियों को कठोर रूप से दंडित किया. उसने अमरोहा की लड़ाई (1305ई) में मंगोलों को पराजित किया. जब गयासुद्दीन् मुल्तान से दिल्ली चला गया, तो सूमरो कबीले के लोगो ने विद्रोह कर दिया और थट्टा पर कब्ज़ा कर लिया. तुगलक ने ताजुद्दीन मलिक को मुल्तान का, ख्वाज़ा खातिर को भक्कर का गवर्नर नियुक्त किया. उसने सेहावाँ का कार्यभार मलिक अली शेर के हाथो मे सौप दिया. 1323 में, गयासुद्दीन ने अपने बेटे ज़ौना खान (बाद में मुहम्मद बिन तुगलक) को काकतीय राजधानी वारंगल के अभियान पर भेजा. वारंगल के आने वाले घेराबंदी के परिणामस्वरूप वारंगल, और काकतीय वंश का अंत हुआ. उसने तुगलकाबाद किले का निर्माण भी शुरू किया.

खिलजी वंश के शासनकाल में ग़यासुद्दीन को दिपालपुर का गवर्नर नियुक्त किया गया था. अलाउद्दीन खिलजी के काल में उसने मुल्तान,उच्छ तथा सिन्ध को चगतई ख़ान के आक्रमणों से सुरक्षा प्रदान की. 1321 ई. में ग़यासुद्दीन ने वारंगल पर आक्रमण किया, किन्तु वहाँ के काकतीय राजा प्रताप रुद्रदेव को पराजित करने में वह असफल रहा. 1323 ई. में द्वितीय अभियान के अन्तर्गत ग़यासुद्दीन तुग़लक़ ने शाहज़ादे 'जौना ख़ाँ' (मुहम्मद बिन तुग़लक़) को दक्षिण भारत में सल्तनत के प्रभुत्व की पुन:स्थापना के लिए भेजा. जौना ख़ाँ ने वारंगल के काकतीय एवं मदुरा के पाण्ड्य राज्यों को विजित कर दिल्ली सल्तनत में शामिल कर लिया. इस प्रकार सर्वप्रथम ग़यासुद्दीन के समय में ही दक्षिण के राज्यों को दिल्ली सल्तनत में मिलाया गया. इन राज्यों में सर्वप्रथम वारंगल था. ग़यासुद्दीन तुग़लक़ पूर्णतः साम्राज्यवादी था. इसने अलाउद्दीन ख़िलजी की दक्षिण नीति त्यागकर दक्षिणी राज्यों को दिल्ली सल्तनत में शामिल कर लिया.

ग़यासुद्दीन जब बंगाल में था, तभी सूचना मिली कि, ज़ौना ख़ाँ (मुहम्मद बिन तुग़लक़) निज़ामुद्दीन औलिया का शिष्य बन गया है और वह उसे राजा होने की भविष्यवाणी कर रहा है. निज़ामुद्दीन औलिया को ग़यासुद्दीन तुग़लक़ ने धमकी दी तो, औलिया ने उत्तर दिया कि, "हुनूज दिल्ली दूर अस्त, अर्थात दिल्ली अभी बहुत दूर है. हिन्दू जनता के प्रति ग़यासुद्दीन तुग़लक़ की नीति कठोर थी. ग़यासुद्दीन तुग़लक़ संगीत का घोर विरोधी था. बरनी के अनुसार अलाउद्दीन ख़िलजी ने शासन स्थापित करने के लिये जहाँ रक्तपात व अत्याचार की नीति अपनाई, वहीं ग़यासुद्दीन ने चार वर्षों में ही उसे बिना किसी कठोरता के संभव बनाया. जनता की सुविधा के लिए अपने शासन काल में ग़यासुद्दीन ने क़िलों, पुलों और नहरों का निर्माण कराया. सल्तनत काल में डाक व्यवस्था को सुदृढ़ करने का श्रेय ग़यासुद्दीन तुग़लक़ को ही जाता है. शारीरिक यातना द्वारा राजकीय ऋण वसूली को उसने प्रतिबंधित किया.

ग़यासुद्दीन एक कट्टर सुन्नी मुसलमान था. बाकी मुस्लिम शासकों जैसा ये भी शैतान था जिसने बेकसूर हिंदूओ और बौद्धो का कत्ल-ए-आम किया था. इस्लाम धर्म में उसकी गहरी आस्था और उसके सिद्धान्तों का वह सावधानीपूर्वक पालन करता था. उसने मुसलमान जनता पर इस्लाम के नियमों का पालन करने के लिए दबाव डाला. वह अपने साम्राज्य के बहुसंख्यकों के धर्म के प्रति शत्रुभाव तो नहीं रखता था किंतु उनके प्रति दयावान् भी नहीं था. जब ग़यासुद्दीन तुग़लक़ बंगाल अभियान से लौट रहा था, तब लौटते समय तुग़लक़ाबाद से 8 किलोमीटर की दूरी पर स्थित अफ़ग़ानपुर में एक महल (जिसे उसके लड़के जूना ख़ाँ के निर्देश पर अहमद अयाज ने लकड़ियों से निर्मित करवाया था) में सुल्तान ग़यासुद्दीन के प्रवेश करते ही वह महल गिर गया, जिसमें दबकर मार्च, 1325 ई. को उसकी मुत्यृ हो गयी. इब्न बतूता के अनुसार गयासुद्दीन की हत्या उसके पुत्र ज़ौना खाँ (मुहम्मद बिन तुगलक) द्वारा रचे गए षड्यंत्र के माध्यम से की गई. ग़यासुद्दीन तुग़लक़ का मक़बरा तुग़लक़ाबाद में स्थित है.

मुहम्मद बिन तुग़लक़: मुहम्मद बिन तुग़लक़ दिल्ली सल्तनत में तुग़लक़ वंश का शासक था. ग़यासुद्दीन तुग़लक़ की मृत्यु के बाद उसका पुत्र 'जूना ख़ाँ', मुहम्मद बिन तुग़लक़ (1325-1351 ई.) के नाम से दिल्ली की गद्दी पर बैठा. इसका मूल नाम 'उलूग ख़ाँ' था. राजामुंदरी के एक अभिलेख में मुहम्मद तुग़लक़ (जौना या जूना ख़ाँ) को दुनिया का ख़ान कहा गया है. सम्भवतः मध्यकालीन सभी सुल्तानों में मुहम्मद तुग़लक़ सर्वाधिक शिक्षित, विद्वान एवं योग्य व्यक्ति था. अपनी सनक भरी योजनाओं, क्रूर-कृत्यों एवं दूसरे के सुख-दुख के प्रति उपेक्षा का भाव रखने के कारण इसे 'स्वप्नशील', 'पागल' एवं 'रक्त-पिपासु' कहा गया है. बरनी, सरहिन्दी, निज़ामुद्दीन, बदायूंनी एवं फ़रिश्ता जैसे इतिहासकारों ने सुल्तान को अधर्मी घोषित किया गया है. मोहम्मद बिन तुगलक ने ही बटियागढ़ में प्राणियों के लिए गो - मठ, बावड़ी और बगीचा बनवाया था.

मुहम्मद बिन तुग़लक़ कला-प्रेमी एवं अनुभवी सेनापति था. वह अरबी भाषा एवं फ़ारसी भाषा का विद्धान तथा खगोलशास्त्र, दर्शन, गणित, चिकित्सा, विज्ञान, तर्कशास्त्र आदि में पारंगत था. अलाउद्दीन ख़िलजी की भाँति अपने शासन काल के प्रारम्भ में उसने, न तो ख़लीफ़ा से अपने पद की स्वीकृति ली और न उलेमा वर्ग का सहयोग लिया, यद्यपि बाद में ऐसा करना पड़ा. उसने न्याय विभाग पर उलेमा वर्ग का एकाधिपत्य समाप्त किया. क़ाज़ी के जिस फैसले से वह संतुष्ट नहीं होता था, उसे बदल देता था. सर्वप्रथम मुहम्मद तुग़लक़ ने ही बिना किसी भेदभाव के योग्यता के आधार पर पदों का आवंटन किया. नस्ल और वर्ग-विभेद को समाप्त करके योग्यता के आधार पर अधिकारियों को नियुक्त करने की नीति अपनायी. वस्तुत: यह उस शासक का दुर्भाग्य था कि, उसकी योजनाएं सफलतापूर्वक क्रियान्वित नहीं हुई. जिसके कारण यह इतिहासकारों की आलोचना का पात्र बना.

मुहम्मद तुग़लक़ के सिंहासन पर बैठते समय दिल्ली सल्तनत कुल 23 प्रांतों में बँटा थी, जिनमें मुख्य थे - दिल्ली, देवगिरि, लाहौर, मुल्तान, सरमुती, गुजरात, अवध, कन्नौज, लखनौती, बिहार, मालवा, जाजनगर (उड़ीसा), द्वारसमुद्र आदि. कश्मीर एवं बलूचिस्तान भी दिल्ली सल्तनत में शामिल थे. दिल्ली सल्तनत की सीमा का सर्वाधिक विस्तार इसी के शासनकाल में हुआ था. परन्तु इसकी क्रूर नीति के कारण राज्य में विद्रोह आरम्भ हो गया. जिसके फलस्वरूप दक्षिण में नए स्वतंत्र राज्य की स्थापना हुई और ये क्षेत्र दिल्ली सल्तनत से अलग हो गए. बंगाल भी स्वतंत्र हो गया. राज्यारोहण के बाद मुहम्मद तुग़लक़ ने कुछ नवीन योजनाओं का निर्माण कर उन्हें क्रियान्वित करने का प्रयत्न किया.

मुहम्मद बिन तुग़लक़ के शासन काल में सबसे अधिक (34) विद्रोह हुए, जिनमें से 27 विद्रोह अकेले दक्षिण भारत में ही हुए. सुल्तान मुहम्मद तुग़लक़ के शासन काल में हुए कुछ महत्त्वपूर्ण विद्रोहों का सारांश निम्नलिखित हैं- प्रथम विद्रोह 1327 ई. में तुग़लक़ के चचेरे भाई सुल्तान गुरशास्प ने किया, जो गुलबर्ग के निकट सागर का सूबेदार था. वह सुल्तान द्वारा बुरी तरह से पराजित किया गया. मुहम्मद तुग़लक़ के विरुद्ध सिंध तथा मुल्तान के सूबेदार बहराम आईबा ऊर्फ किश्लू ख़ाँ ने 1327-1328 ई. में विद्रोह किया. सैयद जलालुद्दीन हसनशाह का मालाबार विद्रोह 1334-1335 ई. में किया गया. बंगाल का विद्रोह (1330-1331 ई.) प्रमुख हैं. बंगाल के विद्रोह को यद्यपि प्रारंभ में दबा लिया गया था, किन्तु 1340-1341 ई. के लगभग शम्सुद्दीन के नेतृत्व में बंगाल दिल्ली सल्तनत से अलग हो गया. 1337-1338 ई. में कड़ा के सूबेदार निज़ाम भाई का विद्रोह, 1338-1339 ई. में बीदर के सूबेदार, नुसरत ख़ाँ का विद्रोह, 1339-1340 ई. में गुलबर्ग के अलीशाह का विद्रोह आदि भी मुहम्मद तुग़लक़ के विरुद्ध किये गये विद्रोहों में प्रमुख हैं. इस तरह के विद्रोहों का सुल्तान ने सफलतापूर्वक दमन किया. मुहम्मद तुग़लक़ के शासनकाल में ही दक्षिण में 1336 ई. में 'हरिहर' एवं 'बुक्का' नामक दो भाईयों ने स्वतंत्र ‘विजयनगर’ की स्थापना की. अफ़्रीकी यात्री इब्न बतूता को 1333 ई. में मुहम्मद ने अपने राजदूत के रूप में चीन भेजा. इब्न बतूता ने अपनी पुस्तक ‘रेहला’ में मुहम्मद तुग़लक़ के समय की घटनाओं का वर्णन किया है.

मुहम्मद तुग़लक़ धार्मिक रूप में सहिष्णु था. जैन विद्वान एवं संत 'जिनप्रभु सूरी' को दरबार में बुलाकर सम्मान प्रदान किया. मुहम्मद बिन तुग़लक़ दिल्ली सल्तनत का प्रथम सुल्तान था, जिसने हिन्दू त्योहरों (होली, दीपावली) में भाग लिया. दिल्ली के प्रसिद्ध सूफ़ी शेख़ 'शिहाबुद्दीन' को 'दीवान-ए-मुस्तखराज' नियुक्त किया तथा शेख़ 'मुईजुद्दीन' को गुजरात का गर्वनर तथा 'सैय्यद कलामुद्दीन अमीर किरमानी' को सेना में नियुक्त किया. शेख़ 'निज़ामुद्दीन चिराग-ए-दिल्ली' सुल्तान के विरोधियों में एक थे. अपने शासन काल के अन्तिम समय में जब सुल्तान मुहम्मद तुग़लक़ गुजरात में विद्रोह को कुचल कर तार्गी को समाप्त करने के लिए सिंध की ओर बढ़ा, तो मार्ग में थट्टा के निकट गोंडाल पहुँचकर वह गंभीर रूप से बीमार हो गया. यहाँ पर सुल्तान की 20 मार्च 1351 को मृत्यु हो गई.

फ़िरोज़ शाह तुग़लक़: फ़िरोज़ शाह तुग़लक़ दिल्ली सल्तनत में तुग़लक़ वंश का शासक था. फ़िरोजशाह तुग़लक़ का जन्म 1309 ईस्वी को हुआ था. उसका शासन 1351 से 1388 तक रहा. उसने अपने शासनकाल में ही चांदी के सिक्के चलाये. वह मुहम्मद तुग़लक़ का चचेरा भाई एवं सिपहसलार 'रजब' का पुत्र था. उसकी माँ नैला, दीपालपुर के भाटी राजपूत शासक (राणा मल) की पुत्री थी. फ़िरोज़ शाह तुग़लक़ ने गुजरी प्रेम महल की स्थापना अपनी सबसे प्रिय गुजरी प्रेमिका के लिए किया था. मुहम्मद तुग़लक़ की मुत्यु के बाद 23 मार्च 1351 को फ़िरोज़ तुग़लक़ का राज्याभिषक थट्टा के निकट हुआ. पुनः फ़िरोज़ का राज्याभिषेक दिल्ली में अगस्त, 1351 में हुआ. सुल्तान बनने के बाद फ़िरोज़शाह तुग़लक़ ने सभी क़र्ज़े माफ कर दिए, जिसमें 'सोंधर ऋण' भी शामिल था, जो मुहम्मद तुग़लक़ के समय किसानों को दिया गया था. फ़िरोज शाह कट्टर सुन्नी धर्मान्ध मुस्लिम था.

सुल्तान बनने के बाद फ़िरोज़ तुग़लक़ ने दिल्ली सल्तनत से अलग हुए अपने प्रदेशों को जीतने के अभियान के अन्तर्गत बंगाल एवं सिंध पर आक्रमण किया. बंगाल को जीतने के लिए सुल्तान ने 1353 ई. में आक्रमण किया. उस समय शम्सुद्दीन इलियास शाह वहाँ का शासक था. उसने इकदला के क़िले में शरण ले रखी थी, सुल्तान फ़िरोज़ अन्ततः क़िले पर अधिकार करने में असफल होकर 1355 ई. में वापस दिल्ली आ गया. पुनः बंगाल पर अधिकार करने के प्रयास के अन्तर्गत 1359 ई. में फ़िरोज़ तुग़लक़ ने वहाँ के तत्कालीन शासक शम्सुद्दीन के पुत्र सिकन्दर शाह पर आक्रमण किया, किन्तु असफल होकर एक बार फिर वापस आ गया. 1360 ई में सुल्तान फ़िरोज़ ने जाजनगर (उड़ीसा) पर आक्रमण करके वहाँ के शासक भानुदेव तृतीय को परास्त कर पुरी के जगन्नाथपुरी मंदिर को ध्वस्त किया. 1361 ई. में फ़िरोज़ ने नगरकोट पर आक्रमण किया. यहाँ के जामबाबनियों से लड़ती हुई सुल्तान की सेना लगभग 6 महीने तक रन के रेगिस्तान में फँसी रही, कालान्तर में जामबाबनियों ने सुल्तान की अधीनता को स्वीकार कर लिया और वार्षिक कर देने के लिए सहमत हो गये.

इन साधारण विजयों के अतिरिक्त फ़िरोज़ के नाम कोई बड़ी सफलता नहीं जुड़ी है. उसने दक्षिण में स्वतंत्र हुए राज्य विजयनगर, बहमनी एवं मदुरा को पुनः जीतने का कोई प्रयास नहीं किया. इस प्रकार कहा जा सकता है कि, सुल्तान फ़िरोज़ तुग़लक़ ने अपने शासन काल में कोई भी सैनिक अभियान साम्राज्य विस्तार के लिए नहीं किया और जो भी अभियान उसने किया, वह मात्र साम्राज्य को बचाये रखने के लिए किया. राजस्व व्यवस्था के अन्तर्गत फ़िरोज़ ने अपने शासन काल में 24 कष्टदायक करों को समाप्त कर दिया और केवल 4 कर ‘ख़राज’ (लगान), ‘खुम्स’ (युद्ध में लूट का माल), ‘जज़िया’, एवं 'ज़कात' (इस्लाम धर्म के अनुसार अढ़ाई प्रतिशत का दान, जो उन लोगों को देना पड़्ता है, जो मालदार हों और उन लोगों को दिया जाता है, जो अपाहिज या असहाय और साधनहीन हों) को वसूल करने का आदेश दिया. उलेमाओं के आदेश पर सुल्तान ने एक नया सिंचाई (हक ए शर्ब) कर भी लगाया, जो उपज का 1/10 भाग वसूला जाता था. सम्भवतः फ़िरोज़ तुग़लक़ के शासन काल में लगान उपज का 1/5 से 1/3 भाग होता था. सुल्तान ने सिंचाई की सुविधा के लिए 5 बड़ी नहरें यमुना नदी से हिसार तक 150 मील लम्बी सतलुज नदी से घग्घर नदी तक 96 मील लम्बी सिरमौर की पहाड़ी से लेकर हांसी तक, घग्घर से फ़िरोज़ाबाद तक एवं यमुना से फ़िरोज़ाबाद तक का निर्माण करवाया. उसने फलो के लगभग 1200 बाग़ लगवाये. आन्तरिक व्यापार को बढ़ाने के लिए अनेक करों को समाप्त कर दिया. फिरोज के अंतिम दिन दुख भरे बीते. 1374 में उसके उत्तराधिकारी पुत्र फतेखा की मौत हो गई उसके कुछ वर्ष अंतराल के बाद 1387 में दूसरा पुत्र खन जहा भी मर गया जिसका सुल्तान को गहरा आघात पहुंचा. आयु बढने के साथ ही 80 वर्ष की आयु में सुल्तान फ़िरोज़ शाह तुग़लक़ की मृत्यु सितम्बर1388 ई में हुई थी. हौज़खास परिसर,दिल्ली में उसे दफ़न कर दिया गया.

फिरोज साह तुगलक की मृत्यु के बाद 1388 ईस्वी में मोहमद खान ने कुछ दिनों के लिए दिल्ली में शासन किया और कुछ दिनों के भीतर ही उसकी हत्या कर डी गई. मोहमद खान के हत्या के बाद दिल्ली सलतनत में फिरोज शाह तुगलक का पोता गयासुद्दीन तुगलक शाह II अगला शासक बना लेकिन 5 महींने के अल्प शासन के बाद फरवरी 1389 में जफ़र खान के पुत्र अबू बक्र ने उसकी हत्या करके स्वंय सुल्तान बन गया. इसके शासनकाल में फिरोज के नायक के रूप में कार्य कर चुके शहजादा मुहम्मद ने सल्तनत की सत्ता प्राप्त करने की कोशिश की. 24 अप्रैल 1389 ईस्वी में उन्होंने स्वंय को सुल्तान घोषित कर दिया इसके बाद मुहम्मद और अबु बक्र के बीच सत्ता का संघर्ष हुआ.इस संघर्ष के बाद 1390 ईस्वी में अबू बक्र को सिंहासन छोड़ना पड़ा. इसके बाद मुहम्मद शाह ने 1390 ईस्वी से 1394 ईस्वी तक शासन किया. इसके बाद उसका पुत्र हुमायू ने लगभग तीन महीने तक शासन किया और उसकी मृत्यु हो गयी. मार्च 1394 में दिल्ली सल्तनत का शासक महमूद शाह बना. 17 दिसंबर 1398 को दिल्ली पर तैमुर का आक्रमण हुआ और सुल्तान खुद गुजरात भाग गया. पुन: वजीर मल्लू खान ने सुल्तान को दिल्ली बुलाकर गद्दी पर बैठाया. सन 1412 ईस्वी में महमूद शाह की मृत्यु हो गयी और तुगलक वंश का अंत हो गया.

चंगेज़ ख़ान का भारत की ओर प्रस्थान

चंगेज़ ख़ान एक मंगोल शासक था जिसने मंगोल साम्राज्य के विस्तार में एक अहम भूमिका निभाई. इतिहासकार मानते हैं कि चंगेज खान एक 'बौद्ध' था. उसने अपनी तलवार के दम पर मुस्लिम साम्राज्य को लगभग खत्म ही कर दिया था. वह अपनी संगठन शक्ति, बर्बरता तथा साम्राज्य विस्तार के लिए प्रसिद्ध हुआ. इससे पहले किसी भी यायावर जाति (जाति के लोग भेड़ बकरियां पालते जिन्हें गड़रिया कहा जाता है) के व्यक्ति ने इतनी विजय यात्रा नहीं की थी. वह पूर्वोत्तर एशिया के कई घुमंतू जनजातियों को एकजुट करके सत्ता में आया.

चंगेज़ खान का जन्म 1962 के आसपास आधुनिक मंगोलिया के उत्तरी भाग में ओनोन नदी के निकट हुआ था. चंगेज़ खान की दांयी हथेली पर पैदाइशी खूनी धब्बा था. उसके तीन सगे भाई व एक सगी बहन थी और दो सौतेले भाई भी थे. उसका वास्तविक या प्रारंभिक नाम तेमुजिन (या तेमूचिन) था. मंगोल भाषा में तिमुजिन का मतलब लौहकर्मी होता है. उसकी माता का नाम होयलन और पिता का नाम येसूजेई था जो कियात कबीले का मुखिया था. येसूजेई ने विरोधी कबीले की होयलन का अपहरण कर विवाह किया था. लेकिन कुछ दिनों के बाद ही येसूजेई की हत्या कर दी गई. उसके बाद तेमूचिन की माँ ने बालक तेमूजिन तथा उसके सौतले भाईयों बहनों का लालन पालन बहुत कठिनाई से किया. बारह वर्ष की आयु में तिमुजिन की शादी बोरते के साथ कर दी गयी. इसके बाद उसकी पत्नी बोरते का भी विवाह् के बाद ही अपहरण कर लिया था. अपनी पत्नी को छुडाने के लिए उसे लड़ाईया लड़नी पड़ीं थी. इन विकट परिस्थितियों में भी वो दोस्त बनाने में सक्षम रहा. नवयुवक बोघूरचू उसका प्रथम मित्र था और वो आजीवन उसका विश्वस्त मित्र बना रहा. उसका सगा भाई जमूका भी उसका एक विश्वसनीय साथी था. तेमुजिन ने अपने पिता के वृद्ध सगे भाई तुगरिल उर्फ़ ओंग खान के साथ पुराने रिश्तों की पुनर्स्थापना की.

जमूका हँलांकि प्रारंभ में उसका मित्र था, बाद में वो शत्रु बन गया. 1180 तथा 1190 के दशकों में वो ओंग ख़ान का मित्र रहा और उसने इस मित्रता का लाभ जमूका जैसे प्रतिद्वंदियों को हराने के लिए किया. जमूका को हराने के बाद उसमें बहुत आत्मविश्वास आ गया और वो अन्य कबीलों के खिलाफ़ युद्ध के लिए निकल पड़ा. इनमें उसके पिता के हत्यारे शक्तिशाली तातार कैराईट और खुद ओंग खान शामिल थे. ओंग ख़ान के विरूद्ध उसने 1203 में युद्ध छेड़ा. 1206 इस्वी में तेमुजिन, जमूका और नेमन लोगों को निर्णायक रूप से परास्त करने के बाद स्टेपी क्षेत्र का सबसे प्रभावशाली व्य़क्ति बन गया. उसके इस प्रभुत्व को देखते हुए मंगोल कबीलों के सरदारों की एक सभा (कुरिलताई) में मान्यता मिली और उसे चंगेज़ ख़ान (समुद्री खान) या सार्वभौम शासक की उपाधि देने के साथ महानायक घोषित किया गया.

कुरिलताई से मान्यता मिलने तक वो मंगोलों की एक सुसंगठित सेना तैयार कर चुका था. उसकी पहली इच्छा चीन पर विजय प्राप्त करने की थी. चीन उस समय तीन भागों में विभक्त था - उत्तर पश्चिमी प्रांत में तिब्बती मूल के सी-लिया लोग, जरचेन लोगों का चीन राजवंश जो उस समय आधुनिक बीजिंग के उत्तर वाले क्षेत्र में शासन कर रहे थे तथा शुंग राजवंश जिसके अंतर्गत दक्षिणी चीन आता था. 1209 में सी लिया लोग परास्त कर दिए गए. 1213 में चीन की महान दीवीर का अतिक्रमण हो गया और 1215 में पेकिंग नगर को लूट लिया गया. चिन राजवंश के खिलाफ़ 1234 तक लड़ाईयाँ चली पर अपने सैन्य अभियान की प्रगति भर को देख चंगेज़ खान अपने अनुचरों की देखरेख में युद्ध को छोड़ वापस मातृभूमि को मंगोलिया लौट गया. सन् 1218 में करा खिता की पराजय के बाद मंगोल साम्राज्य अमू दरिया, तुरान और ख्वारज़्म राज्यों तक विस्तृत हो गया. 1219-1221 के बीच कई बड़े राज्यों - ओट्रार, बुखारा, समरकंद, बल्ख़, गुरगंज, मर्व, निशापुर और हेरात - ने मंगोल सेना के सामने समर्पण कर दिया. जिन नगरों ने प्रतिशोध किया उनका विध्वंस कर दिया गया. इस दौरान मंगोलों ने बेपनाह बर्बरता का परिचय दिया और लाखों की संख्या में लोगों का वध कर दिया.

भारत की ओर प्रस्थान: चंगेज खान ने गजनी और पेशावर पर अधिकार कर लिया तथा ख्वारिज्म वंश के शासक अलाउद्दीन मुहम्मद को कैस्पियन सागर की ओर खदेड़ दिया जहाँ 1220 में उसकी मृत्यु हो गई. उसका उत्तराधिकारी जलालुद्दीन मंगवर्नी हुआ जो मंगोलों के आक्रमण से भयभीत होकर गजनी चला गया. चंगेज़ खान ने उसका पीछा किया और सिन्धु नदी के तट पर उसको हरा दिया. जलालुद्दीन सिंधु नदी को पार कर भारत आ गया जहाँ उसने दिल्ली के सुल्तान इल्तुतमिश से सहायता की फरियाद रखी. इल्तुतमिश ने शक्तिशाली चंगेज़ ख़ान के भय से उसको सहयता देने से इंकार कर दिया. इस समय चेगेज खान ने सिंधु नदी को पार कर उत्तरी भारत और असम के रास्ते मंगोलिया वापस लौटने की सोची. पर असह्य गर्मी, प्राकृतिक आवास की कठिनाईयों तथा उसके शमन निमितज्ञों द्वारा मिले अशुभ संकेतों के कारण वो जलालुद्दीन मंगवर्नी के विरुद्ध एक सैनिक टुकड़ी छोड़ कर वापस आ गया. इस तरह भारत में उसके न आने से तत्काल भारत एक संभावित लूटपाट और वीभत्स उत्पात से बच गया. अपने जीवन का अधिकांश भाग युद्ध में व्यतीत करने के बाद सन् 1227 में उसकी मृत्यु हो गई.

तैमूर लंग का भारत पर आक्रमण

भारत में विदेशी आक्रमणकारियों का लम्बा इतिहास रहा है. मुहम्मद बिन कासिम, महमूद गज़नवी, मुहम्मद गोरी और चंगेज खान आदि भारत में आकर अपनी क्रूरता का दृश्य बता चुके थे. अगला नाम था एक तुर्क शासक का नाम था तैमूर लंग इसका जन्म उज्बेकिस्तान के समरकंद में 1336 मे हुआ था. वह एक साधारण चरवाहे परिवार में जन्म था, मगर दूसरा चंगेज खान बनकर वह काफिरों का नाश कर देने की सोच रखा करता है, कहते है दिल्ली को उसने एक दिन में मुर्दों का शहर बना दिया था, उसने एक लाख हिन्दुओं को बंदी बनाकर कत्ल करवा दिया था, तथा 10 हजार लोगो के सिर काटकर दीवार में चिनवा दिए थे. भारत पर आक्रमण के दौरान खिज्र खां ने तैमूर की बहुत सहायता की थी. वापस लौटते समय तैमूर ने जीते गये क्षेत्रों लाहौर, मुल्तान, दीपालपुर आदि का प्रशासन खिज्र खां को सौप दिया था. इसी खिज्र खां ने आने वाले समय में भारत में सैयद वंश की स्थापना की थी.

भारत के इतिहास का सबसे क्रूर लुटेरा तैमूर लंग की कहानी बड़ी ही विचित्र है. उसका पिता तुरगाई बरलस तुर्कों का नेता था, इसका बचपन एक चोर का रहा, वह भेड़े चुराया करता था. एक वक्त जब वह चोरी करने जा रहा था किसी गडरिये ने उस पर तीर से हमला कर दिया जिससे उसके एक पैर एवं कंधा पूरी तरह क्षतिग्रस्त हो गया था. तभी से इसे तैमूर लंग नाम से जाना जाने लगा. जिसका अर्थ होता है लगड़ा तैमूर. वह तुर्क था मगर स्वयं को चंगेज खां का अनुयायी मानकर उसकी राह पर चल पड़ा. तैमूर ने रूस से लेकर मध्य एशिया तक एक बड़े भूभाग पर अपना राज्य स्थापित कर लिया.

1398 में तैमूर ने भारत पर आक्रमण किया, वह सिन्धु नदी के रास्ते भारत आया था. उस समय दिल्ली सल्तनत पर तुगलक वंश का शासन था, वह प्रशासनिक दृष्टि से इस स्थिति में नही था कि इसका प्रबल विरोध कर सके. एक जगह उसने दो हजार जिन्दा आदमियों की एक मीनार बनवाई और उन्हें ईंट और गारे में चुनवा दिया. मध्यकालीन भारत के राजपूती राज्यों में उस समय केसरिया और जौहर की प्रथा थी. 15 दिन तक तैमूर दिल्ली में रहा, उसने हिन्दुओं को अपना निशाना बनाया उसकी मारकाट के बाद दिल्ली मुर्दों का शहर बनकर रह गई थी. उसने अपनी राह में आये भटनेर दुर्ग पर भयानक हमला किया तथा कत्लेआम मचाया. वो अपनी जीवनी में इस नरसंहार के बारे में लिखता है इस्लामी तलवार ने काफिरों के खून से स्नान किया, एक घंटे में दस हजार विधर्मियों का कत्ल कर दिया गया. दुर्ग में इकट्ठा सामग्री एवं धन सम्पति को लूटकर महल को आग के हवाले कर दिया गया.

तैमूर लंग ने दिल्ली से सटे लोनी नगर को भी अपनी क्रूरता का शिकार बनाया, यहाँ के हिन्दू शासक को मार दिया. सम्पूर्ण प्रजा तथा दरबार को अपना बंदी बना दिया. लोनी नगर से तैमूर ने एक लाख लोगों को बंदी बनाया, जिसमें कुछ मुस्लिम भी थे. उसने पहले तो सभी हिन्दुओं का नरसंहार करने का आदेश दे दिया तथा बाद में उसे किसी ने सलाह दी कि युद्ध बंदियों को ऐसे ही छोड़ देना भी ठीक नही है. तब उसने कड़े आदेश के जरिये उन मुस्लिम बंदियों के सर कलम करवा दिए.

तैमूर को एक अप्रैल 1405 में मौत के बाद उज्बेकिस्तान के समरकंद में मौजूद बाग गुर-ए-आमिर में दफ्न किया गया था. इस क्रूर शासक के किस्से उसकी मौत के साथ ही समाप्त नही हो गये थे. बल्कि एक नई कहानी उसकी कब्र को लेकर शुरू हो गई. कहते है नादिरशाह उस कब्र की बेशकीमती पत्थर को अपने साथ ले गया था. 1740 में ले जाये गये इस पत्थर से नादिरशाह के साथ बुरा होने शुरू हो गया, धार्मिक सलाहकारों के अनुसार उसे वापिस जाकर कब्र में रखा तब उसके हालातों में सुधार आया. तैमूर की कब्र दूसरी बार 1941 में रूस के राष्ट्रपति जोसेफ स्टालिन ने खुदवाई. उस कब्र को खोदते समय पुरातत्ववेत्ताओं को दो वोर्निंग लिखी मिली, जिसमें लिखा था वह अपनी मृत्यु के बाद फिर से जीवित हो जाएगा. हालांकि उन्होंने इस ओर विशेष ध्यान दिया दिया. यह संयोग ही था कि 22 जून 1941 के दिन हिटलर ने सोवियत रूस पर हमला कर दिया, जानकारों के अनुसार यह कब्र खोदने का परिणाम ही था. अतः उसे 20 दिसंबर 1942 को फिर से दफन करते ही जर्मनी ने आत्म समर्पण कर दिया.

दिल्ली पर सैयद वंश का शासन

सैयद वंश दिल्ली सल्तनत का चतुर्थ वंश था जिसका कार्यकाल 1414 से 1451ईस्वी तक रहा. तुग़लक़ वंश के बाद दिल्ली पर इस वंश की स्थापना हुई. यह परिवार सैयद अथवा मुहम्मद के वंशज माने जाता है. तैमूर के लगातार आक्रमणों के कारण दिल्ली सल्तनत का कन्द्रीय नेतृत्व पूरी तरह से हतास हो चुका था और उसे 1398 तक लूट लिया गया था. इसके बाद उथल-पुथल भरे समय में, जब कोई केन्द्रीय सत्ता नहीं थी, सैयदों ने दिल्ली में अपनी शक्ति का विस्तार किया. इस वंश के विभिन्न चार शासकों ने 37 वर्षों तक दिल्ली सल्तनत का नेतृत्व किया. इस वंश की स्थापना ख़िज्र खाँ ने की जिन्हें तैमूर ने मुल्तान (पंजाब क्षेत्र) का राज्यपाल नियुक्त किया था1 खिज़्र खान ने 28 मई 1414 को दिल्ली की सत्ता दौलत खान लोदी से छीनकर सैयद वंश की स्थापना की. लेकिन वो सुल्तान की पदवी प्राप्त करने में सक्षम नहीं हो पाये और पहले तैम्मूर के तथा उनकी मृत्यु के पश्चात उनके उत्तराधिकारी शाहरुख मीर्ज़ा (तैमूर के नाती) के अधीन तैमूरी राजवंश के रयत-ई-अला (जागीरदार) ही रहे. ख़िज्र खान की मृत्यु के बाद 20 मई 1421 को उनके पुत्र मुबारक खान ने सत्ता अपने हाथ में ली और अपने आप को अपने सिक्कों में मुइज़्ज़ुद्दीन मुबारक शाह के रूप में लिखवाया. सैय्यद खिज्र खाँ ने मृत्यु से पूर्व अपने पुत्र मुबारक शाह को अपना उत्तराधिकारी मनोनीत किया था. मुबारक शाह ने शाह की उपाधि धारण करके अमीरों व सरदारों की सर्व-सम्मति से सुल्तान का पद ग्रहण किया.

अपने शासन काल में उसने भटिण्डा व दोआब क्षेत्र के विद्रोहों का दमन किया मगर वह नमक की पहाड़ियों के खोखर लोगों को दण्ड नहीं दे सका. उल्लेखनीय है कि वह पहला सुल्तान था जिसके काल में दिल्ली के दरबार में दो हिन्दू अमीरों का उल्लेख मिलता है. अपने तेरह वर्ष के शासन काल में उसने मेवात, कटेहर, उत्तर-पूर्वी क्षेत्रों में सैनिक कार्यवाहियां की लेकिन यह किसी ठोस और वास्तविक उपलब्धि को पाने में असफल रहा. उसके आश्रय में प्रसिद्ध इतिहासकार याहिया-बिन-अहमद सरहिन्दी ने ‘तारीखे-मुबारकशाही‘ में लिखा है कि- “मुबारक शाह का काल अशान्ति एवं विद्रोह का काल था, इसलिए उसका पूर्ण समय विद्रोहों को दबाने में ही व्यतीत हो गया.” उसमें धर्मान्धता का नाम भी नहीं था. उसने दिल्ली के क्षत्रियों को उदारता पूर्ण संरक्षण दिया और ग्वालियर के हिन्दुओं को अत्याचार से बचाया. यमुना के तट पर उसने ‘मुबारक बाद‘ नामक एक नगर बसाया, जिसकी जामा-मस्जिद बहुत सुन्दर थी. 19 फरवरी, 1434 ई. को उसके एक सरदार सरवर-उल-मुल्क ने एक षड्यन्त्र द्वारा मुबारक शाह की हत्या करवा दी.

मुबारक शाह की मृत्यु के बाद मुहम्मद शाह ने दिल्ली सल्तनत पर शासन किया. उनका शासनकाल 1434 से 1445 ईस्वी तक रहा. मुहम्मदशाह के काल में दिल्ली सल्तनत में अराजकता व कुव्यवस्था व्याप्त रही. जौनपुर के शासक ने सल्तनत के कई जिले अपने अधीन कर लिए. मालवा के शासक महमूद खिलजी ने तो दिल्ली पर ही आक्रमण करने का साहस कर लिया. लाहौर और मुल्तान के शासक बहलोल खाँ लोदी ने सुल्तान की सहायता की. सुल्तान ने उसे ‘खान-ए-खाना’ की उपाधि दी और. साथ ही उसे अपना पुत्र कह कर भी पुकारा. सुल्तान की स्थिति बहुत दुर्बल हो गई. यहां तक कि दिल्ली से बीस ‘करोह’ की परिधि में अमीर उसके विरोधी हो गए. 1444 ई. में मुहम्मद शाह की मृत्यु हो गई और उसका पुत्र अलाउद्दीन ‘आलमशाह‘ के नाम से गद्दी पर बैठा .

आलम शाह अपने देश का सबसे अयोग्य शासक साबित हुआ. आलम शाह के काल में दिल्ली सल्तनत, दिल्ली शहर और कुछ. आस-पास के गाँवों तक रह सीमित हो गई. बहलोल लोदी (लाहौर का गवर्नर) के भय के कारण आलम शाह अपनी राजधानी दिल्ली से हटाकर बदायूँ ले गया और यहाँ वह भोग-विलास में डूब गया. उसके मन्त्री हमीद खाँ ने बहलोल लोदी को आमन्त्रित किया, जिसने कि दिल्ली पर अधिकार कर लिया. कुछ समय तक बहलोल खाँ लोदी ने आलम शाह के प्रतिनिधि के रूप में कार्य किया. 1451 ई. में आलमशाह ने बहलोल लोदी को दिल्ली का राज्य पूर्णतः सौंप दिया और स्वयं बदायूं की जागीर में रहने लगा. वहीं पर 1476 ई में उसकी मृत्यु हुई. इस प्रकार 37 वर्ष के अकुशल शासन के बाद सैय्यद वंश का अन्त हुआ और लोदी वंश की नींव पड़ी.

भारत पर लोदी वंश का शासन

लोदी वंश खिलजी अफगान लोगों की पश्तून जाति से बना था. इस वंश ने दिल्ली के सल्तनत पर उसके अंतिम चरण में शासन किया. इन्होंने 1451 से 1526ईस्वी तक शासन किया. वे एक अफ़गान कबीले के थे, जो सुलेमान पर्वत के पहाड़ी क्षेत्र में रहता था और अपने पड़ोसी सूर, नियाजी और नूहानी कबीलों की ही तरह गिल्ज़ाई कबीले से जुड़ा हुआ था. गिल्ज़ाइयों में ताजिक या तुर्क रक्त का सम्मिश्रण था. पूर्व में मुल्तान और पेशावर के बीच और पश्चिम में गजनी तक सुलेमान पर्वत क्षेत्र में जो पहाड़ी निवासी फैले हुए थे लगभग 14वीं शताब्दी तक उनकी बिल्कुल अज्ञात और निर्धनता की स्थिति थी. वे पशुपालन से अपनी जीविका चलाते थे और यदा कदा अपने संपन्न पड़ोसी क्षेत्र पर चढ़ाई करके लूटपाट करते रहते थे. उनके उच्छृंखल तथा लड़ाकू स्वभाव ने महमूद गजनवी का ध्यान अपनी ओर आकृष्ट किया और अल-उत्बी के अनुसार उसने उन्हें अपना अनुगामी बना लिया. गोरवंशीय प्रभुता के समय अफ़गान लोग दु:साहसी और पहाड़ी विद्रोही मात्र रहे.

भारत के इलबरी शासकों ने अफ़गान सैनिकों का उपयोग अपनी चौकियों को मज़बूत करने और अपने विरोधी पहाड़ी क्षेत्रों पर कब्जा जमाने के लिए किया. यह स्थिति मुहम्मद तुगलक के शासन में आई. एक अफ़गान को सूबेदार बनाया गया और दौलताबाद में कुछ दिनों के लिए वह सुल्तान भी बना. फीरोज तुगलक के शासनकाल में अफ़गानों का प्रभाव बढ़ना शुरू हुआ और 1379 ई. में मलिक वीर नामक एक अफ़गान बिहार का सूबेदार नियुक्त किया गया. दौलत खां शायद पहला अफ़गान था जिसने दिल्ली की सर्वोच्च सत्ता (1412-1424) प्राप्त की, यद्यपि उसने अपने को सुल्तान नहीं कहा. सैयदों के शासनकाल में कई प्रमुख प्रांत अफ़गानों के अधीन थे. बहलोल लोदी के समय दिल्ली की सुल्तानशाही में अफ़गानो का बोलबाला था.

बहलोल लोदी मलिक काला का पुत्र और मलिक बहराम का पौत्र था. उसने सरकारी सेवा सरहिंद के शासक के रूप में शुरू की और पंजाब का सूबेदार बन गया. 1451 ई. तक वह मुल्तान, लाहौर, दीपालपुर, समाना, सरहिंद, सुंनाम, हिसार फिरोज़ा और कतिपय अन्य परगनों का स्वामी बन चुका था. प्रथम अफ़गान शाह के रूप में वह सोमवार 19 अप्रैल 1451 को अबू मुज़फ्फर बहलोल शाह के नाम से दिल्ली की गद्दी पर बैठा. गद्दी पर बैठने के बाद बहलोल लोदी को अनेक समस्याओं का सामना करना पड़ा. उसके सबसे बड़े प्रतिद्वंद्वी थे जौनपुर के शर्की सुल्तान किंतु वह विजित प्रदेशों में अपनी स्थिति दृढ़ करने और अपने साम्राज्य का विस्तार करने में सफल हुआ.

बहलोल लोदी की मृत्यु 1479 ई. में हुई. उसकी मृत्यु के समय तक लोदी साम्राज्य आज के पूर्वी और पश्चिमी पंजाब, उत्तर प्रदेश और राजस्थान के एक भाग तक फैल चुका था. सुल्तान के रूप में बहलाल लोदी ने जो काम किए वे सिद्ध करते हैं कि वह बहुत बुद्धिमान तथा व्यवहारकुशल शासक था. अब वह लड़ाकू प्रवृत्ति का या युद्धप्रिय नहीं रह गया था. वह सहृदय था और शांति तथा व्यवस्था स्थापित करके, न्याय की प्रतिष्ठा द्वारा तथा अपनी प्रजा पर कर का भारी बोझ लादने से विरत रहकर जनकल्याण का संवर्धन करना चाहता था.

वहलोल लोदी का पुत्र निजाम खाँ 17 जुलाई 1489 को सुल्तान सिकंदर लोदी की उपाधि धारण करके दिल्ली के सिंहासन पर बैठा. अपने पिता से प्राप्त राज्य में सिकंदर लोदी ने वियाना, बिहार, तिरहुत, धोलपुर, मंदरैल, अर्वतगढ़, शिवपुर, नारवार, चंदेरी और नागर के क्षेत्र भी मिलाए. शर्की शासकों की शक्ति उसने एकदम नष्ट कर दी, ग्वालियर राज्य को बहुत कमजोर बना दिया और मालवा का राज्य तोड़ दिया लेकिन नीतिकुशल, रणकुशल कूटनीतिज्ञ और जननायक के रूप में सिकंदर लोदी अपने पिता बहलोल लोदी की तुलना में नहीं टिक पाया. सिकंदर लोदी 21 नवम्बर 1517 को मरा. गद्दी के लिए उसके दोनों पुत्रों, इब्राहीम और जलाल में झगड़ा हुआ. अत: साम्राज्य दो भागों में बँट गया. किंतु इब्राहीम ने बँटा हुआ दूसरा भाग भी छीन लिया और लोदी साम्राज्य का एकाधिकारी बन गया. जलाल को 1518 में मौत के घाट उतार दिया गया.

लोदी वंश का आखिरी शासक इब्राहीम लोदी उत्तर भारत के एकीकरण का काम और भी आगे बढ़ाने के लिए व्यग्र था. ग्वालियर को अपने अधीन करने में वह सफल हो गया और कुछ काल के लिए उसने राणा साँगा का आगे बढ़ना रोक दिया. किंतु अफगान सरकार की अंतर्निहित निर्बलताओं ने सुल्तान की निपुणताहीन कठोरता का संयोग पाकर, आंतरिक विद्रोह तथा बाहरी आक्रमण के लिए दरवाजा खोल दिया. जहीरुद्दीन मुहम्मद बाबर ने 21 अप्रैल 1526 ई. को पानीपत की लड़ाई में इब्राहीम को हरा और मौत के घाट उतारकर भारत में मुगल साम्राज्य की स्थापना की. तीनों लोदी राजाओं ने चौथाई शताब्दी तक शासन किया. इस प्रकार मुगलों के पूर्व के शाही वंशों में तुगलकों को छोड़कर उनका शासन सबसे लंबा था.

दिल्ली के लोदी सुल्तानों ने एक नए वंश की स्थापना ही नहीं की उन्होंने सुल्तानशारी की परंपराओं में कुछ परिवर्तन भी किए. हालाँकि उनकी सरकार का आम ढाँचा भी मुख्यत: वैसा ही था जैसा भारत में पिछले ढाई सौ वर्षों के तुर्क शासन में निर्मित हुआ था. हिंदुओं के साथ व्यवहार में वे अपने पूर्ववर्तियों से कहीं अधिक उदार थे और उन्होंने अपने आचरण का आधार धर्म के बजाय राजनीति को बनाया. फलस्वरूप उनके शासन का मूल बहुत गहराई तक जा चुका था. लोदियों ने हिंदू-मुस्लिम-सद्भाव का जो बीजारोपण किया वह मुगलशासन में खूब फलदायी हुआ.

भारत के महान हिन्दू ह्रदय सम्राट राणा सांगा

राणा सांगा (महाराणा संग्राम सिंह) उदयपुर में सिसोदिया राजपूत राजवंश के राजा थे तथा राणा रायमल के सबसे छोटे पुत्र थे. महाराणा संग्राम सिंह, महाराणा कुंभा के बाद,सबसे प्रसिद्ध महाराजा थे. मेवाड़ में सबसे महत्वपूर्ण शासक. इन्होंने अपनी शक्ति के बल पर मेवाड़ साम्राज्य का विस्तार किया और उसके तहत राजपूताना के सभी राजाओं को संगठित किया. रायमल की मृत्यु के बाद, 1509 में, राणा सांगा मेवाड़ के महाराणा बन गए. राणा सांगा ने मेवाड़ में 1509 से 1528 तक शासन किया, जो आज भारत के राजस्थान प्रदेश में स्थित है. राणा सांगा ने विदेशी आक्रमणकारियों के विरुद्ध सभी राजपूतों को एक किया. राणा सांगा सही मायनों में एक वीर योद्धा व शासक थे जो अपनी वीरता और उदारता के लिये प्रसिद्ध हुए. इन्होंने दिल्ली, गुजरात, व मालवा मुगल बादशाहों के आक्रमणों से अपने राज्य की ऱक्षा की. उस समय के वह सबसे शक्तिशाली राजा थे.

ज्योतिषी ने भविष्यवाणी की राणा सांगा राजा बनेगा, उनके राजयोग की प्रबल संभावना है जिसके बाद उनके बड़े भाई पृथ्वीराज जिनको उड़ना राजकुमार कहा जाता है और जयमल ईर्ष्या से ग्रस्त होकर उनको मारना चाहते थे. उनकी इस लड़ाई में राणा सांगा की एक आंख भी चली गई. अजमेर के करमचंद पवार ने राणा सांगा को उनके भाइयों से बचाकर उन को संरक्षण प्रदान किया. सांगा कई वर्षों तक भेष बदल कर रहे और इधर-उधर दिन काटते रहे, इसी क्रम में वे एक घोड़ा खरीदकर श्रीनगर (अजमेर जिले में) के करमचंद परमार की सेवा में जाकर चाकरी करने लगे. एक दिन करमचंद अपने किसी सैनिक अभियान के बाद जंगल में आराम कर रहा था. उसी वक्त सांगा भी एक पेड़ के नीचे अपना घोड़ा बाँध आराम करने लगा और उसे नींद आ गई. सांगा को सोते हुए कुछ देर में उधर से गुजरते हुए कुछ राजपूतों ने देखा कि सांगा सो रहे है और एक सांप उनपर फन तानकर छाया कर रहा है. यह बात उन राजपूतों ने करमचंद को बताई तो उसे बड़ा आश्चर्य हुआ और उसने खुद ने जाकर यह घटना अपनी आँखों से देखी. इस घटना के बाद करमचंद को सांगा पर सन्देह हुआ कि हो ना हो, यह कोई महापुरुष है या किसी बड़े राज्य का वारिश और उसने गुप्तरूप से रह रहे सांगा से अपना सच्चा परिचय बताने का आग्रह किया. तब सांगा ने उसे बताया कि वह मेवाड़ राणा रायमल के पुत्र है और अपने भाइयों से जान बचाने के लिए गुप्त भेष में दिन काट रहा है. करमचंद पवार ने राणा सांगा को अज्ञात वास में रखा और जब तक उनका राज तिलक न हो गया तब तक वह उन के आश्रयदाता बने रहे. उनके बड़े भाइयों की मृत्यु के उपरांत राणा सांगा 24 मई 1509 को मेवाड़ की गद्दी पर आसीन हुए.

सांगा जब मेवाड़ की बागडोर अपने हाथों में ली तब मेवाड़ की स्थिति न केवल सोचनीय थी बल्की मेवाड़ चारों ओर से शत्रुओं से भी गिरी थी. राणा सांगा ने अपने कौशल और वीरता के बल पर सभी को धूल चटाई. उनके राज्याभिषेक के समय दिल्ली में लोदी वंश का शासक सिकंदर लोदी, गुजरात में महमूद शाह बेगड़ा, और मालवा में नासिर शाह खिलजी उनके चारो और मंडरा रहे थे. मेवाड़ के पड़ोसी राजपूत राज्यों को पुनः मेवाड़ के प्रभाव में लाने के लिए राणा सांगा ने वैवाहिक संबंध भी स्थापित किए. इसके अतिरिक्त उन्होंने मेवाड़ के सीमा प्रांतों पर अपनी हितेषी और विश्वास पात्र व्यक्तियों को जागीर प्रदान कर मेवाड़ की केंद्रीय क्षेत्र को सुरक्षित ही नहीं कर दिया बल्कि इतना व्यवस्थित कर दिया कि यहां से मेवाड़ के शत्रु पर आक्रमण का संचालन किया जा सके. उन्होंने करमचंद पवार को अजमेर ,परबतसर , मांडल, पुलिया, बनेडा आदि 15 लाख वार्षिक आय के परगने जागीर में देकर मेवाड़ की उत्तरी पश्चिमी सीमा पर मजबूत प्रहरी बैठा दिया. दक्षिणी पश्चिमी सीमा की गुजरात से रक्षार्थ इडर राज्य में सुल्तान समर्थक भारमल को हटा कर जमाता रायमल को गद्दी पर बैठाया. मांडू के वजीर मेदिनराय को मेवाड़ प्रदेश में शरण लेने पर गागरोन तथा चंदेरी के प्रांतों की जागीर प्रदान कर मालवा के विरुद्ध एक शक्तिशाली जागीर की स्थापना की. सिरोही, वागड़ तथा मारवाड़ के राजाओं से वार्तालाप कर मुस्लिम शासकों के विरुद्ध राजपूत राज्यों के मध्य संबंध का गठन किया जो मुस्लिम आक्रमणों के विरुद्ध परस्पर एक दूसरे की सहायता करने को तत्पर रह सके, इस प्रकार राणा सांगा निश्चित ही मेवाड़ का प्रभाव संपूर्ण राजस्थान पर स्थापित कर दिया.

राणा संग्राम सिंह के शासनकाल 1509- 1528 में मेवाड राज्य की सीमा बहुत दूर तक फैल गई थी. उत्तर में बिना, पूर्व में सिंधु नदी, दक्षिण में मालवा और पश्चिम में दुर्गम अरावली सेल माला मेवाड़ की सीमा हो गई. मेवाड़ राज्य की पुनः उन्नति राणा की योग्यता गंभीरता और दूरदर्शिता का द्योतक थी. राणा संग्राम सिंह का उत्कर्ष मालवा गुजरात और दिल्ली के सुल्तानों के लिए आंखों की किरकिरी के समान था. अतः सभी अवसर की ताक में थे कि मेवाड़ की बढ़ती ताकत को नष्ट कर दें इस हेतु सभी ने अलग-अलग प्रयत्न किए और राणा सांगा ने सभी को प्रत्युत्तर दिया.

1511 इसी में नसीरुद्दीन शाह खिलजी की मृत्यु के बाद महमूद खिलजी द्वितीय मालवा की गद्दी पर बैठा किंतु नसीरुद्दीन के छोटे भाई भाई साहिब खान महमूद को हटाकर सिहासन अधिकृत कर लिया. फरवरी 1518 में सुल्तान महमूद खिलजी द्वितीय की सहायतार्थ गुजरात के सुल्तान मुजफ्फर शाह ने मालवा पर आक्रमण कर मांडू के दुर्ग को हस्तगत कर लिया. चंदेरी के शासक मेदिनराय की सहायता हेतु अनुरोध पर राणा सांगा ने मालवा की ओर प्रस्थान किया लेकिन मांडू दुर्ग के पतन के समाचार सुनकर गागरोन दुर्ग पर आक्रमण कर इस दुर्ग को मेदिनरय के अधिकार में सौंपकर मेवाड़ लौट आए. राणा सांगा जब मेवाड़ लौट आए तब सुल्तान महमूद खिलजी ने पीछे से गागरोन दुर्ग पर धावा बोल दिया. मेदिनराय ने फिर से राणा सांगा से सहायता मांगी तो राजपूत शासक पीछे कहां हटने वाला था. सांगा पुनः गागरोन पहुंच गए इस बार लड़ाई आर या पार की थी. गागरोन युद्ध 1519 में सुल्तान को मुंह की खानी पड़ी. सांगा ने सुल्तान को बंदी बना लिया राजस्थान के वीर योद्धा राणा सांगा न केवल अपनी बहादुरी से प्रसिद्ध था बल्कि मानवीय व्यवहार का भी अद्भुत परिचय दिया. सांगा ने सुल्तान को मुक्त कर दिया और मालवा वापस कर दिया. पहली बार मेवाड़ ने इस युद्ध में रक्षात्मक युद्ध के स्थान पर आक्रमण युद्ध का आरंभ किया. गागरोन युद्ध के पश्चात सांगा को मालवा संकट से मुक्ति मिल गई.

अब बात करते हैं राणा सांगा और गुजरात के संबंधों की: 1509 में राजतिलक के समय गुजरात का शासन महमूद बेगड़ा की हाथों में था, 1511 उस की मृत्यु के उपरांत उनका पुत्र मुजफ्फर शाह द्वितीय गुजरात की गद्दी पर आसीन हुआ. इडर के राव भाणा के पुत्र रायमल्ल और भारमल में आपसी लड़ाई में राणा सांगा रायमल का साथ दिया और उन को गद्दी पर बैठा दिया. राणा सांगा के इडर राज्य में हस्तक्षेप से सांगा का गुजरात के सुल्तान मुज्जफर शाह से टकराव शुरू हो गया. अब आप को यह बता दे की सांगा योद्धा ही नहीं अपनी राजनीति कूटनीति का खेल भी अच्छी तरह से खेल रहा था. मुजफ्फरपुर का उत्तराधिकारी सिकंदर सा था, परंतु उसका दूसरा पुत्र बहादुर शाह गद्दी पर आसीन होना चाहता था, इसलिए वह राणा सांगा की शरण में चला गया. मेवाड़ में रहते हुए राणा की माता ने बहादुर शाह को पुत्र वत् स्नेह प्रदान किया. राणा सांगा ने भी कई बार उसकी सहायता कर गुजरात लुटवाया. इस प्रकार राणा ने अपनी राजनीति कूटनीति से गुजरात को दबाये रखने में सफल हुआ.

दिल्ली सल्तनत और राणा सांगा: 1509 में राज्याभिषेक के समय दिल्ली का सुल्तान सिकंदर लोदी का शासन था यह वही सिकंदर लोदी है जिसने आगरा नगर की स्थापना की. सिकंदर लोदी की मृत्यु के बाद उसका पुत्र इब्राहिम लोदी 22 नवंबर 1517 दिल्ली के तख्त पर आसीन हुआ. राणा सांगा ने दिल्ली सल्तनत के अधीन राजस्थान के पूर्व क्षेत्र को जीतकर अपने अधिकार में कर लिया. सुल्तान को यह फूटी आंख न सुहायी और वह राणा को सबक सिखाने की ठान ली. सुल्तान ने मेवाड़ पर धावा बोल दिया उधर सांगा भी अपनी ताकत लोदी को दिखाने के लिए तत्पर था. परिणाम स्वरुप 1517 में हाड़ौती की सीमा पर खातोली का युद्ध हुआ. युद्ध का नतीजा राणा सांगा के पक्ष में रहा और सुल्तान परास्त होकर वापस दिल्ली लौट गया.

सुल्तान राणा सांगा से खातोली युद्ध में मिली शिकस्त का बदला लेने की ठानी और मिया मक्खन के नेतृत्व में शाही सेना राणा सांगा के विरुद्ध भेजी लेकिन परिणाम जस का तस रहा. एक बार फिर शाही सेना को मुंह की खानी पड़ी. इन दो युद्धों ने सांगा की कीर्ति में चार चांद लगा दिए. राणा की प्रतिष्ठा तो बढ़ी ही इसके साथ-साथ उनका वर्चस्व और उनका कद और ऊंचा होता गया. अब सुल्तान में मेवाड़ की तरफ आंख उठाने की हिम्मत ही नहीं रही युद्ध की सोचना तो उसके लिए कोसों दूर की बात थी.

बाबर का आगमन: काबुल का शासक बाबर तैमूर लंग के वंशज उमर शेख मिर्जा का पुत्र था. कहा जाता है कि बाबर की मां चंगेज खान के वंशज में से थी. भारतीय इतिहास में 20 अप्रैल 1526 को पानीपत की प्रथम लड़ाई में बाबर ने इब्राहिम लोदी को हराकर दिल्ली से सल्तनत शासन को जड़ से उखाड़ फेंका. दिल्ली का शासन मुगलों के हाथों में आ गया. बाबर जल्द ही राणा सांगा की कीर्ति और युद्ध कौशल से परिचित हुआ और उसे डर भी लगने लगा कि यह राजपूत राणा कभी भी उस को धूल चटा सकता है. वह सोचने पर मजबूर हो गया. बाबर संपूर्ण भारत पर अपने साम्राज्य का परचम लहराना चाहता था लेकिन उसकी राहों में सबसे बड़ा रोड़ा राणा सांगा था. बाबर जानता था कि जब तक राणा सांगा पर अधिकार नहीं कर लिया जाए तब तक उसका सपना, सपना ही बना रहेगा इसलिए उसने मेहंदी खान के नेतृत्व मे बयाना दुर्ग अधिकृत कर लिया.

16 फरवरी 1527 को सांगा ने बाबर की सेना को हराकर बयाना दुर्ग पर कब्जा कर लिया. बाबर को आशंका भी नहीं थी कि उसे मुंह की खानी पड़ेगी. उसे नहीं पता था कि यह राजपूत शासक इतना खतरनाक हो जाएगा और उस के सपनों को चकनाचूर कर देगा. अब बाबर सावधान हो गया और बदला लेने के लिए पुनः आक्रमण हेतु कूच किया. बयाना की विजय के बाद सांगा सीकरी जाने का सीधा मार्ग छोड़कर भुसावर होकर सीकरी जाने का मार्ग पकड़ा. वह भुसावर में लगभग 1 माह रुका रहा और इससे बाबर को खानवा के मैदान में उपयुक्त स्थान पर पड़ाव डालने और उचित सैन्य संचालन का पर्याप्त समय मिल गया. इसका परिणाम खानवा के युद्ध में दिखा. 17 मार्च 1527 को खानवा के मैदान में बाबर और राणा सांगा दोनों की सेनाओं के मध्य युद्ध हुआ. सांगा चाहता तो बाबर से सन्धि कर अपना राज्य बचा सकता था लेकिन वह जानता था कि यह संधि उसकी कीर्ति पर प्रश्न चिन्ह लगा देगी, सांगा मर सकता था पर झुक नहीं सकता.

राणा सांगा के झंडे के नीचे लगभग सभी राजपूत राजा आए. राणा सांगा ने अपनी पाती पेरवन की राजपूत परम्परा को पुनर्जीवित करके प्रत्येक सरदार को अपनी ओर से युद्ध में शामिल होने का निमंत्रण भेजा. मारवाड़ के राव गंगा एवं मालदेव, आमेर का राजा पृथ्वीराज , ईडर का राजा भारमल, विरमदेव मेड़तिया , वागड़ ( डूंगरपुर )का राव उदय सिंह व खेतसिंह , देवलिया का रावत बाघसिंह, नरबद हाड़ा, चंदेरी का मेदिनराय, वीर सिंह देव बीकानेर की राव जैतसी के पुत्र कुंवर कल्याणमल झाला अज्जा आदि कई राजपूत राणा सांगा के साथ थे. खानवा के युद्ध में शायद ही राजपूतों की कोई ऐसी शाखा रही जिससे कोई न कोई प्रसिद्ध व्यक्ति इस युद्ध में काम न आया हो. सांग अंतिम हिंदू राजा थे जिनके नेतृत्व में सभी राजपूत जातियां विदेशियों को बाहर निकालने के लिए एक साथ आयी. सांगा राजपूताने की सेना के सेनापति बने थे इस दौरान राणा सांगा के सिर पर एक तीर लगा जिससे वो मुर्छित हो गये. तब झाला अज्जा सब राज्य चिन्ह के साथ महाराणा के हाथी पर सवार हुआ और उसके अध्यक्षता में सारी सेना लड़ने लगी. झाला अज्जा ने इस युद्ध संचालन में अपने प्राण दिए.

थोड़ी ही देर में महाराणा के न होने की खबर सेना में फैल गई वह इसे सेना का मनोबल टूट गया. बाबर युद्ध में विजय हुआ. उनके साहस की तो उनके दुश्मन भी तारीफ करते थे. बाबर ने खुद लिखा है कि “खानवा की लड़ाई से पहले उसके सैनिक राणा सांगा की सेना से घबराए हुए थे” जिसकी वीरता के बारे में कहा जाता था कि वह अंतिम सांस तक लड़ती रहती है. मुर्छित महाराणा को राजपूत राजा बसवा गांव ले गये. खानवा के युद्ध में राणा सांगा के पराजय का मुख्य कारण राणा सांगा की प्रथम विजय के बाद तुरंत ही युद्ध न करके बाबर को तैयारी करने का समय देना था. राजपूतो की तकनीक भी पुरानी थी और भी बाबर की युद्ध की नवीन व्यूह रचना तुलुगमा पद्धति से अनभिज्ञ थे. बाबर की सेना के पास तोपें और बंदूकें थी जिसे राजपूत सेना की बड़ी हानि हुई.

मुर्छित महाराणा को लेकर राजपूत जब बसवा गांव पहुंचे तब महाराणा सचेत हुए और उन्होंने युद्ध के बारे में पूछा और राजपूतों से सारा वृत्तांत सुनने के बाद राणा सांगा बहुत उदास हुए. बाद में सांगा बसवा से रणथंभोर चले गए. बाद में बाबर राजपूतो पर आक्रमण कर उनकी शक्ति को नष्ट करने के विचार से 19 जनवरी 1528 को चंदेरी पहुंचा. चंदेरी के मदन राय की सहायता करने तथा बाबर से बदला लेने के लिए सांगा चंदेरी की ओर प्रस्थान किया और कालपी से कुछ दूर ईरिच गांव में डेरा डाला जहां उसके साथी राजपूतों ने जो नए युद्ध के विरोधी थे उसको फिर से युद्ध में प्रविष्ट देखकर विष दे दिया. कालपी नामक स्थान पर 30 जनवरी 1528 को राणा सांगा का स्वर्गवास हो गया. उनको मांडलगढ़ लाया गया जहां उनकी समाधि है.

महाराणा सांगा वीर, उदार, कृतज्ञ, बुद्धिमान और न्याय प्रिय शासक थे. मेवाड़ के ही नहीं सारे भारतवर्ष के इतिहास में महाराणा सांगा संग्राम सिंह का विशिष्ट स्थान है उनके राज्य काल में मेवाड़ा अपने गौरव वैभव के सर्वोच्च शिखर पर पहुंच गया था परंतु दुर्भाग्यवश उन्हीं के शासनकाल में मेवाड़ का पतन प्रारंभ हुआ. राणा संग्राम सिंह के साथ ही भारत की राजनीतिक रंग मंच पर हिंदू साम्राज्य का अंतिम दृश्य भी पूर्ण हो गया इसलिए उन्हें अंतिम भारतीय हिंदू सम्राट के रूप में स्मरण किया जाता है. इस घटना के बाद भारतवर्ष में मुगलों का राज्य स्थायी हो गया तथा बाबर स्थिर रूप से भारत वर्ष का बादशाह बना. राजसत्ता राजपूतों के हाथ से निकल कर मुगलों के हाथ में आ गई जो लगभग 200 वर्षों से अधिक समय तक के उनके पास बनी रही.

भारत पर मुग़ल सम्राज्य का शासन

मुग़ल साम्राज्य एक इस्लामी तुर्की-मंगोल साम्राज्य था जिसकी स्थापना बाबर के द्वारा 1526 ईस्वी में की गई थी. 1526 में स्थापित यह सम्राज्य 1857 तक बचा रहा, जब वह ब्रिटिश राज द्वारा हटाया गया. यह राजवंश कभी कभी तिमुरिड राजवंश के नाम से भी जाना जाता है क्योंकि बाबर तैमूर का वंशज था. फ़रग़ना वादी से आए एक तुर्की मुस्लिम बाबर ने मुग़ल राजवंश को स्थापित किया था. उन्होंने उत्तरी भारत के कुछ हिस्सों पर हमला किया और दिल्ली के शासक इब्राहिम शाह लोधी को 1526 में पानीपत के पहले युद्ध में हराया. मुग़ल साम्राज्य ने उत्तरी भारत के शासकों के रूप में दिल्ली के सुल्तान का स्थान लिया. समय के साथ, उमेर द्वारा स्थापित राज्य ने दिल्ली के सुल्तान की सीमा को पार किया, अंततः भारत का एक बड़ा हिस्सा घेरा और साम्राज्य की पदवी प्राप्त की. अपने नए राज्य की स्थापना को सुरक्षित करने के लिए, बाबर को खानवा के युद्ध में राजपूत शक्ति का सामना करना पड़ा जो चित्तौड़ के राणा साँगा के नेतृत्व में था. मुग़ल साम्राज्य का अंतिम सम्राट बहादुर ज़फ़र शाह था, जिसका शासन दिल्ली शहर तक सीमित रह गया था. अंग्रेजों ने उसे कैद में रखा और 1857 के भारतीय विद्रोह के बाद ब्रिटिश द्वारा म्यानमार निर्वासित कर दिया और मुग़ल सम्राज्य का अंत हो गया.

मुग़ल वंश के शासक:
बाबर: 1526 - 1530 ई.
हुमायूँ: 1530 - 1540 ई.
शुरी राजवंश शेर शाह सूरी: 1540-1555
हुमायूँ: 1555 - 1556 ई.
अकबर:1556 - 1605 ई.
जहाँगीर:1605 - 1627 ई.
शाहजहाँ:1627 - 1658 ई.
औरंगज़ेब:1658 - 1707 ई.
बहादुरशाह प्रथम: 1707 - 1712 ई.
जहाँदारशाह: 1712 - 1713 ई.
फ़र्रुख़सियर: 1713 - 1719 ई.
रफ़ीउद्दाराजात: फ़रवरी 1719 से जून 1719 ई.
रफ़ीउद्दौला: जून 1719 से सितम्बर, 1719 ई.
नेकसियर: 1719 ई. (कुछ दिन)
मुहम्मद इब्राहीम: 1719 ई. (कुछ दिन)
मुहम्मदशाह रौशन अख़्तर: 1719 - 1748 ई.
अहमदशाह: 1748 - 1754 ई.
आलमगीर द्वितीय: 1754 - 1759 ई.
शाहआलम द्वितीय: 1759 - 1806 ई.
अकबर द्वितीय: 1806 - 1837 ई.
बहादुरशाह द्वितीय: 1837 - 1857 ई.

मुगल बादशाह बाबर

ज़हीरुद्दीन मुहम्मद उर्फ बाबर मुग़ल साम्राज्य के संस्थापक और प्रथम शासक था. इसका जन्म मध्य एशिया के वर्तमान उज़्बेकिस्तान में हुआ था. यह तैमूर और चंगेज़ ख़ान का वंशज था. मुबईयान नामक पद्य शैली का जन्मदाता बाबर को ही माना जाता है. 1504 ई. में इन्होने काबुल तथा 1507 ई में कन्धार को जीता तथा बादशाह की उपाधि धारण की. 1519 से 1526 ई तक भारत पर इसने 5 बार आक्रमण किया. 1526 में इन्होंने पानीपत के मैदान में दिल्ली सल्तनत के अंतिम सुल्तान इब्राहिम लोदी को हराकर मुग़ल साम्राज्य की नींव रखी. बाबर ने 1527 में ख़ानवा, 1528 में चंदेरी तथा 1529 में घग्गर जीतकर अपने राज्य को सुरक्षित किया. 1530 ई० में इसकी मृत्यु हो गयी.

बाबर का जन्म फ़रग़ना वादी के अन्दीझ़ान नामक शहर में हुआ था जो अब उज्बेकिस्तान में है. वो अपने पिता उमर शेख़ मिर्ज़ा, जो फरगना घाटी के शासक थे तथा माता कुतलुग निगार खानम का ज्येष्ठ पुत्र था. हालाँकि बाबर का मूल मंगोलिया के बर्लास कबीले से सम्बन्धित था पर उस कबीले के लोगों पर फारसी तथा तुर्क जनजीवन का बहुत असर रहा था, वे इस्लाम में परिवर्तित हुए तथा उन्होने तुर्केस्तान को अपना वासस्थान बनाया. बाबर की मातृभाषा चग़ताई भाषा थी पर फ़ारसी, जो उस समय उस स्थान की आम बोलचाल की भाषा थी, में भी वो प्रवीण था. उसने चगताई में बाबरनामा के नाम से अपनी जीवनी लिखी. कहा जाता है कि बाबर बहुत ही तगड़ा और शक्तिशाली था. ऐसा भी कहा जाता है कि केवल व्यायाम के लिए वो दो लोगों को अपने दोनो कन्धों पर लादकर उन्नयन ढाल पर दौड़ लेता था. लोककथाओं के अनुसार बाबर अपने राह में आने वाली सभी नदियों को तैर कर पार करता था. उसने गंगा को दो बार तैर कर पार किया.

सन् 1494 में 12वर्ष की आयु में ही उसे फ़रगना घाटी के शासक का पद सौंपा गया. उसके चाचाओं ने इस स्थिति का फ़ायदा उठाया और बाबर को गद्दी से हटा दिया. कई सालों तक उसने निर्वासन में जीवन बिताया जब उसके साथ कुछ किसान और उसके सम्बंधी ही थे. 1496 में उसने उज़्बेक शहर समरकंद पर आक्रमण किया और 7 महीनों के बाद उसे जीत भी लिया. इसी बीच, जब वह समरकंद पर आक्रमण कर रहा था तब, उसके एक सैनिक सरगना ने फ़रगना पर अपना अधिपत्य जमा लिया. जब बाबर इसपर वापस अधिकार करने फ़रगना आ रहा था तो उसकी सेना ने समरकंद में उसका साथ छोड़ दिया जिसके फलस्वरूप समरकंद और फ़रगना दोनों उसके हाथों से चले गए. सन् 1501 में उसने समरकंद पर पुनः अधिकार कर लिया पर जल्द ही उसे उज़्बेक ख़ान मुहम्मद शैबानी ने हरा दिया और इस तरह समरकंद, जो उसके जीवन की एक बड़ी ख्वाहिश थी, उसके हाथों से फिर वापस निकल गया.

फरगना से अपने चन्द वफ़ादार सैनिकों के साथ भागने के बाद अगले तीन सालों तक उसने अपनी सेना बनाने पर ध्यान केन्द्रित किया. इस क्रम में उसने बड़ी मात्रा में बदख़्शान प्रांत के ताज़िकों को अपनी सेना में भर्ती किया. सन् 1504 में हिन्दूकुश की बर्फ़ीली चोटियों को पार करके उसने काबुल पर अपना नियंत्रण स्थापित किया. नए साम्राज्य के मिलने से उसने अपनी किस्मत के सितारे खुलने के सपने देखे. कुछ दिनों के बाद उसने हेरात के एक तैमूरवंशी हुसैन बैकरह, जो कि उसका दूर का रिश्तेदार भी था, के साथ मुहम्मद शायबानी के विरुद्ध सहयोग की संधि की. पर 1506 में हुसैन की मृत्यु के कारण ऐसा नहीं हो पाया और उसने हेरात पर अपना नियंत्रण स्थापित कर लिया. पर दो महीनों के भीतर ही, साधनों के अभाव में उसे हेरात छोड़ना पड़ा. अपनी जीवनी में उसने हेरात को "बुद्धिजीवियों से भरे शहर" के रूप में वर्णित किया है. वहाँ पर उसे युईगूर कवी मीर अली शाह नवाई की रचनाओं के बारे में पता चला जो चागताई भाषा को साहित्य की भाषा बनाने के पक्ष में थे. बाबर को अपनी जीवनी चागताई भाषा में लिखने की प्रेरणा उन्हीं से मिली.

काबुल लौटने के दो साल के भीतर ही एक और सरगना ने उसके ख़िलाफ़ विद्रोह किया और उसे काबुल से भागना पड़ा. जल्द ही उसने काबुल पर पुनः अपना नियंत्रण स्थापित कर लिया. इधर सन् 1510 में फ़ारस के शाह इस्माईल प्रथम, जो सफ़ीवी वंश का शासक था, ने मुहम्मद शायबानी को हराकर उसकी हत्या कर डाली. इस स्थिति को देखकर बाबर ने हेरात पर पुनः नियंत्रण स्थापित किया. इसके बाद उसने शाह इस्माईल प्रथम के साथ मध्य एशिया पर मिलकर अधिपत्य जमाने के लिए एक समझौता किया. शाह इस्माईल की मदद के बदले में उसने साफ़वियों की श्रेष्ठता स्वीकार की तथा खुद एवं अपने अनुयायियों को साफ़वियों की प्रभुता के अधीन समझा. इसके उत्तर में शाह इस्माईल ने बाबर को उसकी बहन ख़ानज़दा से मिलाया जिसे शायबानी, जिसे शाह इस्माईल ने हाल ही में हरा कर मार डाला था, ने कैद में रख़ा हुआ था और उससे विवाह करने की बलात कोशिश कर रहा था. शाह ने बाबर को ऐश-ओ-आराम तथा सैन्य हितों के लिये पूरी सहायता दी जिसका ज़बाब बाबर ने अपने को शिया परम्परा में ढाल कर दिया. उसने शिया मुसलमानों के अनुरूप वस्त्र पहनना आरंभ किया. शाह इस्माईल के शासन काल में फ़ारस शिया मुसलमानों का गढ़ बन गया और वो अपने आप को सातवें शिया इमाम मूसा अल क़ाज़िम का वंशज मानता था. वहाँ सिक्के शाह के नाम में ढलते थे तथा मस्ज़िद में खुतबे शाह के नाम से पढ़े जाते थे हालाँकि क़ाबुल में सिक्के और खुतबे बाबर के नाम से ही थे. बाबर समरकंद का शासन शाह इस्माईल के सहयोगी की हैसियत से चलाता था.

शाह की मदद से बाबर ने बुखारा पर चढ़ाई की. वहाँ पर बाबर, एक तैमूरवंशी होने के कारण, लोगों की नज़र में उज़्बेकों से मुक्तिदाता के रूप में देखा गया और गाँव के गाँव उसको बधाई देने के लिए खाली हो गए. इसके बाद फारस के शाह की मदद को अनावश्यक समझकर उसने शाह की सहायता लेनी बंद कर दी. अक्टूबर 1511 में उसने समरकंद पर चढ़ाई की और एक बार फिर उसे अपने अधीन कर लिया. वहाँ भी उसका स्वागत हुआ और एक बार फिर गाँव के गाँव उसको बधाई देने के लिए खाली हो गए. वहाँ सुन्नी मुलसमानों के बीच वह शिया वस्त्रों में एकदम अलग लग रहा था. हालाँकि उसका शिया हुलिया सिर्फ़ शाह इस्माईल के प्रति साम्यता को दर्शाने के लिए थी, उसने अपना शिया स्वरूप बनाए रखा. यद्यपि उसने फारस के शाह को खुश करने हेतु सुन्नियों का नरसंहार नहीं किया पर उसने शिया के प्रति आस्था भी नहीं छोड़ी जिसके कारण जनता में उसके प्रति भारी अनास्था की भावना फैल गई. इसके फलस्वरूप, 8 महीनों के बाद, उज्बेकों ने समरकंद पर फिर से अधिकार कर लिया.

उस समय दिल्ली सल्तनत पर ख़िलज़ी राजवंश के पतन के बाद अराजकता की स्थिति बनी हुई थी. तैमूरलंग के आक्रमण के बाद सैय्यदों ने स्थिति का फ़ायदा उठाकर दिल्ली की सत्ता पर अधिपत्य कायम कर लिया. तैमुर लंग के द्वारा पंजाब का शासक बनाए जाने के बाद खिज्र खान ने इस वंश की स्थापना की थी. बाद में लोदी राजवंश के अफ़ग़ानों ने सैय्यदों को हरा कर सत्ता हथिया ली थी. बाबर को लगता था कि दिल्ली की सल्तनत पर फिर से तैमूरवंशियों का शासन होना चाहिए. एक तैमूरवंशी होने के कारण वो दिल्ली सल्तनत पर कब्ज़ा करना चाहता था. उसने सुल्तान इब्राहिम लोदी को अपनी इच्छा से अवगत कराया. इब्राहिम लोदी के जबाब नहीं आने पर उसने छोटे-छोटे आक्रमण करने आरंभ कर दिए. सबसे पहले उसने कंधार पर कब्ज़ा किया. इधर शाह इस्माईल को तुर्कों के हाथों भारी हार का सामना करना पड़ा. इस युद्ध के बाद शाह इस्माईल तथा बाबर, दोनों ने बारूदी हथियारों की सैन्य महत्ता समझते हुए इसका उपयोग अपनी सेना में आरंभ किया. इसके बाद उसने इब्राहिम लोदी पर आक्रमण किया. पानीपत में लड़ी गई इस लड़ाई को पानीपत का प्रथम युद्ध के नाम से जानते हैं. यह युद्ध 21 अप्रैल 1526 को लड़ा गया था. इसमें बाबर की सेना इब्राहिम लोदी की सेना के सामने बहुत छोटी थी. पर सेना में संगठन के अभाव में इब्राहिम लोदी यह युद्ध बाबर से हार गया. इस युद्ध में बाबर ने तुलुगमा पद्धति का प्रयोग किया था. इसके बाद दिल्ली की सत्ता पर बाबर का अधिकार हो गया और उसने सन 1526 में मुगलवंश की नींव डाली.

उसी समय राजस्थान के मेवाड़ में राणा सांगा के नेतृत्व में राजपूत काफी संगठित तथा शक्तिशाली हो चुके थे. राजपूतों ने एक बड़ा-सा क्षेत्र स्वतंत्र कर लिया था और वे दिल्ली की सत्ता पर काबिज़ होना चाहते थे. बाबर की सेना राजपूतों की आधी भी नहीं थी. 17 मार्च 1527 में मेवाड़ के शासक राणा सांगा और बाबर के मध्य हुआ था. इस युद्ध में राणा सांगा का साथ खास तौर पर मुस्लिम यदुवंशी राजपूत उस वक़्त के मेवात के शासक खानजादा राजा हसन खान मेवाती और इब्राहिम लोदी के भाई मेहमूद लोदी ने दिया था, इस युद्ध में मारवाड़, अम्बर, ग्वालियर, अजमेर, बसीन चंदेरी भी मेवाड़ का साथ दे रहे थे. बाबर ने युद्ध के दौरान अपने सैनिकों के उत्साह को बढ़ाने के लिए शराब पीने और बेचने पर प्रतिबन्ध की घोषणा कर शराब के सभी पात्रों को तुड़वा कर शराब न पीने की कसम ली. उसने मुस्लिमों से तमगा कर न लेने की भी घोषणा की. तमगा एक प्रकार का व्यापारिक कर था, जो राज्य द्वारा लिया जाता था. बाबर 20,0000 मुग़ल सैनिकों को लेकर साँगा से युद्ध करने उतरा था. उसने साँगा की सेना के लोदी सेनापति को प्रलोभन दिया, जिससे वह साँगा को धोखा देकर सेना सहित बाबर से जा मिला. बाबर और साँगा की पहली मुठभेड़ बयाना में और दूसरी खानवा नामक स्थान पर हुई. इस तरह खानवा के युद्ध में भी पानीपत के युद्ध की रणनीति का उपयोग करके बाबर ने राणा साँगा के विरुद्ध एक सफल युद्ध की रणनीति तय की. इसमें राणा सांगा की हार हुई थी और बाबर की विजय हुई थी. यही से बाबर ने भारत में रहने का निश्चय किया इस युद्ध में हीं प्रथम बार बाबर ने धर्म युद्ध का नारा दिया और इसी युद्ध के बाद बाबर ने गाजी अर्थात दानी की उपाधि ली थी.

मेवाड़ विजय के पश्चात बाबर ने अपने सैनिक अधिकारियों को पूर्व में विद्रोहियों का दमन करने के लिए भेजा क्योंकि पूरब में बंगाल के शासक नुसरत शाह ने अफ़गानों का स्वागत किया था और समर्थन भी प्रदान किया था इससे उत्साहित होकर अफ़गानों ने अनेक स्थानों से मुगलों को निकाल दिया था. बाबर को भरोसा था कि उसका अधिकारी अफगान विद्रोहियों का दमन करेंगे अतः उसने चंदेरी पर आक्रमण करने का निश्चिय कर लिया. चंदेरी का राजपूत शासक मेेेेेदिनीराय खंगार खानवा का युद्ध में राणा सांगा की ओर से लड़ा था. चंदेरी का अपना एक व्यापारिक तथा सैनिक महत्व भी था, वह मालवा तथा राजपूताने में प्रवेश करने के लिए उपयुक्त स्थान था बाबर ने सेना चंदेरी पर आक्रमण करने के लिए भेजी थी उसे राजपूतों ने पराजित कर दिया इससे बाबर ने स्वयं चंदेरी जाने का निश्चय किया क्योंकि यह संभव है कि चंदेरी राजपूत शक्ति का केंद्र बन जाए. उसने चंदेरी के विरुद्ध लड़ने के लिए 21 जनवरी 1528 की तारीख को घोषित किया क्योंकि इस घोषणा से उसे चंदेरी की मुस्लिम जनता का जो बड़ी संख्या में समर्थन प्राप्त होने की आशा थी और जिहाद के द्वारा राजपूतों तथा इन मुस्लिमों का सहयोग रोका जा सकता था. उसने मेेेेेदिनीराय खंगार के पास संदेश भेजा कि वह शांति पूर्ण रूप से चंदेरी का समर्पण कर दे तो उसे शमशाबाद की जागीर दी जा सकती है. मेेेेेदिनीराय खंगार ने प्रस्ताव अस्वीकार कर दिया. राजपूतों ने भयंकर युद्ध किया और राजपूती वीरांगनाओं ने जौहर किया लेकिन बाबर के अनुसार उसने तोप खाने की मदद से एक ही घंटे मेंचंदेरी पर अधिकार कर लिया. उसने चंदेरी का राज्य मालवा सुल्तान के वंशज अहमद शाह को दे दिया और उसे आदेश दिया कि वह 20 लाख दाम प्रति वर्ष शाही कोष में जमा करें.

बीच में महमूद लोदी बिहार पहुंच गया और उसके नेतृत्व में एक लाख सैनिक एकत्रित हो गए इसके बाद अफ़ग़ानों ने पूर्वी क्षेत्रों पर आक्रमण कर दिया महमूद लोदी चुनार तक आया. ऐसी स्थिति में बाबर ने उनसे युद्ध करने के बाद जनवरी 1529 ईस्वी में आगरा से प्रस्थान किया. अनेक अफगान सरदारों ने उनकी अधीनता स्वीकार कर ली लेकिन मुख्य अफगान सेना जिसे बंगाल के शासक नुसरत शाह का समर्थन प्राप्त था, जो गंडक नदी के पूर्वी तट पर थी. बाबर ने गंगा नदी पार करके घाघरा नदी के पास आफगानों से घमासान युद्ध करके उन्हें पराजित किया. बाबर ने नुसरत शाह से संधि की जिसके अनुसार नुसरत शाह ने अफगान विद्रोहियों को शरण ना देने का वचन दिया. बाबर ने अफगान जलाल खान को अपने अधीन किया जो उस समय बिहार का शासक था, और उसे आदेश दिया कि वह शेर खां को अपना मंत्री रखें.

कहा जाता है कि अपने पुत्र हुमायूँ के बीमार पड़ने पर उसने अल्लाह से हुमायूँ को स्वस्थ्य करने तथा उसकी बीमारी खुद को दिये जाने की प्रार्थना की थी. इसके बाद बाबर का स्वास्थ्य बिगड़ गया और अंततः वो 1530 में 48 वर्ष की उम्र में मर गया. उसकी इच्छा थी कि उसे काबुल में दफ़नाया जाए पर पहले उसे आगरा में दफ़नाया गया. लगभग नौ वर्षों के बाद हुमायूँ ने उसकी इच्छा पूरी की और उसे काबुल में राजाराम जाट ने दफना दिया.

मुगल बादशाह हुमायूँ

प्रथम मुग़ल सम्राट बाबर के पुत्र नसीरुद्दीन हुमायूँ एक मुग़ल शासक था. बाबर की मृत्यु के पश्चात हुमायूँ ने 1530 में भारत की राजगद्दी संभाली और अफ़गानिस्तान, पाकिस्तान एंव उत्तर भारत के हिस्सों पर 1530-1540 और फिर 1555-1556 तक शासन किया. 26 दिसम्बर, 1530 ई. को बाबर की मृत्यु के बाद 30 दिसम्बर, 1530 ई. को 23 वर्ष की आयु में हुमायूँ का राज्याभिषेक किया गया. आपको बता दें कि बाबर ने उनके चार पुत्रों में मुगल सम्राज्य को लेकर लड़ाई न हो और अपने अन्य पुत्रों की उत्तराधिकारी बनने की इच्छा जताने से पहले ही अपने जीवित रहते हुए हुंमायूं को अपना उत्तराधिकारी घोषित कर दिया था. इसके साथ ही बाबर ने चारों तरफ फैले अपने मुगल सम्राज्य को मजबूत बनाए रखने के लिए हुंमायूं को मुगल सम्राज्य को चारों भाईयों में बांटने के आदेश दिए. जिसके बाद आज्ञाकारी पुत्र हुंमायूं ने अपने मुगल सम्राज्य को चारों भाईयों में बांट दिया. उसने अपने भाई कामरान मिर्जा को पंजाब, कांधार, काबुल, हिन्दाल को अलवर और असकरी को सम्भल की सूबेदारी प्रदान की, यही नहीं हुंमायूं ने अपने चचेरे भाई सुलेमान मिर्जा को बदखशा की जागीर सौंपी.

हालांकि, हुंमायूं द्धारा भाईयों को जागीर सौंपने का फैसला उसकी जिंदगी की सबसे बड़ी भूल साबित हुआ. इसकी वजह से उसे अपनी जिंदगी में कई बड़ी मुसीबतों का भी सामना करना पड़ा. वहीं उसका सौतेला भाई कामरान मिर्जा उसका बड़ा प्रतिद्धन्दी बना. हालांकि, हुंमायूं का अफगान शासको से कट्टर दुश्मनी थी, वहीं अफगान शासकों से लड़ाई में भी उसके भाईयों ने कभी सहयोग नहीं दिया जिससे बाद में हुंमायूं को असफलता हाथ लगी. हुमायूं ने अफ़गानिस्तान, पाकिस्तान और उत्तर भारत के कुछ क्षेत्रों में साल 1531 से 1540 तक शासन किया था, फिर दोबारा साल 1555 से 1556 तक शासन किया था. वहीं मुगल सम्राज्य का विस्तार पूरी दुनिया में करने के मकसद को लेकर हुंमायूं ने अपनी कुशल सैन्य प्रतिभा के चलते कई राज्यों में विजय अभियान चलाया. वहीं इन अभियानों के तहत उसने कई राज्यों में जीत का परचम भी लहराया था.

साल 1531 में गुजरात के शासक बहादुर शाह की लगातार बढ़ रही शक्ति को रोकने के लिए मुगल सम्राट हुंमायूं ने कालिंजर पर हमला किया. वहीं इस दौरान अफगान सरदार महमूद लोदी के जौनपुर और बिहार की तरफ आगे बढ़ने की खबर मिलते ही हुंमायूं गुजरात के शासक से कुछ पैसे लेकर वापस जौनपुर की तरफ चला गया. जिसके बाद दोनों के बीच युद्द हुआ. साल 1532 में अफगान सरदार महमूद लोदी और हुंमायूं की विशाल सेना के बीच दौहारिया नामक स्थान के बीच युद्ध हुआ, इस युद्ध में हुंमायूं के पराक्रम के आगे महमूद लोदी नहीं टिक पाया और उसे हार का मुंह देखना पड़ा. वहीं इस युद्द को दौहारिया का युद्ध कहा गया.

गुजरात के शासक बहादुर शाह ने 1531 ईसवी में मालवा तथा 1532 ई. में ‘रायसीन’ के महत्वपूर्ण क़िले पर अधिकार कर लिया. इसके बाद उसने मेवाड़ को संधि करने के लिए मजबूर किया. वहीं इस दौरान गुजरात के शासन बहादुर शाह ने टर्की के एक प्रख्यात एवं कुशल तोपची रूमी ख़ाँ की मदद से एक शानदार तोपखाने का निर्माण भी करवाया था. जिसके बाद हुंमायूं ने बहादुरशाह की बढ़ती हुई शक्ति को दबाने के लिए साल 1535 ई. में बहादुरशाह पर ‘सारंगपुर’ में आक्रमण कर दिया. दोनों के बीच हुए इस संघर्ष में गुजरात के शासक बहादुर शाह को मुगल सम्राट हुंमायूं से हार का सामना करना पड़ा था. इस तरह हुंमायूं ने माण्डू और चंपानेर के किलों पर भी अपना अधिकार जमा लिया और मालवा और गुजरात को उसने मुगल सम्राज्य में शामिल करने में सफलता हासिल की.

वहीं दूसरी तरफ शेर खां ने ‘सूरजगढ़ के राज’ में बंगाल को जीतकर काफ़ी ख्याति प्राप्त की, जिससे हुंमायूं की चिंता और अधिक बढ़ गई. इसके बाद हुंमायूं ने शेर खां को सबक सिखाने और उसकी शक्ति को दबाने के उद्देश्य से साल 1538 में चुमानगढ़ के किला पर घेरा डाला और अपने साहस और पराक्रम के बलबूते पर उस पर अपना अधिकार जमा लिया. हालांकि, शेर ख़ाँ (शेरशाह) के बेटे कुतुब ख़ाँ ने हुमायूँ को करीब 6 महीने तक इस किले पर अधिकार जमाने के लिए उसे काफी परेशान किया था और उसे कब्जा नहीं करने दिया था, लेकिन बाद में हुंमायूं के कूटनीति के सामने कुतुब खां को घुटने टेकने को मजबूर होना पड़ा था. इसके बाद 1538 ईसवी अपने विजय अभियान को आगे बढ़ाते हुए मुगल शासक हुंमायूं, बंगाल के गौड़ क्षेत्र में पहुंचा, जहां उसने चारों तरफ लाशों का मंजर देखा और अजीब से मनहूसियत महसूस की. इसके बाद हुंमायूं ने इस स्थान का फिर से निर्मण कर इसका नाम जन्नताबाद रख दिया.

वहीं बंगाल से लौटते समय हुमायूँ एवं शेरखाँ के बीच बक्सर के पास 29 जून, 1539 को चौसा नामक जगह पर युद्ध हुआ. इस युद्ध में मुगल सेना को भारी नुकसान हुआ और अफगान सेना ने जीत हासिल की. वहीं चौसा के युद्ध क्षेत्र से हुंमायूं ने किसी तरह अपनी जान बचाई. इतिहासकारों के मुताबिक चौसा के युद्द में जिस भिश्ती का सहारा लेकर हुंमायूं ने अपनी जान बचाई थी, उसे हुंमायूं ने 24 घंटे के लिए दिल्ली का बादशाह का ताज पहनाया था, जबकि अफगान सरदार शेर खां की इस युद्ध में महाजीत के बाद उसे ‘शेरशाह' की उपाधि से नवाजा गया. इसके साथ ही शेरशाह ने अपने नाम के सिक्के चलवाए.

17 मई 1540 ईसवी में हुंमायूं ने बिलग्राम और कन्नौज में लड़ाई लड़ी. वहीं इस लड़ाई में मुगल सम्राट हुंमायूं का उसके भाई अस्कारी और हिन्दाल ने साथ दिया, हालांकि हुंमायूं को इस युद्ध में असफलता हाथ लगी और यह एक निर्णायक युद्ध साबित हुआ. वहीं कन्नौज के इस युद्द के बाद हिन्दुस्तान में मुगल राज कमजोर पड़ गया और देश की राजसत्ता एक बार फिर से अफगानों के हाथ में आ गई. इस युद्ध में पराजित होने के बाद हुंमायूं सिंध चला गया, और करीब 15 साल तक निर्वासित जीवन व्यतीत किया. वहीं अपने इस निर्वासन काल के दौरान ही 29 अगस्त,1541 ईसवी में हुंमायूं ने हिन्दाल के आध्यात्मिक गुरू फारसवासी शिया मीर अली की पुत्री हमीदाबानों बेगम से निकाह कर लिया, जिनसे उन्हें महान बुद्धजीवी और योग्य पुत्र अकबर पैदा हुआ.

करीब 14 साल काबुल में बिताने के बाद साल 1545 ईसवी में मुगल सम्राट हुमायूं ने काबुल और कंधार पर अपनी कुशल रणनीतियों द्धारा फिर से अपना अधिकार जमा लिया. वहीं हिंदुस्तान के तल्ख पर फिर से राज करने के लिए 1554 ईसवी में हुमायूं अपनी भरोसेमंद सेना के साथ पेशावर पहुंचा और फिर अपने पूरे जोश के साथ उसने 1555 ईसवी में लाहौर पर दोबारा अधिकार कर जीत का फतवा लहराया. इसके बाद मुगल सम्राट हुंमायूं और अफगान सरदार नसीब खां एवं तांतर खां के बीच सतलुज नदी के पास ‘मच्छीवारा’ नामक जगह पर युद्ध हुआ. इस युद्द में भी हुंमायूं ने जीत हासिल की और इस तरह पूरे पंजाब पर मुगलों का अधिकार जमाने में सफल हुआ.

इसके बाद 15 मई 1555 ईसवी को ही मुगलों और अफगानों के बीच सरहिन्द नामक जगह पर भीषण संघर्ष हुआ. इस युद्ध में मुगल सेना का नेतृत्व बैरम खाँ ने और अफगान सेना का नेतृत्व सिकंदर सूर ने किया. हालांकि इस संघर्ष में अफगान सेना को मुगल सेना से हार खानी पड़ी और फिर 23 जुलाई, साल 1555 में मुगल सम्राट हुंमायूं, दिल्ली की सत्ता पर काबिज हुए. इस तरह मुगलों ने एक बार फिर अपने सम्राज्य स्थापित कर लिया और हिंदुस्तान में मुगलों का डंका बजा. दिल्ली के सिंहासन पर बैठने के बाद हुंमायूं ज्यादा दिनों तक सत्ता का सुख नहीं उठा सका. जनवरी, साल 1556 में जब वह दिल्ली में दीनपनाह भवन में स्थित लाइब्रेरी की सीढ़ियों से उतर रहा था, तभी उसका पैर लड़खड़ा गया और उसकी मृत्यु हो गई. वहीं हुंमायूं की मृत्यु के बाद उसका पुत्र अकबर ने मुगल सिंहासन संभाला. उस समय अकबर की उम्र महज 13-14 साल थी, इसलिए बैरम खां को अकबर का संरक्षक नियुक्त किया गया. इसके बाद अकबर ने मुगल सम्राज्य को मजबूती प्रदान की और लगभग पूरे भारत में मुगलों का सम्राज्य स्थापित किया. वहीं उनके मौत के कुछ दिनों बाद उनकी बेगम हमीदा बानू ने “हुंमायूं के मकबरा” का निर्माण करवाया जो कि आज दिल्ली की ऐतिहासिक इमारतों में से एक है, और यह मुगलकालीन वास्तुकला का एक अद्भुत नमूना है. इस तरह मुगल सम्राट हुंमायू के जीवन में कई उतार-चढ़ाव आए लेकिन हुंमायूं अपनी पराजय से निराश नहीं हुए बल्कि आगे बढ़ते रहे और एक बार फिर से अपने खोए हुए सम्राज्य को हासिल करने में सफल रहे.

शुरी सम्राज्य के संस्थापक शेर शाह सूरी

शेरशाह सूरी भारत में जन्मे पठान थे जिन्होंने हुमायूँ को 1540 में हराकर उत्तर भारत में सूरी साम्राज्य स्थापित किया था. शेरशाह सूरी ने पहले बाबर के लिये एक सैनिक के रूप में काम किया था जिन्होंने उन्हें पदोन्नत कर सेनापति बनाया और फिर बिहार का राज्यपाल नियुक्त किया. 1537 में, जब हुमायूँ कहीं सुदूर अभियान पर थे तब शेरशाह ने बंगाल पर कब्ज़ा कर सूरी वंश स्थापित किया था. सन् 1539 में, शेरशाह को चौसा की लड़ाई में हुमायूँ का सामना करना पड़ा जिसे शेरशाह ने जीत लिया. 1540 ई. में शेरशाह ने हुमायूँ को पुनः हराकर भारत छोड़ने पर मजबूर कर दिया और शेर खान की उपाधि लेकर सम्पूर्ण उत्तर भारत पर अपना साम्रज्य स्थापित कर दिया.

एक शानदार रणनीतिकार, शेर शाह ने खुद को सक्षम सेनापति के साथ ही एक प्रतिभाशाली प्रशासक भी साबित किया. 1540-1545 के अपने पांच साल के शासन के दौरान उन्होंने नयी नगरीय और सैन्य प्रशासन की स्थापना की, पहला रुपया जारी किया है, भारत की डाक व्यवस्था को पुनः संगठित किया और अफ़गानिस्तान में काबुल से लेकर बांग्लादेश के चटगांव तक ग्रांड ट्रंक रोड को बढ़ाया. साम्राज्य के उसके पुनर्गठन ने बाद में मुगल सम्राटों के लिए एक मजबूत नीव रखी विशेषकर हुमायूँ के बेटे अकबर के लिये.

शेरशाह का जन्म पंजाब के होशियारपुर शहर में बजवाड़ा नामक स्थान पर हुआ था, उनका असली नाम फ़रीद खाँ था पर वो शेरशाह के रूप में जाने जाते थे क्योंकि उन्होंने कथित तौर पर कम उम्र में अकेले ही एक शेर को मारा था. उनका कुलनाम 'सूरी' उनके गृहनगर "सुर" से लिया गया था. उनके दादा इब्राहिम खान सूरी नारनौल क्षेत्र में एक जागीरदार थे जो उस समय के दिल्ली के शासकों का प्रतिनिधित्व करते थे. उनके पिता पंजाब में एक अफगान रईस ज़माल खान की सेवा में थे. शेरशाह के पिता की चार पत्नियाँ थी जिनसे आठ बच्चे प्राप्त हुए .

शेरशाह को बचपन के दिनो में उसकी सौतेली माँ बहुत सताती थी तो उन्होंने घर छोड़ कर जौनपुर में पढ़ाई की. पढ़ाई पूरी कर शेरशाह 1522 में ज़माल खान की सेवा में चले गए. पर उनकी सौतेली माँ को ये पसंद नहीं आया. इसलिये उन्होंने ज़माल खान की सेवा छोड़ दी और बिहार के स्वघोषित स्वतंत्र शासक बहार खान नुहानी के दरबार में चले गए. अपने पिता की मृत्यु के बाद फ़रीद ने अपने पैतृक ज़ागीर पर कब्ज़ा कर लिया. कालान्तर में इसी जागीर के लिए शेरखां तथा उसके सौतेले भाई सुलेमान के मध्य विवाद हुआ. बहार खान के दरबार मे वो जल्द ही उनके सहायक नियुक्त हो गए और बहार खान के नाबालिग बेटे का शिक्षक और गुरू बन गए. लेकिन कुछ वर्षों में शेरशाह ने बहार खान का समर्थन खो दिया. इसलिये वो 1527-28 में बाबर के शिविर में शामिल हो गए. बहार खान की मौत पर, शेरशाह नाबालिग राजकुमार के संरक्षक और बिहार के राज्यपाल के रूप में लौट आया. बिहार का राज्यपाल बनने के बाद उन्होंने प्रशासन का पुनर्गठन शुरू किया और बिहार के मान्यता प्राप्त शासक बन गया. 1537 में बंगाल पर एक अचानक हमले में शेरशाह ने उसके बड़े क्षेत्र पर कब्जा कर लिया हालांकि वो हुमायूँ के बलों के साथ सीधे टकराव से बचता रहा.

अभी तक शेरशाह अपने आप को मुगल सम्राटों का प्रतिनिधि ही बताता था पर उनकी चाहत अब अपना साम्राज्य स्थापित करने की थी. शेरशाह की बढ़ती हुई ताकत को देख आखिरकार मुगल और अफ़ग़ान सेनाओं की जून 1539 में बक्सर के मैदानों पर भिड़ंत हुई. मुगल सेनाओं को भारी हार का सामना करना पड़ा. इस जीत ने शेरशाह का सम्राज्य पूर्व में असम की पहाड़ियों से लेकर पश्चिम में कन्नौज तक बढ़ा दिया. अब अपने साम्राज्य को वैध बनाने के लिये उन्होंने अपने नाम के सिक्कों को चलाने का आदेश दिया. यह मुगल सम्राट हुमायूँ को खुली चुनौती थी. अगले साल हुमायूँ ने खोये हुये क्षेत्रो पर कब्ज़ा वापिस पाने के लिये शेरशाह की सेना पर फिर हमला किया, इस बार कन्नौज पर हतोत्साहित और बुरी तरह से प्रशिक्षित हुमायूँ की सेना 17 मई 1540 को शेरशाह की सेना से हार गयी. इस हार ने बाबर द्वारा बनाये गये मुगल साम्राज्य का अंत कर दिया और उत्तर भारत पर सूरी साम्राज्य की शुरुआत की जो भारत में दूसरा पठान साम्राज्य था लोधी साम्राज्य के बाद.

शेर शाह सूरी जनता की भलाई के बारे में सोचने वाला एक लोकप्रिय और न्यायप्रिय शासक था, जिसने अपने शासनकाल में जनता के हित में कई भलाई के काम किए. शेरशाह सूरी ने सर्वप्रथम रूपए की मुद्रा के रूप में शुरुआत की. वहीं आज रुपया भारत समेत कई देशों की करंसी के रुप में भी इस्तेमाल किया जाता है. मध्यकालीन भारत के सबसे सफल शासकों में से एक शेरशाह सूरी ने अपने शासनकाल में भारत में पोस्टल विभाग को विकसित किया था. उसने उत्तर भारत में चल रही डाक व्यवस्था को दोबारा संगठित किया था, ताकि लोग अपने संदेशों को अपने करीबियों और परिचितों को भेज सकें. शेरशाह सूरी एक दूरदर्शी एवं कुशल प्रशासक था, जो कि विकास के कामों का करना अपना कर्तव्य समझता था. यही वजह है कि सूरी ने अपने शासनकाल में एक बेहद विशाल ग्रैंड ट्रंक रोड का निर्माण करवाकर यातायात की सुगम व्यवस्था की थी. आपको बता दें कि सूरी दक्षिण भारत को उत्तर के राज्यों से जोड़ना चाहते थे, इसलिए उन्हें इस विशाल रोड का निर्माण करवाया था.

ग्रांड ट्रंक रोड बहुत पुरानी है. प्राचीन काल में इसे उत्तरापथ कहा जाता था. ये गंगा के किनारे बसे नगरों को, पंजाब से जोड़ते हुए, ख़ैबर दर्रा पार करती हुई अफ़ग़ानिस्तान के केंद्र तक जाती थी. मौर्यकाल में बौद्ध धर्म का प्रसार इसी उत्तरापथ के माध्यम से गंधार तक हुआ. यूँ तो यह मार्ग सदियों से इस्तेमाल होता रहा लेकिन सोलहवीं शताब्दी में दिल्ली के सुल्तान शेरशाह सूरी ने इसे पक्का करवाया, दूरी मापने के लिए जगह-जगह पत्थर लगवाए, छायादार पेड़ लगवाए, राहगीरों के लिए सरायें बनवाईं और चुंगी की व्यवस्था की. ग्रांड ट्रंक रोड कोलकाता से पेशावर (पाकिस्तान) तक लंबी है. सूरी द्वारा बनाई गई यह विशाल रोड बांग्लादेश से होती हुई दिल्ली और वहां से काबुल तक होकर जाती थी. वहीं इस रोड का सफ़र आरामदायक बनाने के लिए शेरशाह सूरी ने कई जगहों पर कुंए, मस्जिद और विश्रामगृहों का निर्माण भी करवाया था. इसके अलावा शेर शाह सूरी ने यातायात को सुगम बनाने के लिए कई और नए रोड जैसे कि आगरा से जोधपुर, लाहौर से मुल्तान और आगरा से बुरहानपुर तक समेत नई सड़कों का निर्माण करवाया था.

शेर शाह सूरी एक न्यायप्रिय और ईमानदार शासक था, जिसने अपने शासनकाल में भ्रष्टाचार के खिलाफ अपनी आवाज बुलंद की और भ्रष्ट्चारियों के खिलाफ कड़ी नीतियां बनाईं. शेरशाह ने अपने शासनकाल के दौरान मस्जिद के मौलवियों एवं इमामों के द्धारा इस्लाम धर्म के नाम पर किए जा रहे भ्रष्टाचार पर न सिर्फ लगाम लगाई बल्कि उसने मस्जिद के रखरखाव के लिए मौलवियों को पैसा देना बंद कर दिया एवं मस्जिदों की देखरेख के लिए मुंशियों की नियुक्ति कर दी. इतिहासकारों के मुताबिक सूरी वंश के संस्थापक शेरशाह सूरी ने अपने सम्राज्य का विकास करने और सभी व्यवस्था सुचारू रुप से करने के लिए अपने सम्राज्य को 47 अलग-अलग हिस्सों में विभाजित कर दिया था. जिसे शेरशाह सूरी ने सरकार नाम दिया था. वहीं यह 47 सरकार छोटे-छोटे जिलों में तब्दील कर दी गई, जिसे परगना कहा गया. हर सरकार, के दो अलग-अलग प्रतिनिधि एक सेना अध्यक्ष और दूसरा कानून का रक्षक होता था, जो सरकार से जुड़े सभी विकास कार्यों के लिए जिम्मेदार होते थे.

22 मई 1545 में चंदेल राजपूतों के खिलाफ लड़ते हुए शेरशाह सूरी की कालिंजर किले की घेराबंदी की, जहां उक्का नामक आग्नेयास्त्र से निकले गोले के फटने से उसकी मौत हो गयी. शेरशाह ने अपने जीवनकाल में ही अपने मक़बरे का काम शुरु करवा दिया था. उनका गृहनगर सासाराम स्थित उसका मक़बरा एक कृत्रिम झील से घिरा हुआ है. यह मकबरा हिंदू मुस्लिम स्थापत्य शैली के काम का बेजोड़ नमूना है.

मुग़ल सम्राट अकबर

जलाल उद्दीन मोहम्मद अकबर मुगल वंश का तीसरा शासक था जिन्होंने 1556 से 1605 तक भारत पर शासन किया. अकबर को अकबर-ऐ-आज़म (अर्थात अकबर महान), शहंशाह अकबर, महाबली शहंशाह के नाम से भी जाना जाता है. सम्राट अकबर मुगल साम्राज्य के संस्थापक जहीरुद्दीन मुहम्मद बाबर का पौत्र और नासिरुद्दीन हुमायूं एवं हमीदा बानो का पुत्र था. बाबर का वंश तैमूर और मंगोल नेता चंगेज खां से संबंधित था अर्थात उसके वंशज तैमूर लंग के खानदान से थे और मातृपक्ष का संबंध चंगेज खां से था. अकबर मात्र तेरह वर्ष की आयु में अपने पिता नसीरुद्दीन मुहम्मद हुमायुं की मृत्यु उपरांत दिल्ली की राजगद्दी पर बैठा था. अपने शासन काल में उसने शक्तिशाली पश्तून वंशज शेरशाह सूरी के आक्रमण बिल्कुल बंद करवा दिये थे, साथ ही पानीपत के द्वितीय युद्ध में नवघोषित हिन्दू राजा हेमू को पराजित किया था. अपने साम्राज्य के गठन करने और उत्तरी और मध्य भारत के सभी क्षेत्रों को एकछत्र अधिकार में लाने में अकबर को दो दशक लग गये थे. उसका प्रभाव लगभग पूरे भारतीय उपमहाद्वीप पर था और इस क्षेत्र के एक बड़े भूभाग पर सम्राट के रूप में उसने शासन किया. सम्राट के रूप में अकबर ने शक्तिशाली और बहुल हिन्दू राजपूत राजाओं से राजनयिक संबंध बनाये और उनके यहाँ विवाह भी किये. उसने आगे चलकर एक नये धर्म दीन-ए-इलाही की भी स्थापना की, जिसमें विश्व के सभी प्रधान धर्मों की नीतियों व शिक्षाओं का समावेश था. दुर्भाग्यवश ये धर्म अकबर की मृत्यु के साथ ही समाप्त होता चला गया. इतने बड़े सम्राट की मृत्यु होने पर उसकी अन्त्येष्टि बिना किसी संस्कार के जल्दी ही कर दी गयी. परम्परानुसार दुर्ग में दीवार तोड़कर एक मार्ग बनवाया गया तथा उसका शव चुपचाप सिकंदरा के मकबरे में दफना दिया गया.

अकबर का जन्म पूर्णिमा के दिन हुआ था इसलिए उनका नाम बदरुद्दीन मोहम्मद अकबर रखा गया था. बद्र का अर्थ होता है पूर्ण चंद्रमा और अकबर उनके नाना शेख अली अकबर जामी के नाम से लिया गया था. कहा जाता है कि काबुल पर विजय मिलने के बाद उनके पिता हुमायूँ ने बुरी नज़र से बचने के लिए अकबर की जन्म तिथि एवं नाम बदल दिए थे. अकबर के पिता हुमायूँ को पश्तून नेता शेरशाह सूरी के कारण फारस में अज्ञातवास बिताना पड़ रहा था. किन्तु अकबर को वह अपने संग नहीं ले गया वरन रीवां (वर्तमान मध्य प्रदेश) के राज्य के एक ग्राम मुकुंदपुर में छोड़ दिया था. अकबर की वहां के राजकुमार राम सिंह प्रथम से, जो आगे चलकर रीवां का राजा बना, के संग गहरी मित्रता हो गयी थी. ये एक साथ ही पले और बढ़े और आजीवन मित्र रहे. कालांतर में अकबर सफ़ावी साम्राज्य (वर्तमान अफ़गानिस्तान का भाग) में अपने एक चाचा मिर्ज़ा अस्कारी के यहां रहने लगा. पहले वह कुछ दिनों कंधार में और फिर 1545 से काबुल में रहा. पढ़ने-लिखने में अकबर की रुचि नहीं थी, उसकी रुचि कबूतर बाजी, घुड़सवारी और कुत्ते पालने में अधिक थी. किन्तु ज्ञानोपार्जन में उसकी रुचि सदा से ही थी. कहा जाता है, कि जब वह सोने जाता था, एक व्यक्ति उसे कुछ पढ़ कर सुनाता रह्ता था. समय के साथ अकबर एक परिपक्व और समझदार शासक के रूप में उभरा, जिसे कला, स्थापत्य, संगीत और साहित्य में गहरी रुचि रहीं.

शेरशाह सूरी के पुत्र इस्लाम शाह के उत्तराधिकार के विवादों से उत्पन्न अरजकता का लाभ उठा कर हुमायूँ ने 1555 में दिल्ली पर पुनः अधिकार कर लिया. इसमें उसकी सेना में एक अच्छा भाग फारसी सहयोगी ताहमस्प प्रथम का रहा. इसके कुछ माह बाद ही 48 वर्ष की आयु में ही हुमायूँ का आकस्मिक निधन अपने पुस्तकालय की सीढ़ी से भारी नशे की हालात में गिरने के कारण हो गया. तब अकबर के संरक्षक बैरम खां ने साम्राज्य के हित में इस मृत्यु को कुछ समय के लिये छुपाये रखा और अकबर को उत्तराधिकार हेतु तैयार किया. 14 फ़रवरी, 1556 को अकबर का राजतिलक हुआ. ये सब मुगल साम्राज्य से दिल्ली की गद्दी पर अधिकार की वापसी के लिये सिकंदर शाह सूरी से चल रहे युद्ध के दौरान ही हुआ. 13 वर्षीय अकबर का कलनौर, पंजाब में सुनहरे वस्त्र तथा एक गहरे रंग की पगड़ी में एक नवनिर्मित मंच पर राजतिलक हुआ. ये मंच आज भी बना हुआ है. उसे फारसी भाषा में सम्राट के लिये शब्द शहंशाह से पुकारा गया. वयस्क होने तक उसका राज्य बैरम खां के संरक्षण में चला.

तत्कालीन मुगल राज्य केवल काबुल से दिल्ली तक ही फैला हुआ था. इसके साथ ही अनेक समस्याएं भी सिर उठाये खड़ी थीं. अपने शासन के आरंभिक काल में ही अकबर यह समझ गया कि सूरी वंश को समाप्त किए बिना वह चैन से शासन नहीं कर सकेगा. इसलिए वह सूरी वंश के सबसे शक्तिशाली शासक सिकंदर शाह सूरी पर आक्रमण करने पंजाब चल पड़ा. दिल्ली का शासन उसने मुग़ल सेनापति तारदी बैग खान को सौंप दिया. सिकंदर शाह सूरी अकबर के लिए बहुत बड़ा प्रतिरोध साबित नही हुआ. कुछ प्रदेशो मे तो अकबर के पहुँचने से पहले ही उसकी सेना पीछे हट जाती थी. अकबर की अनुपस्थिति मे हेमू विक्रमादित्य ने दिल्ली और आगरा पर आक्रमण कर विजय प्राप्त की. 6 अक्तूबर 1556 को हेमु ने स्वयं को भारत का महाराजा घोषित कर दिया. इसी के साथ दिल्ली मे हिंदू राज्य की पुनः स्थापना हुई.

दिल्ली की पराजय का समाचार जब अकबर को मिला तो उसने तुरन्त ही बैरम खान से परामर्श कर के दिल्ली की तरफ़ कूच करने का इरादा बना लिया. अकबर के सलाहकारो ने उसे काबुल की शरण में जाने की सलाह दी. अकबर और हेमु की सेना के बीच पानीपत मे युद्ध हुआ. यह युद्ध पानीपत का द्वितीय युद्ध के नाम से प्रसिद्ध है. संख्या में कम होते हुए भी अकबर ने इस युद्ध मे विजय प्राप्त की. इस विजय से अकबर को 1500 हाथी मिले जो मनकोट के हमले में सिकंदर शाह सूरी के विरुद्ध काम आए. सिकंदर शाह सूरी ने आत्मसमर्पण कर दिया और अकबर ने उसे प्राणदान दे दिया. दिल्ली पर पुनः अधिकार जमाने के बाद अकबर ने अपने राज्य का विस्तार करना शुरू किया और मालवा को 1562 में, गुजरात को 1572 में, बंगाल को 1574 में, काबुल को 1581 में, कश्मीर को 1586 में और खानदेश को 1601 में मुग़ल साम्राज्य के अधीन कर लिया. अकबर ने इन राज्यों में एक एक राज्यपाल नियुक्त किया. अकबर यह नही चाहता था की मुग़ल साम्राज्य का केन्द्र दिल्ली जैसे दूरस्थ शहर में हो; इसलिए उसने यह निर्णय लिया की मुग़ल राजधानी को फतेहपुर सीकरी ले जाया जाए जो साम्राज्य के मध्य में थी. कुछ ही समय के बाद अकबर को राजधानी फतेहपुर सीकरी से हटानी पड़ी. कहा जाता है कि पानी की कमी इसका प्रमुख कारण था. फतेहपुर सीकरी के बाद अकबर ने एक चलित दरबार बनाया जो कि साम्राज्य भर में घूमता रहता था इस प्रकार साम्राज्य के सभी कोनो पर उचित ध्यान देना सम्भव हुआ. सन 1585 में उत्तर पश्चिमी राज्य के सुचारू राज पालन के लिए अकबर ने लाहौर को राजधानी बनाया. अपनी मृत्यु के पूर्व अकबर ने सन 1599 में वापस आगरा को राजधानी बनाया और अन्त तक यहीं से शासन संभाला.

अकबर ने अपने शासनकाल में ताँबें, चाँदी एवं सोनें की मुद्राएँ प्रचलित की. इन मुद्राओं के पृष्ठ भाग में सुंदर इस्लामिक छपाई हुआ करती थी. अकबर ने अपने काल की मुद्राओ में कई बदलाव किए. उसने एक खुली टकसाल व्यवस्था की शुरुआत की जिसके अन्दर कोई भी व्यक्ति अगर टकसाल शुल्क देने मे सक्षम था तो वह किसी दूसरी मुद्रा अथवा सोने से अकबर की मुद्रा को परिवर्तित कर सकता था. अकबर चाहता था कि उसके पूरे साम्राज्य में समान मुद्रा चले. आगरा शहर का नया नाम दिया गया अकबराबाद जो साम्राज्य की सबसे बड़ा शहर बना. शहर का मुख्य भाग यमुना नदी के पश्चिमी तट पर बसा था. यहां बरसात के पानी की निकासी की अच्छी नालियां-नालों से परिपूर्ण व्यवस्था बनायी गई. लोधी साम्राज्य द्वारा बनवायी गई गारे-मिट्टी से बनी नगर की पुरानी चारदीवारी को तोड़कर 1565 में नयी बलुआ पत्थर की दीवार बनवायी गई. अंग्रेज़ इतिहासकार युगल ब्लेयर एवं ब्लूम के अनुसार इस लाल दीवार के कारण ही इसका नाम लाल किला पड़ा. वे आगे लिखते हैं कि यह किला पिछले किले के नक्शे पर ही कुछ अर्धवृत्ताकार बना था. शहर की ओर से इसे एक दोहरी सुरक्षा दीवार घेरे है, जिसके बाहर गहरी खाई बनी है. इस दोहरी दीवार में उत्तर में दिल्ली गेट व दक्षिण में अमर सिंह द्वार बने हैं. वर्तमान किला अकबर के पौत्र शाहजहां द्वारा बनवाया हुआ है. इसमें दक्षिणी ओर जहांगीरी महल और अकबर महल हैं.

आंबेर के कछवाहा राजपूत राज भारमल ने अकबर के दरबार में अपने राज्य संभालने के कुछ समय बाद ही प्रवेश पाया था. इन्होंने अपनी राजकुमारी हरखा बाई का विवाह अकबर से करवाना स्वीकार किया. विवाहोपरांत मुस्लिम बनी और मरियम-उज़-ज़मानी कहलायी. उसे राजपूत परिवार ने सदा के लिये त्याग दिया और विवाह के बाद वो कभी आमेर वापस नहीं गयी. उसे विवाह के बाद आगरा या दिल्ली में कोई महत्त्वपूर्ण स्थान भी नहीं मिला था, बल्कि भरतपुर जिले का एक छोटा सा गाँव मिला था. उसकी मृत्यु 1623 में हुई थी. उसके पुत्र जहांगीर द्वारा उसके सम्मान में लाहौर में एक मस्जिद बनवायी गई थी. भारमल को अकबर के दरबार में ऊंचा स्थान मिला था और उसके बाद उसके पुत्र भगवंत दास और पौत्र मानसिंह भी दरबार के ऊंचे सामन्त बने रहे. हिन्दू राजकुमारियों को मुस्लिम राजाओं से विवाह में संबंध बनाने के प्रकरण अकबर के समय से पूर्व काफी हुए थे, किन्तु अधिकांश विवाहों के बाद दोनों परिवारों के आपसी संबंध अच्छे नहीं रहे और न ही राजकुमारियां कभी वापस लौट कर घर आयीं. हालांकि अकबर ने इस मामले को पिछले प्रकरणों से अलग रूप दिया, जहां उन रानियों के भाइयों या पिताओं को पुत्रियों या बहनों के विवाहोपरांत अकबर के मुस्लिम ससुराल वालों जैसा ही सम्मान मिला करता था, सिवाय उनके संग खाना खाने और प्रार्थना करने के. उन राजपूतों को अकबर के दरबार में अच्छे स्थान मिले थे. सभी ने उन्हें वैसे ही अपनाया था सिवाय कुछ रूढ़िवादी परिवारों को छोड़कर, जिन्होंने इसे अपमान के रूप में देखा था.

अन्य राजपूर रजवाड़ों ने भी अकबर के संग वैवाहिक संबंध बनाये थे, किन्तु विवाह संबंध बनाने की कोई शर्त नहीं थी. दो प्रमुख राजपूत वंश, मेवाड़ के शिशोदिया और रणथंभौर के हाढ़ा वंश इन संबंधों से सदा ही हटते रहे. अन्य कई राजपूत सामन्तों को भी अपने राजाओं का पुत्रियों को मुगलों को विवाह के नाम पर देना अच्छा नहीं लगता था. गढ़ सिवान के राठौर कल्याणदास ने मोटा राजा राव उदयसिंह और जहांगीर को मारने की धमकी भी दी थी, क्योंकि उदयसिंह ने अपनी पुत्री जगत गोसाई का विवाह अकबर के पुत्र जहांगीर से करने का निश्चय किया था. अकबर ने ये ज्ञान होने पर शाही फौजों को कल्याणदास पर आक्रमण हेतु भेज दिया. कल्याणदास उस सेना के संग युद्ध में काम आया और उसकी स्त्रियों ने जौहर कर लिया. इन संबंधों का राजनीतिक प्रभाव महत्त्वपूर्ण था. हालांकि कुछ राजपूत स्त्रियों ने अकबर के हरम में प्रवेश लेने पर इस्लाम स्वीकार किया, फिर भी उन्हें पूर्ण धार्मिक स्वतंत्रता थी, साथ ही उनके सगे-संबंधियों को जो हिन्दू ही थे; दरबार में उच्च-स्थान भी मिले थे.

तत्कालीन समाज में वेश्यावृति को सम्राट का संरक्षण प्रदान था. उसकी एक बहुत बड़ी हरम थी जिसमे बहुत सी स्त्रियाँ थीं. इनमें अधिकांश स्त्रियों को बलपूर्वक अपहृत करवा कर वहां रखा हुआ था. उस समय में सती प्रथा भी जोरों पर थी. तब कहा जाता है कि अकबर के कुछ लोग जिस सुन्दर स्त्री को सती होते देखते थे, बलपूर्वक जाकर सती होने से रोक देते व उसे सम्राट की आज्ञा बताते तथा उस स्त्री को हरम में डाल दिया जाता था. हालांकि इस प्रकरण को दरबारी इतिहासकारों ने कुछ इस ढंग से कहा है कि इस प्रकार बादशाह सलामत ने सती प्रथा का विरोध किया व उन अबला स्त्रियों को संरक्षण दिया. अपनी जीवनी में अकबर ने स्वयं लिखा है– यदि मुझे पहले ही यह बुधिमत्ता जागृत हो जाती तो मैं अपनी सल्तनत की किसी भी स्त्री का अपहरण कर अपने हरम में नहीं लाता. इस बात से यह तो स्पष्ट ही हो जाता है कि वह सुन्दरियों का अपहरण करवाता था. इसके अलावा अपहरण न करवाने वाली बात की निरर्थकता भी इस तथ्य से ज्ञात होती है कि न तो अकबर के समय में और न ही उसके उतराधिकारियो के समय में हरम बंद हुई थी.

आईने अकबरी के अनुसार अब्दुल कादिर बदायूंनी कहते हैं कि बेगमें, कुलीन, दरबारियो की पत्नियां अथवा अन्य स्त्रियां जब कभी बादशाह की सेवा में पेश होने की इच्छा करती हैं तो उन्हें पहले अपने इच्छा की सूचना देकर उत्तर की प्रतीक्षा करनी पड़ती है; जिन्हें यदि योग्य समझा जाता है तो हरम में प्रवेश की अनुमति दी जाती है. अकबर अपनी प्रजा को बाध्य किया करता था की वह अपने घर की स्त्रियों का नग्न प्रदर्शन सामूहिक रूप से आयोजित करे जिसे अकबर ने खुदारोज (प्रमोद दिवस) नाम दिया हुआ था. इस उत्सव के पीछे अकबर का एकमात्र उदेश्य सुन्दरियों को अपने हरम के लिए चुनना था. गोंडवाना की रानी दुर्गावती पर भी अकबर की कुदृष्टि थी. उसने रानी को प्राप्त करने के लिए उसके राज्य पर आक्रमण कर दिया. युद्ध के दौरान वीरांगना ने अनुभव किया कि उसे मारने की नहीं वरन बंदी बनाने का प्रयास किया जा रहा है, तो उसने वहीं आत्महत्या कर ली. तब अकबर ने उसकी बहन और पुत्रबधू को बलपूर्वक अपने हरम में डाल दिया. अकबर ने यह प्रथा भी चलाई थी कि उसके पराजित शत्रु अपने परिवार एवं परिचारिका वर्ग में से चुनी हुई महिलायें उसके हरम में भेजे.

हिन्दुओं पर लगे जज़िया 1562में अकबर ने हटा दिया, किंतु 1575 में मुस्लिम नेताओं के विरोध के कारण वापस लगाना पड़ा. जज़िया कर गरीब हिन्दुओं को गरीबी से विवश होकर इस्लाम की शरण लेने के लिए लगाया जाता था. यह मुस्लिम लोगों पर नहीं लगाया जाता था. इस कर के कारण बहुत सी गरीब हिन्दू जनसंख्या पर बोझ पड़ता था, जिससे विवश हो कर वे इस्लाम कबूल कर लिया करते थे. फिरोज़ शाह तुगलक ने जबरन इस्लाम धर्म अपनाने के लिए और इस्लाम को दुनिया भर में फ़ैलाने के लिए जजिया कर की शुरुआत किया था. अकबर ने बहुत से हिन्दुओं को उनकी इच्छा के विरुद्ध भी इस्लाम ग्रहण करवाया था. इसके अलावा उसने बहुत से हिन्दू तीर्थ स्थानों के नाम भी इस्लामी किए, जैसे 1583 में प्रयागराज को इलाहाबाद किया गया.

अकबर अपने हिन्दू सामंतों से काफीअभद्र व्यवहार किया करता था. अकबर के नवरत्न राजा मानसिंह द्वारा विश्वनाथ मंदिर के निर्माण को अकबर की अनुमति के बाद किए जाने के कारण हिन्दुओं ने उस मंदिर में जाने का बहिष्कार कर दिया. कारण साफ था, कि राजा मानसिंह के परिवार के अकबर से वैवाहिक संबंध थे. अकबर के हिन्दू सामंत उसकी अनुमति के बगैर मंदिर निर्माण तक नहीं करा सकते थे. बंगाल में राजा मानसिंह ने एक मंदिर का निर्माण बिना अनुमति के आरंभ किया, तो अकबर ने पता चलने पर उसे रुकवा दिया और 1595 में उसे मस्जिद में बदलने के आदेश दिए.

अकबर के लिए आक्रोश की हद एक घटना से पता चलती है। हिन्दू किसानों के एक नेता राजा राम ने अकबर के मकबरे, सिकंदरा, आगरा को लूटने का प्रयास किया, जिसे स्थानीय फ़ौजदार, मीर अबुल फजल ने असफल कर दिया. इसके कुछ ही समय बाद 1688 में राजा राम सिकंदरा में दोबारा प्रकट हुआ और शाइस्ता खां के आने में विलंब का फायदा उठाते हुए, उसने मकबरे पर दोबारा सेंध लगाई और बहुत से बहुमूल्य सामान, जैसे सोने, चाँदी, बहुमूल्य कालीन, चिराग, इत्यादि लूट लिए, तथा जो ले जा नहीं सका, उन्हें बर्बाद कर गया. राजा राम और उसके आदमियों ने अकबर की अस्थियों को खोद कर निकाल लिया एवं जला कर भस्म कर दिया, जो कि मुस्लिमों के लिए घोर अपमान का विषय था.

दीन-ए-इलाही नाम से अकबर ने 1572 में एक नया धर्म बनाया जिसमें सभी धर्मो के मूल तत्वों को डाला, इसमे प्रमुखतः हिंदू एवं इस्लाम धर्म थे. इनके अलावा पारसी, जैन एवं ईसाई धर्म के मूल विचारों को भी सम्मिलित किया. हालांकि इस धर्म के प्रचार के लिए उसने कुछ अधिक नहीं किये केवल अपने विश्वस्त लोगो को ही इसमे सम्मिलित किया. कहा जाता हैं कि अकबर के अलावा केवल राजा बीरबल ही मृत्यु तक इस के अनुयायी थे. दबेस्तान-ए-मजहब के अनुसार अकबर के पश्चात केवल 19 लोगो ने इस धर्म को अपनाया. कालांतर में अकबर ने एक नए पंचांग की रचना की जिसमे कि उसने एक ईश्वरीय संवत को आरम्भ किया जो उसके ही राज्याभिषेक के दिन से प्रारम्भ होता था. उसने तत्कालीन सिक्कों के पीछे ‘‘अल्लाह-ओ-अकबर’’ लिखवाया जो अनेकार्थी शब्द था. अकबर का शाब्दिक अर्थ है "महान" और ‘‘अल्लाह-ओ-अकबर’’ शब्द के दो अर्थ हो सकते थे "अल्लाह महान हैं " या "अकबर ही अल्लाह हैं". निरक्षर होते हुई भी अकबर को कलाकारों एवं बुद्धिजीवियो से विशेष प्रेम था. उसके इसी प्रेम के कारण अकबर के दरबार में नौ अति गुणवान दरबारी थे जिन्हें अकबर के नवरत्न के नाम से भी जाना जाता है.

अकबर और महाराणा प्रताप के बीच हल्दी घाटी का युद्ध

महाराणा प्रताप का नाम भारत के इतिहास में उनकी बहादुरी के कारण अमर है. वह अकेले राजपूत राजा थे जिन्होंने मुगल बादशाह अकबर की अधीनता स्वीकार नहीं की. उनका जन्म आज ही के दिन यानी 9 मई, 1540 को राजस्थान के कुंभलगढ़ किले में हुआ था. उनके पिता का नाम महाराणा उदय सिंह था और माता महारानी जयवंता बाई थीं. अपने परिवार की वह सबसे बड़ी संतान थे. उनके बचपन का नाम कीका था. बचपन से ही महाराणा प्रताप बहादुर और दृढ़ निश्चयी थे. सामान्य शिक्षा से खेलकूद एवं हथियार बनाने की कला सीखने में उनकी रुचि अधिक थी. उनको धन-दौलत की नहीं बल्कि मान-सम्मान की ज्यादा परवाह थी. उनके बारे में मुगल दरबार के कवि अब्दुर रहमान ने लिखा है, 'इस दुनिया में सभी चीज खत्म होने वाली है. धन-दौलत खत्म हो जाएंगे लेकिन महान इंसान के गुण हमेशा जिंदा रहेंगे. प्रताप ने धन-दौलत को छोड़ दिया लेकिन अपना सिर कभी नहीं झुकाया. हिंद के सभी राजकुमारों में अकेले उन्होंने अपना सम्मान कायम रखा.

महाराणा प्रताप के पिता उदय सिंह अपनी मृत्यु से पहले बेटे जगमल को अपना उत्तराधिकारी घोषित किया था जो उनकी सबसे छोटी पत्नी से थे. वह प्रताप सिंह से छोटे थे. जब पिता ने छोटे भाई को राजा बना दिया तो अपने छोटे भाई के लिए प्रताप सिंह मेवाड़ से निकल जाने को तैयार थे लेकिन सरदारों के आग्रह पर रुक गए. मेवाड़ के सभी सरदार राजा उदय सिंह के फैसले से सहमत नहीं थे. सरदार और आम लोगों की इच्छा का सम्मान करते हुए प्रताप सिंह मेवाड़ का शासन संभालने के लिए तैयार हो गए. प्रताप केे उत्तराधिकारी होने पर इसकेे विरोध स्वरूप जगमाल अकबर केे खेमे में चला जाता है. महाराणा प्रताप का प्रथम राज्याभिषेक 28 फरवरी, 1572 में गोगुन्दा में हुआ था, लेकिन विधि विधानस्वरूप राणा प्रताप का द्वितीय राज्याभिषेक 1572 ई. में ही कुुंभलगढ़़ दुुर्ग में हुआ, दुसरे राज्याभिषेक में जोधपुर का राठौड़ शासक राव चन्द्रसेेन भी उपस्थित थे.

महाराणा प्रताप के समय दिल्ली पर मुगल शासक अकबर का राज था. अकबर के समय के राजपूत नरेशों में महाराणा प्रताप ही ऐसे थे, जिन्हें मुगल बादशाह की गुलामी पसंद नहीं थी. महाराणा प्रताप के शासनकाल में सबसे रोचक तथ्य यह है कि मुगल सम्राट अकबर बिना युद्ध के प्रताप को अपने अधीन लाना चाहता था इसलिए अकबर ने प्रताप को समझाने के लिए चार राजदूत नियुक्त किए जिसमें सर्वप्रथम सितम्बर 1572 ई. में जलाल खाँ प्रताप के खेमे में गया, इसी क्रम में मानसिंह (1573 ई. में ), भगवानदास ( सितम्बर, 1573 ई. में ) तथा राजा टोडरमल ( दिसम्बर,1573 ई.) प्रताप को समझाने के लिए पहुँचे, लेकिन राणा प्रताप ने चारों को निराश किया, इस तरह राणा प्रताप ने मुगलों की अधीनता स्वीकार करने से मना कर दिया जिसके परिणामस्वरूप हल्दी घाटी का ऐतिहासिक युद्ध हुआ.

अकबर ने मेवाड़ को पूरी तरह से जीतने के लिए 18 जून, 1576 ई. में आमेर के राजा मानसिंह और आसफ खां के नेतृत्व में मुगल सेना को आक्रमण के लिए भेजा. दोनों सेनाओं के बीच गोगुडा के नजदीक अरावली पहाड़ी की हल्दीघाटी शाखा के बीच युद्ध हुआ. इस लड़ाई को हल्दीघाटी के युद्ध के नाम से जाना जाता है. 'हल्दीघाटी का युद्ध' भारतीय इतिहास में प्रसिद्ध है. इस युद्ध के बाद महाराणा प्रताप की युद्ध-नीति छापामार लड़ाई की रही थी. ऐसा माना जाता है कि इस युद्ध में न तो अकबर जीत सका और न ही राणा हारे. मुगलों के पास सैन्य शक्ति अधिक थी तो राणा प्रताप के पास जुझारू शक्ति की कोई कमी नहीं थी. उन्होंने आखिरी समय तक अकबर से संधि की बात स्वीकार नहीं की और मान-सम्मान के साथ जीवन व्यतीत करते हुए लड़ाइयां लड़ते रहे.

भारतीय इतिहास में जितनी महाराणा प्रताप की बहादुरी की चर्चा हुई है, उतनी ही प्रशंसा उनके घोड़े चेतक को भी मिली. कहा जाता है कि चेतक कई फीट उंचे हाथी के मस्तक तक उछल सकता था. कुछ लोकगीतों के अलावा हिन्दी कवि श्यामनारायण पांडेय की वीर रस कविता 'चेतक की वीरता' में उसकी बहादुरी की खूब तारीफ की गई है. हल्दीघाटी के युद्ध में चेतक, अकबर के सेनापति मानसिंह के हाथी के मस्तक की ऊंचाई तक बाज की तरह उछल गया था. फिर महाराणा प्रताप ने मानसिंह पर वार किया. जब मुगल सेना महाराणा के पीछे लगी थी, तब चेतक उन्हें अपनी पीठ पर लादकर 26 फीट लंबे नाले को लांघ गया, जिसे मुगल फौज का कोई घुड़सवार पार न कर सका. प्रताप के साथ युद्ध में घायल चेतक को वीरगति मिली थी.

मुग़ल बादशाह जहाँगीर

जहाँगीर एक मुगल सम्राट था जो अपने पिता अकबर के बाद सिंहासन पर बैठा था. मुगल सम्राट जहांगीर को आगरा में बनी “न्याय की जंजीर” के लिए भी याद किया जाता है. जहाँगीर का जन्म 31 अगस्त 1569 को फतेहपुर सीकरी में हुआ था. उनका वास्तविक नाम मिर्ज़ा नूर-उद्दीन बेग़ मोहम्मद ख़ान सलीम जहाँगीर था. उनके पिता का नाम अकबर तथा उनकी माता का नाम मरियम उज़-ज़मानी था. जहाँगीर से पहले अकबर की कोई भी संतानें जीवित नहीं बचती थी, जिसके चलते सम्राट अकबर ने काफी मिन्नतें कीं और फिर बाद सलीम का जन्म हुआ था. जहांगीर को बचपन में सब उन्हें सुल्तान मुहम्मद सलीम कहकर पुकारते थे. जहांगीर के अपनी सभी पत्नियों से पांच बेटे खुसरो मिर्जा, खुर्रम मिर्जा (शाहजहां), परविज मिर्जा, शाहरियर मिर्जा, जहांदर मिर्जा और इफत बानू बेगम, बहार बानू बेगम, बेगम सुल्तान बेगम, सुल्तान-अन-निसा बेगम,दौलत-अन-निसा बेगम नाम की पुत्रियां थी.

अकबर का इकलौता वारिस होने के कारण और वैभव-विलास में पालन-पोषण की वजह से जहांगीर एक बेहद शौकीन और रंगीन मिजाज का शासक था, जिसने करीब 20 शादियां की थी, हालांकि उनकी सबसे चहेती और पसंदीदा बेगम नूर जहां थीं. वहीं उनकी कई शादियां राजनीतिक कारणों से भी हुईं थी. 16 साल की उम्र में जहांगीर की पहली शादी आमेर के राजा भगवान राज की राजकुमारी मानबाई से हुई थी. जिनसे उन्हें दो बेटों की प्राप्ति हुई थी. वहीं जहांगीर के बड़े बेटे खुसरो मिर्जा के जन्म के समय मुगल सम्राट जहांगीर ने अपनी पत्नी मानबाई को शाही बेगम की उपाधि प्रदान की थी. इसके बाद जहांगीर कई अलग-अलग राजकुमारियों से उनकी सुंदरता पर मोहित होकर शादी की. आपको बता दें साल 1586 में जहांगीर ने उदय सिंह की पुत्री जगत गोसन की सुंदरता पर मोहित होकर उनसे विवाह किया. जिनसे उन्हें दो पुत्र और दो पुत्रियां पैदा हुईं. हालांकि, इनमें से सिर्फ एक ही पुत्र खुर्रम जीवित रह सका, अन्य संतान की बचपन में ही मौत हो गई. बाद में उनका यही पुत्र सम्राट शाहजहां के रुप में मुगल सिंहासन पर बैठा और मुगल साम्राज्य का जमकर विस्तार किया, वहीं शाहजहां को लोग आज भी सात आश्चर्यों में से एक ताजमहल के निर्माण के लिए याद करते हैं.

जहाँगीर जब महज 4 साल के थे, तब सम्राट अकबर ने उनके लिए बैरम खां के पुत्र अब्दुल रहीम खान-ए-खाना जैसे विद्धान शिक्षक नियुक्त किया. जिससे जहांगीर ने इतिहास, अंकगणित, भूगोल, अरबी, फारसी, और विज्ञान की शिक्षा ग्रहण की थी, जिसकी वजह से जहांगीर अरबी और फारसी में विद्धान हो गया था. 1599 ई. तक सलीम अपनी महत्वाकांक्षा के कारण अकबर के विरुद्ध विद्रोह में संलग्न रहा. 21, अक्टूबर 1605 ई. को अकबर ने सलीम को अपनी पगड़ी एवं कटार से सुशोभित कर उत्तराधिकारी घोषित किया. अकबर की मृत्यु के आठवें दिन 3 नवम्बर, 1605 ई. को सलीम का राज्याभिषेक ‘नुरुद्दीन मुहम्मद जहाँगीर बादशाह ग़ाज़ी’ की उपाधि से आगरा के क़िले में सम्पन्न हुआ।

साल 1605 में अकबर की मृत्यु के बाद सुल्तान सलीम को मुगल ‘बादशाह’ का ताज पहनाया गया और उन्हें जहाँगीर नाम की उपाधि दी गई. वहीं जब मुगल शासक जहांगीर की उम्र 36 साल की थी, तब उन्हें मुगल साम्राज्य की जिम्मेदारी एक आदर्श शासक के रुप में संभाली और कई सालों तक मुगल सिंहासन संभाला. उन्होंने अपने शासनकाल में मुगल साम्राज्य का जमकर विस्तार किया और विजय अभियान चलाया. वहीं जो क्षेत्र उनके पिता अकबर द्धारा नहीं हासिल किए गए थे, उन्होंने सबसे पहले ऐसे निर्विवाद क्षेत्रों को जीतने के प्रयास किए. मुगल सम्राट जहांगीर ने अपना सबसे पहला सैन्य अभियान मेवाड़ के शासक अमर सिंह के खिलाफ चलाया. जिसके बाद अमर सिंह को जहांगीर के सामने आत्मसमर्पण करने के लिए मजबूर होना पड़ा और फिर दोनों शासकों के बीच साल 1615 ईसवी में शांति संधि हुई.

मेवाड़ में मुगल साम्राज्य का विस्तार करने के बाद अपना विजय अभियान चलाते हुए, जहांगीर ने दक्षिण भारत में मुगलों का आधिपत्य जमाने के मकसद से दक्षिण में फोकस करना शुरु किया. हालांकि वे इस पर अपना पूरी तरह से नियंत्रण करने में तो कामयाब नहीं हो सके, लेकिन उनके सफल प्रयासों से बीजापुर के शासक, अहमदनगर और मुगल साम्राज्य के बीच शांति समझौता किया गया, जिसके बाद कुछ किले और बालाघाट के क्षेत्र मुगलों को दे दिए गए. जबकि जहांगीर ने अपने पुत्र खुर्रम उर्फ शाहजहां के नेतृत्व में साल 1615 में उत्तरी भारत में मुगल साम्राज्य का विस्तार किया. इस दौरान उनकी सेना ने कांगड़ा के राजा को हार की धूल चटाई और अपने विजयी अभियानों को दक्करन तक आगे बढ़ाया. इस तरह मुगल साम्राज्य का विस्तार होता चला गया.

मुगल सम्राट जहांगीर चित्रकला का बेहद शौकीन था, वे अपने महल में कई अलग-अलग तरह के चित्र इकट्ठे करते रहते थे उसने अपने शासनकाल में चित्रकला को काफी बढ़ावा भी दिया था. यही नहीं जहांगीर खुद के एक बेहतरीन आर्टिस्ट थे. मनोहर और मंसूर बिशनदास जहांगीर के शासनकाल के समय के मशहूर चित्रकार थे. जहांगीर के शासनकाल को चित्रकला का स्वर्णकाल भी कहा जाता है. वहीं मुगल सम्राट जहाँगीर ने अपनी आत्मकथा में भी लिखा है कि “कोई भी चित्र चाहे वह किसी मृतक व्यक्ति या फिर जीवित व्यक्ति द्वारा बनाया गया हो, मैं देखते ही तुरंत बता सकता हुँ कि यह किस चित्रकार की कृति है.”

जहाँगीर ने न्याय व्यवस्था ठीक रखने की ओर विशेष ध्यान दिया था. न्यायाधीशों के अतिरिक्त वह स्वयं भी जनता के दु:ख-दर्द को सुनता था. उसके लिए उसने अपने निवास−स्थान से लेकर नदी के किनारे तक एक जंजीर बंधवाई थी और उसमें बहुत सी घंटियाँ लटकवा दी थीं. यदि किसी को कुछ फरियाद करनी हो, तो वह उस जंजीर को पकड़ कर खींच सकता था, ताकि उसमें बंधी हुई घंटियों की आवाज़ सुनकर बादशाह उस फरियादी को अपने पास बुला सके. यह कार्य राजा और जनता के बीच सम्बन्ध स्थापित करने के लिहाज़ से बहुत अहम था. इसे बजाने वाले नागरिको की फरियाद राजा खुद सुनते थे. यह जंजीर सोने की थी और उसके बनवाने में बड़ी लागत आई थी. उसकी लंबाई 40 गज़ की थी और उसमें 60 घंटियाँ बँधी हुई थीं. उन सबका वज़न 10 मन के लगभग था.

उससे जहाँ बादशाह के वैभव का प्रदर्शन होता था, वहाँ उसके न्याय का भी ढ़िंढोरा पिट गया था. किंतु इस बात का कोई उल्लेख नहीं मिलता है कि, किसी व्यक्ति ने उस जंजीर को हिलाकर बादशाह को कभी न्याय करने का कष्ट दिया हो. उस काल में मुस्लिम शासकों का ऐसा आंतक था कि, उस जंजीर में बँधी हुई घंटियों को बजा कर बादशाह के ऐशो−आराम में विघ्न डालने का साहस करना बड़ा कठिन था. जहाँगीर को शराब पीने की लत थी, जो अंतिम काल तक रही थी. वह उसके दुष्टपरिणाम को जानता था; किंतु उसे छोड़ने में असमर्थ था. किंतु जनता को शराब से बचाने के लिए उसने गद्दी पर बैठते ही उसे बनाने और बेचने पर पाबंदी लगा दी थी. उसने शासन सँभालते ही एक शाही फ़रमान निकाला था, जिसमें 12 आज्ञाओं को साम्राज्य भर में मानने का आदेश दिया गया था. इन आज्ञाओं में से एक शराबबंदी से संबंधित थी. उस प्रकार की आज्ञा होने पर भी वह स्वयं शराब पीता था और उसके प्राय: सभी सरदार सामंत, हाकिम और कर्मचारी भी शराब पीने के आदी थे. ऐसी स्थिति में शराबबंदी की शाही आज्ञा का कोई प्रभावकारी परिणाम निकला हो, इससे संदेह है.

जहांगीर को लिखने का काफी शौकिन था, जहांगीर द्वारा शुरू की गई किताब “तुजुक-ए-जहांगीर” नाम की आत्मकथा को मौतबिंद खान द्धारा पूरा किया गया. जहांगीर की मृत्यु 28 अक्टूबर 1627 ई. में कश्मीर से वापस आते समय रास्ते में ही भीमवार नामक स्थान पर हुई. उन्हे लाहौर के पास शहादरा में रावी नदी के किनारे दफनाया गया.

मुग़ल बादशाह शाहजहाँ

शाहजहाँ पाँचवे मुग़ल शहंशाह था. सम्राट जहाँगीर के मौत के बाद, छोटी उम्र में ही उन्हें मुगल सिंहासन के उत्तराधिकारी के रूप में चुन लिया गया था. 1627 में अपने पिता की मृत्यु होने के बाद वह गद्दी पर बैठा. शाहजहाँ का जन्म जोधपुर के शासक राजा उदयसिंह की पुत्री 'जगत गोसाई' के गर्भ से 5 जनवरी, 1592 ई. को लाहौर में हुआ था. उसका बचपन का नाम ख़ुर्रम था. ख़ुर्रम जहाँगीर का छोटा पुत्र था, जो छल−बल से अपने पिता का उत्तराधिकारी हुआ था. वह बड़ा कुशाग्र बुद्धि, साहसी और शौक़ीन बादशाह था. वह बड़ा कला प्रेमी, विशेषकर स्थापत्य कला का प्रेमी था. उसका विवाह 20 वर्ष की आयु में नूरजहाँ के भाई आसफ़ ख़ाँ की पुत्री 'आरज़ुमन्द बानो' से सन् 1612 में हुआ था. वही बाद में 'मुमताज़ महल' के नाम से उसकी प्रियतमा बेगम हुई. 20 वर्ष की आयु में ही शाहजहाँ, जहाँगीर शासन का एक शक्तिशाली स्तंभ समझा जाता था. फिर उस विवाह से उसकी शक्ति और भी बढ़ गई थी. नूरजहाँ, आसफ़ ख़ाँ और उनका पिता मिर्ज़ा गियासबेग़ जो जहाँगीर शासन के कर्त्ता-धर्त्ता थे, शाहजहाँ के विश्वसनीय समर्थक हो गये थे.

जहाँगीर के दौर में एतमाउद्दौला वज़ीर बनाए गए. इन्हीं एतमाउद्दौला के बेटे थे अबु हसन आसफ़ खान और इन्हीं अब्दुल हसन आसफ़ खान की बेटी थी अर्जुमंद (जिन्हें बाद में मुमताज का नाम मिला). बेइन्तहा खूबसूरत थी. कहते हैं शाहजहाँ ने पहली बार अर्जुमंद को आगरा के मीना बाज़ार की किसी गली में देखा था. उसकी अनहद खूबसूरती, देखकर शाहजहाँ को पहली नज़र में ही उससे प्यार हो गया. शाहजहां और अर्जुमंद की शादी में कोई दीवार नहीं थी. अप्रैल 1607 में 14 साल की अर्जुमंद और 15 साल के खुर्रम (शाहजहाँ का शुरुआती नाम) की सगाई हो गई. फिर 10 मई, 1612 को सगाई के करीब पाँच साल और तीन महीने बाद इन दोनों का निकाह हुआ. निकाह के समय शाहजहाँ की उम्र 20 बरस और तीन महीने थी. अर्जुमंद थी 19 साल और एक महीने की. जहाँगीर ने इन दोनों की शादी का ज़िक्र अपने मेमॉइर ‘तुज़ुक-ए-जहाँगीरी’ (ज्यादा प्रचलित जहांगीरनामा) में किया है.

शाहजहाँ के समय जो लिखा गया. उन सोर्सेज़ के मुताबिक अर्जुमंद काफी दयालु और उदार थी. वो मुगल साम्राज्य के प्राशासनिक कामों में भी शिरकत किया करती थीं. शाहजहाँ ने उन्हें एक राजसी मुहर भी दी थी. लोग उनके पास अपनी अर्जियाँ लेकर आते. वो विधवाओं को मुआवजे भी बाँटा करती. जब भी शाहजहाँ किसी जंग पर जाते, मुमताज साथ होतीं. मुमताज और शाहजहाँ के बीच इतनी मुहब्बत थी कि लोग कहते हैं शौहर और बीवी में ऐसा इश्क़ किसी ने देखा नहीं था. दोनों के 13 बच्चे हुए. तीसरे नंबर की औलाद था दारा शिकोह. और छठे नंबर पर पैदा हुआ था औरंगजेब. 1631 का साल था और महीना था जून. शाहजहाँ अपनी सेना के साथ बुरहानपुर में थे. जहान लोदी पर चढ़ाई थी. मुमताज भी थीं शाहजहाँ के साथ. यहीं पर करीब 30 घंटे लंबे लेबर पेन के बाद अपने 14वें बच्चे को जन्म देते हुए मुमताज की मौत हो गई. मुमताज के डॉक्टर वज़ीर खान और उनके साथ रहने वाली दासी सति-उन-निसा ने बहुत कोशिश की. लेकिन वो मुमताज को बचा नहीं पाए. आगरा में उसके शव को दफ़ना कर उसकी याद में संसार प्रसिद्ध ताजमहल का निर्माण किया गया।

मुमताज की मौत के ग़म में शाहजहाँ ने अपने पूरे साम्राज्य में शोक का ऐलान कर दिया. कहते हैं, पूरे मुगल साम्राज्य में दो साल तक मुमताज की मौत का ग़म मनाया गया था. कहते हैं कि मुमताज जब आगरा में होतीं, तो यमुना किनारे के एक बाग में अक्सर जाया करती थीं. शायद इसी वजह से शाहजहाँ ने जब मुमताज की याद में एक मास्टरपीस इमारत बनाने की सोची, तो यमुना का किनारा तय किया. 38-39 बरस की उम्र तक मुमताज तकरीबन हर साल गर्भवती रहीं. शाहजहाँनामा में मुमताज के बच्चों का ज़िक्र है. ऐसा नहीं कि बस मुमताज की मौत हुई हो. कई बच्चे भी मरे उनके. पहली बेटी तीन साल की उम्र में चल बसी. उम्मैद बख्श भी तीन साल में मर गया. सुरैया बानो सात साल में चल बसी. लुफ्त अल्लाह भी दो साल में गुजर गया. दौलत अफ्ज़ा एक बरस में और हुस्नआरा एक बरस की भी नहीं थी, जब मरी. यानी 14 में से छह नहीं रहे. पहले बच्चों में मृत्युदर बहुत ज्यादा हुआ करता था.

शाहजहाँ और मुमताज इतिहास के जिस हिस्से में हुए, वहाँ परिवार नियोजन नाम का कोई शब्द नहीं था. न ही ऐसी कोई रवायत थी. फैमिली प्लानिंग बहुत मॉडर्न कॉन्सेप्ट है. तब लोग सोचते थे, बच्चे ऊपरवाले की देन हैं. जितने होते हैं, होने दो. कम उम्र में लड़कियों की शादी हो जाती. ऐसा नहीं कि भारत में ही औरतें बच्चे पैदा करने में मरती हैं. यूरोप में भी ऐसा ही हाल था. अपनी मॉडर्न समझ के हिसाब से हमें उस समय की चीजों को जज नहीं करना चाहिए. हमारी जो ये समझ बनी है, वो अपने समय और परिस्थितियों का नतीजा है. ये बनते बनते बनी है.

शाहजहाँ ने सन् 1648 में आगरा की बजाय दिल्ली को राजधानी बनाया; किंतु उसने आगरा की कभी उपेक्षा नहीं की. उसके प्रसिद्ध निर्माण कार्य आगरा में भी थे. शाहजहाँ का दरबार सरदार सामंतों, प्रतिष्ठित व्यक्तियों तथा देश−विदेश के राजदूतों से भरा रहता था. उसमें सबके बैठने के स्थान निश्चित थे. जिन व्यक्तियों को दरबार में बैठने का सौभाग्य प्राप्त था, वे अपने को धन्य मानते थे और लोगों की दृष्टि में उन्हें गौरवान्वित समझा जाता था. जिन विदेशी सज्ज्नों को दरबार में जाने का सुयोग प्राप्त हुआ था, वे वहाँ के रंग−ढंग, शान−शौक़त और ठाट−बाट को देख कर आश्चर्य किया करते थे. तख्त-ए-ताऊस शाहजहाँ के बैठने का राजसिंहासन था.

शाहजहाँ की प्रारम्भिक सफलता के रूप में 1614 ई. में उसके नेतृत्व में मेवाड़ विजय को माना जाता है. 1616 ई. में शाहजहाँ द्वारा दक्षिण के अभियान में सफलता प्राप्त करने पर उसे 1617 ई. में जहाँगीर ने ‘शाहजहाँ’ की उपाधि प्रदान की थी.

नूरजहाँ के रुख़ को अपने प्रतिकूल जानकर शाहजहाँ ने 1622 ई. में विद्रोह कर दिया, जिसमें वह पूर्णतः असफल रहा. 1627 ई. में जहाँगीर की मृत्यु के उपरान्त शाहजहाँ ने अपने ससुर आसफ़ ख़ाँ को यह निर्देश दिया, कि वह शाही परिवार के उन समस्त लोगों को समाप्त कर दें, जो राज सिंहासन के दावेदार हैं. जहाँगीर की मृत्यु के बाद शाहजहाँ दक्षिण में था. अतः उसके श्वसुर आसफ़ ख़ाँ ने शाहजहाँ के आने तक ख़ुसरों के लड़के दाबर बख़्श को गद्दी पर बैठाया. शाहजहाँ के वापस आने पर दाबर बख़्श का क़त्ल कर दिया गया. इस प्रकार दाबर बख़्श को बलि का बकरा कहा जाता है. आसफ़ ख़ाँ ने शहरयार, दाबर बख़्श, गुरुसस्प (ख़ुसरों का लड़का), होशंकर (शहज़ादा दानियाल के लड़के) आदि का क़त्ल कर दिया. 24 फ़रवरी, 1628 ई. को शाहजहाँ का राज्याभिषेक आगरा में ‘अबुल मुजफ्फर शहाबुद्दीन, मुहम्मद साहिब किरन-ए-सानी' की उपाधि के साथ किया गया. विश्वासपात्र आसफ़ ख़ाँ को 7000 जात, 7000 सवार एवं राज्य के वज़ीर का पद प्रदान किया. महावत ख़ाँ को 7000 जात 7000 सवार के साथ ‘ख़ानख़ाना’ की उपाधि प्रदान की गई. नूरजहाँ को दो लाख रु. प्रति वर्ष की पेंशन देकर लाहौर जाने दिया गया, जहाँ 1645 ई. में उसकी मृत्यु हो गई.

लगभग सभी मुग़ल शासकों के शासनकाल में विद्रोह हुए थे. शाहजहाँ का शासनकाल भी इन विद्रोहों से अछूता नहीं रहा. उसके समय के निम्नलिखित विद्रोह प्रमुख थे-
बुन्देलखण्ड का विद्रोह (1628-1636ई.): वीरसिंह बुन्देला के पुत्र जुझार सिंह ने प्रजा पर कड़ाई कर बहुत-सा धन एकत्र कर लिया था. एकत्र धन की जाँच न करवाने के कारण शाहजहाँ ने उसके ऊपर 1628 ई. में आक्रमण कर दिया. 1629 ई. में जुझार सिंह ने शाहजहाँ के सामने आत्मसमर्पण कर माफी माँग ली. लगभग 5 वर्ष की मुग़ल वफादरी के बाद जुझार सिंह ने गोंडवाना पर आक्रमण कर वहाँ के शासक प्रेम नारायण की राजधानी ‘चौरागढ़’ पर अधिकार कर लिया. औरंगज़ेब के नेतृत्व में एक विशाल मुग़ल सेना ने जुझार सिंह को परास्त कर भगतसिंह के लड़के देवीसिंह को ओरछा का शासक बना दिया. इस तरह यह विद्रोह 1635 ई. में समाप्त हो गया. चम्पतराय एवं छत्रसाल जैसे महोबा शासकों ने बुन्देलों के संघर्ष को जारी रखा.

ख़ानेजहाँ लोदी का विद्रोह (1628-1631 ई.): पीर ख़ाँ ऊर्फ ख़ानेजहाँ लोदी एक अफ़ग़ान सरदार था. इसे शाहजहाँ के समय में मालवा की सूबेदारी मिली थी. 1629 ई. में मुग़ल दरबार में सम्मान न मिलने के कारण अपने को असुरक्षित महसूस कर ख़ानेजहाँ अहमदनगर के शासक मुर्तजा निज़ामशाह के दरबार में पहुँचा. निज़ामशाह ने उसे ‘बीर’ की जागीरदारी इस शर्त पर प्रदान की, कि वह मुग़लों के क़ब्ज़े से अहमदनगर के क्षेत्र को वापस कर दें. 1629 ई. में शाहजहाँ के दक्षिण पहुँच जाने पर ख़ानेजहाँ को दक्षिण में कोई सहायता न मिल सकी, अतः निराश होकर उसे उत्तर-पश्चिम की ओर भागना पड़ा. अन्त में बाँदा ज़िले के ‘सिंहोदा’ नामक स्थान पर ‘माधोसिंह’ द्वारा उसकी हत्या कर दी गई. इस तरह 1631 ई. तक ख़ानेजहाँ का विद्रोह समाप्त हो गया.

पुर्तग़ालियों के बढ़ते प्रभाव को समाप्त करने के उद्देश्य से शाहजहाँ ने 1632 ई. में उनके महत्त्वपूर्ण व्यापारिक केन्द्र ‘हुगली’ पर अधिकार कर लिया. शाहजहाँ के समय में (1630-32) दक्कन एवं गुजरात में भीषण दुर्भिक्ष (अकाल) पड़ा, जिसकी भयंकरता का उल्लेख अंग्रेज़ व्यापारी 'पीटर मुंडी' ने किया है. शाहजहाँ के शासन काल में ही सिक्ख पंथ के छठें गुरु हरगोविंद सिंह से मुग़लों का संघर्ष हुआ, जिसमें सिक्खों की हार हुई. जहाँगीर के राज्य काल में मुग़लों के आक्रमण से अहमदनगर की रक्षा करने वाले मलिक अम्बर की मृत्यु के उपरान्त सुल्तान एवं मलिक अम्बर के पुत्र फ़तह ख़ाँ के बीच आन्तरिक कलह के कारण शाहजहाँ के समय महावत ख़ाँ को दक्कन एवं दौलताबाद प्राप्त करने में सफलता मिली. 1633 ई. में अहमदनगर का मुग़ल साम्राज्य में विलय किया गया और नाममात्र के शासक हुसैनशाह को ग्वालियर के क़िले में कारावास में डाल दिया गया. इस प्रकार निज़ामशाही वंश का अन्त हुआ, यद्यपि शिवाजी के पिता शाहजी भोंसले ने 1635 ई. में मुर्तजा तृतीय को निज़ामशाही वंश का शासक घोषित कर संघर्ष किया, किन्तु सफलता हाथ न लगी. चूंकि शाहजी की सहायता अप्रत्यक्ष रूप से गोलकुण्डा एवं बीजापुर के शासकों ने की थी, इसलिए शाहजहाँ इनको दण्ड देने के उद्देश्य से दौलताबाद पहुँचा. गोलकुण्डा के शासक ‘अब्दुल्लाशाह’ ने डर कर शाहजहाँ से संधि कर ली और बादशाह को 6 लाख रुपयें का वार्षिक कर देने को तैयार हुआ.

बीजापुर के शासक आदिलशाह द्वारा सरलता से अधीनता न स्वीकार करने पर शाहजहाँ ने उसके ऊपर तीन ओर से आक्रमण किया. बचाव का कोई भी मार्ग न पाकर आदिलशाह ने 1636 ई. में शाहजहाँ की शर्तों को स्वीकार करते हुए संधि कर ली. संधि की शर्तों में बादशाह को वार्षिक कर देना, गोलकुण्डा को परेशान न करना, शाहजी भोंसले की सहायता न करना आदि शामिल था. इस तरह बादशाह शाहजहाँ 11 जुलाई, 1636 ई. को औरंगज़ेब को दक्षिण का राजप्रतिनिधि नियुक्त कर वापस आ गया.

शाहजहाँ ने मध्य एशिया को विजित करने के लिए 1645 ई. में शाहज़ादा मुराद एवं 1647 ई. में शाहज़ादा औरंगज़ेब को भेजा, पर उसे सफलता न प्राप्त हो सकी. कंधार मुग़लों एवं फ़ारसियों के मध्य लम्बे समय तक संघर्ष का कारण बना रहा. 1628 ई. में कंधार का क़िला वहाँ के क़िलेदार अली मर्दान ख़ाँ ने मुग़लों को दे दिया. 1648 ई. में इसे पुनः फ़ारसियों ने अधिकार में कर लिया. 1649 ई. एवं 1652 ई. में कंधार को जीतने के लिए दो सैन्य अभियान किए गए, परन्तु दोनों में असफलता हाथ लगी. 1653 ई. में दारा शिकोह द्वारा कंधार जीतने की कोशिश नाकाम रही. इस प्रकार शाहजहाँ के शासन काल में कंधार ने मुग़ल अधिपत्य को नहीं स्वीकारा.

सन 1657 में शाहजहाँ बहुत बीमार हो गया था. उस समय उसने दारा को अपना विधिवत उत्तराधिकारी घोषित कर दिया था. दारा भी राजधानी में रह कर अपने पिता की सेवा−सुश्रुषा और शासन की देखभाल करने लगा. शाहजहाँ के बीमार पड़ने पर उसके चारों पुत्र दारा शिकोह, शाहशुजा, औरंगज़ेब एवं मुराद बख़्श में उत्तराधिकार के लिए संघर्ष प्रारम्भ हो गया. शाहजहाँ की मुमताज़ बेगम द्वारा उत्पन्न 14 सन्तानों में 7 जीवित थीं, जिनमें 4 लड़के तथा 3 लड़कियाँ - जहान आरा, रौशन आरा एवं गोहन आरा थीं. जहान आरा ने दारा का, रोशन आरा ने औरंगज़ेब का एवं गोहन आरा ने मुराद का समर्थन किया. शाहजहाँ के चारों पुत्रों में दारा सर्वाधिक उदार, शिक्षित एवं सभ्य था. शाहजहाँ ने दारा को अपना उत्तराधिकारी घोषित किया और उसे 'शाहबुलन्द इक़बाल' की उपाधि दी. उत्तराधिकारी की घोषणा से ही ‘उत्तराधिकार का युद्ध’ प्रारम्भ हुआ. युद्धों की इस श्रंखला का प्रथम युद्ध शाहशुजा एवं दारा के लड़के सुलेमान शिकोह तथा आमेर के राजा जयसिंह के मध्य 24 फ़रवरी, 1658 ई. को बहादुरपुर में हुआ, इस संघर्ष में शाहशुजा पराजित हुआ. दूसरा युद्ध औरंगज़ेब एवं मुराद बख़्श तथा दारा की सेना, जिसका नेतृत्व महाराज जसवन्त सिंह एवं कासिम ख़ाँ कर रहे थे, के मध्य 25 अप्रैल, 1658 ई. को ‘धरमट’ नामक स्थान पर हुआ, इसमें दारा की पराजय हुई. औरंगज़ेब ने इस विजय की स्मृति में ‘फ़तेहाबाद’ नामक नगर की स्थापना की. तीसरा युद्ध दारा एवं औरंगज़ेब के मध्य 8 जून, 1658 ई. को ‘सामूगढ़’ में हुआ. इसमें भी दारा को पराजय का सामना करना पड़ा. 5 जनवरी, 1659 को उत्तराधिकार का एक और युद्ध खजुवा नामक स्थान पर लड़ा गया, जिसमें जसवंत सिंह की भूमिका औरंगज़ेब के विरुद्ध थी, किन्तु औरंगज़ेब सफल हुआ.

शाहजहाँ 8 वर्ष तक आगरा के क़िले के शाहबुर्ज में क़ैद रहा. उसका अंतिम समय बड़े दु:ख और मानसिक क्लेश में बीता था. उस समय उसकी प्रिय पुत्री जहाँआरा उसकी सेवा के लिए साथ रही थी. शाहजहाँ ने उन वर्षों को अपने वैभवपूर्ण जीवन का स्मरण करते और ताजमहल को अश्रुपूरित नेत्रों से देखते हुए बिताये थे. जनवरी सन् 1666 में उसका देहांत हो गया. उस समय उसकी आयु 74 वर्ष की थी.उसे उसकी प्रिय बेगम के पार्श्व में ताजमहल में ही दफ़नाया गया था.

मुगल बादशाह औरंगजेब

औरंगजेब भारत देश के एक महान मुग़ल शासक थे, जिन्होंने भारत में कई वर्षो तक राज्य किया. वे छठे नंबर के मुग़ल शासक थे, जिन्होंने भारत में शासन किया. औरंगजेब ने 1658 से 1707 लगभग 49 साल तक शासन किया, अकबर के बाद यही मुग़ल थे, जो इतने लम्बे समय तक राजा की गद्दी पर विराजमान रहे. इनकी मौत के बाद मुग़ल एम्पायर पूरी तरह हिल गया था, और धीरे धीरे ख़त्म होने लगा था. औरंगजेब ने अपने पूर्वज के काम को बखूबी से आगे बढाया था, अकबर ने जिस तरह मेहनत व लगन से मुग़ल सामराज्य को खड़ा किया था, औरंगजेब ने भारत में मुगलों का साम्राज्य और बढ़ाया था लेकिन औरंगजेब को उसकी प्रजा ज्यादा पसंद नहीं करती थी, इसकी वजह थी उसका व्यवहार. औरंगजेब कट्टरपंथी, पक्के मुसलमान और कठोर किस्म के राजा था.

औरंगजेब ने अपने नाम के आगे आलमगीर स्वयं लगाया था, जिसका अर्थ था विश्व विजेता. औरंगजेब की 4 बेटियां भी थी. औरंगजेब 6 भाई बहन थे, जिसमें से वे शाहजहाँ के तीसरे नंबर के पुत्र थे. औरंगजेब बाबर के खानदान के थे, जिन्हें मुग़ल साम्राज्य का संस्थापक माना जाता है. औरंगजेब के जन्म के समय उनके पिता शाहजहाँ गुजरात के गवर्नर थे. महज 9 साल की उम्र में ही औरंगजेब को उनके दादा जहांगीर द्वारा लाहोर में बंधक बना लिया गया था, इसकी वजह उनके पिता का एक युद्ध में असफल होना था. 2 साल बाद 1628 में जब शाहजहाँ आगरा के राजा घोषित किये गए, तब औरंगजेब व उनके बड़े भाई दारा शिकोह वापस अपने माता पिता के साथ रहने लगे. एक बार 1633 में आगरा में कुछ जंगली हाथियों ने हमला बोल दिया, जिससे प्रजा में भगदड़ मच गई, औरंगजेब ने बड़ी बहादुरी से अपनी जान को जोखिम में डाल, इन हाथियों से मुकाबला किया और इन्हें एक कोठरी में बंद किया. यह देख उनके पिता बहुत खुश हुए और उन्हें सोने से तोला और बहादुर की उपाधि दी.

अपनी सूझ बूझ से औरंगजेब अपने पिता के चहेते बन गए थे, महज 18 साल की उम्र में उन्हें 1636 में दक्कन का सूबेदार बनाया गया. 1637 में औरंगजेब ने सफविद की राजकुमारी दिलरास बानू बेगम से निकाह किया, ये औरंगजेब की पहली पत्नी थी. 1644 में औरंगजेब की एक बहन की अचानक म्रत्यु हो गई, इतनी बड़ी बात होने के बावजूद औरंगजेब तुरंत अपने घर आगरा नहीं गए, वे कई हफ्तों बाद घर गए. यह वजह पारिवारिक विवाद का बहुत बड़ा कारण बनी, इस बात से आघात शाहजहाँ ने औरंगजेब को दक्कन के सुबेदारी के पद से हटा दिया, साथ ही उनके सारे राज्य अधिकार छीन लिए गए, उनको दरबार में आने की मनाही थी. शाहजहाँ का गुस्सा शांत होने पर उन्होंने 1645 में औरंगजेब को गुजरात का सूबेदार बना दिया, ये मुग़ल साम्राज्य का सबसे अमीर प्रान्त था. औरंगजेब ने यहाँ अच्छा काम किया, जिसके चलते उन्हें अफगानिस्तान का भी गवर्नर बना दिया गया था.

1653 में औरंगजेब एक बार फिर दक्कन के सूबेदार बने, इन्होंने अकबर द्वारा बनाये गए राजस्व नियम को दक्षिण में भी लागु कर दिया. इस समय औरंगजेब के बड़े भाई दारा शुकोह अपने पिता शाहजहाँ के चहिते थे, वे उनके मुख्य सलाहकार थे. दोनों की सोच बहुत विपरीत थी, जिस वजह से दोनों के बीच बहुत मतभेद होते थे और सत्ता को लेकर लड़ाई होती रहती थी. 1657 में शाहजहाँ बहुत बीमार पड़ गए, जिसके चलते तीनों भाइयों में सत्ता को लेकर जंग छिड गई, तीनों में औरंगजेब सबसे अधिक बलवान थे, उन्होंने अपने पिता शाहजहाँ को बंदी बना लिया व भाइयों को फांसी दे दी. इसके बाद औरंगजेब ने अपना राज्य अभिषेक खुद ही करवाया. इन्ही सब कार्यो के चलते मुग़ल साम्राज्य की थू थू होती थी और प्रजा भी इनसे नफरत करती थी. औरंगजेब ने अपने पिता को भी मारने की कोशिश की थी, लेकिन कुछ वफादारों के चलते वे ऐसा नहीं कर पाए.

औरंगजेब पुरे भारत को मुस्लिम देश बना देना चाहते थे, उन्होंने हिन्दू पर बहुत जुल्म किये व हिन्दू त्योहारों को मनाना पूरी तरह से बंद कर दिया. औरंगजेब ने गैर मुस्लिम समुदाय के लोंगो पर अतिरिक्त कर भी लगाया था, वे काश्मीर के लोगों पर मुस्लिम धर्म मानने के लिए जोर भी डालते थे. जब सिख गुरु तेगबहादुर ने कश्मीरी लोगों के साथ खड़े होकर इस बात का विरोध किया, तो औरंगजेब ने उन्हें फांसी दे दी. औरंगजेब ने बहुत से मंदिर तोड़े व उसकी जगह मस्जिद बनवा दिए. औरंगजेब ने सती प्रथा को एक बार फिर से शुरू करवा दिया था, औरंगजेब के राज्य में मांस खाना, शराब पीना, वेश्यावृत्ति जैसे कार्य बढ़ते गए. हिन्दुओं को मुग़ल साम्राज्य में कोई भी काम नहीं दिया जाता था.

औरंगजेब के बढ़ते अत्याचार को देखते हुए 1660 में मराठा ने औरंगजेब के खिलाफ विद्रोह कर दिया, इसके बाद 1669 में जाट ने, 1672 में सतनामी, 1675 में सिख व 1679 ने राजपूत ने औरंगजेब के खिलाफ आवाज उठाई. 1686 में अंग्रेजो की ईस्ट इंडिया कंपनी ने भी औरंगजेब के खिलाफ विद्रोह किया. औरंगजेब ने इनमें से बहुत सी लड़ाई तो जीती, लेकिन जीत हमेशा एक के साथ नहीं रहती, एक के बाद एक लगातार विद्रोह से मुग़ल साम्राज्य हिल गया और उसकी एकता टूटने लगी. औरंगजेब की कड़ी तपस्या भी काम नहीं आई. साम्राज्य से कला, नाच संगीत दूर होते चला गया, ना यहाँ बड़ो की इज्जत होती, ना औरतों का सम्मान किया जाता. पूरा साम्राज्य इस्लाम की रूढ़िवादी बातों के तले दबता चला गया.

औरंगजेब के पुरे शासनकाल में वह हमेशा युद्ध चढाई करने में ही व्यस्त रहा, कट्टर मुस्लिम होने की वजह से हिन्दू राजा इनके बहुत बड़े दुश्मन थे. शिवाजी इनकी दुश्मन की सूची में प्रथम स्थान में थे. औरंगजेब ने शिवाजी को बंदी भी बनाया था, लेकिन वे उनकी कैद से भाग निकले थे. अपनी सेना के साथ मिलकर शिवाजी ने औरंगजेब से युद्ध किया और औरंगजेब को हरा दिया. इस तरह मुगलों का शासन ख़त्म होने लगा और मराठा ने अपना शासन बढ़ा दिया.

90 साल की उम्र में औरंगजेब ने 3 मार्च 1707 में अपने प्राण त्याग दिए, दौलताबाद में औरंगजेब को दफनाया गया. 50 साल के शासन में औरंगजेब ने अपने इतने विद्रोही बढ़ा लिए थे कि उसके मरते ही मुग़ल सामराज्य का अंत हो गया. उनके पूर्वज बाबर मुग़ल साम्राज्य के संस्थापक माने जाते है व औरंगजेब इस साम्राज्य के अंत का कारण बने. औरंगजेब ने ही दिल्ली के लाल किले में मोती मस्जिद बनवाई थी.

भारत के महान वीर हिन्दू हृदय साम्राट शिवाजी महाराज जिन्होंने मुगलो को उसकी औकात दिखा दिया

भारत के वीर सपूतों में से एक श्रीमंत छत्रपति शिवाजी महाराज के बारे में सभी लोग जानते हैं. बहुत से लोग इन्हें हिन्दू हृदय सम्राट कहते हैं तो कुछ लोग इन्हें मराठा गौरव कहते हैं, जबकि वे भारतीय गणराज्य के महानायक थे. छत्रपति शिवाजी महाराज का जन्म सन्‌ 19 फरवरी 1630 में मराठा परिवार में हुआ. उनका पूरा नाम शिवाजी भोंसले था. शिवाजी शाहजी और माता जीजाबाई के पुत्र थे. उनका जन्म स्थान पुणे के पास स्थित शिवनेरी का दुर्ग है. बचपन में शिवाजी अपनी आयु के बालक इकट्ठे कर उनके नेता बनकर युद्ध करने और किले जीतने का खेल खेला करते थे. युवावस्था में आते ही उनका खेल वास्तविक कर्म शत्रु बनकर शत्रुओं पर आक्रमण कर उनके किले आदि भी जीतने लगे। जैसे ही शिवाजी ने पुरंदर और तोरण जैसे किलों पर अपना अधिकार जमाया, वैसे ही उनके नाम और कर्म की सारे दक्षिण में धूम मच गई, यह खबर आग की तरह आगरा और दिल्ली तक जा पहुंची. अत्याचारी किस्म के तुर्क, यवन और उनके सहायक सभी शासक उनका नाम सुनकर ही मारे डर के चिंतित होने लगे थे.

छत्रपति शिवाजी महाराज का विवाह सन् 14 मई 1640 में सइबाई निम्बालकर के साथ लाल महल, पुना में हुआ था. उनके पुत्र का नाम सम्भाजी था. 1674 की ग्रीष्म ऋतु में शिवाजी ने धूमधाम से सिंहासन पर बैठकर स्वतंत्र प्रभुसत्ता की नींव रखी. दबी-कुचली हिन्दू जनता को उन्होंने भयमुक्त किया. हालांकि ईसाई और मुस्लिम शासक बल प्रयोग के जरिए बहुसंख्य जनता पर अपना मत थोपते, अतिरिक्त कर लेते थे, जबकि शिवाजी के शासन में इन दोनों संप्रदायों के आराधना स्थलों की रक्षा ही नहीं की गई बल्कि धर्मान्तरित हो चुके मुसलमानों और ईसाईयों के लिए भयमुक्त माहौल भी तैयार किया. शिवाजी ने अपने आठ मंत्रियों की परिषद के जरिए उन्होंने छह वर्ष तक शासन किया. उनकी प्रशासनिक सेवा में कई मुसलमान भी शामिल थे.

शिवाजी के बढ़ते प्रताप से आतंकित बीजापुर के शासक आदिलशाह जब शिवाजी को बंदी न बना सके तो उन्होंने शिवाजी के पिता शाहजी को गिरफ्तार किया. पता चलने पर शिवाजी आगबबूला हो गए. उन्होंने नीति और साहस का सहारा लेकर छापामारी कर जल्द ही अपने पिता को इस कैद से आजाद कराया. तब बीजापुर के शासक ने शिवाजी को जीवित अथवा मुर्दा पकड़ लाने का आदेश देकर अपने मक्कार सेनापति अफजल खां को भेजा. उसने भाईचारे व सुलह का झूठा नाटक रचकर शिवाजी को अपनी बांहों के घेरे में लेकर मारना चाहा, पर समझदार शिवाजी के हाथ में छिपे बघनखे का शिकार होकर वह स्वयं मारा गया. इससे उसकी सेनाएं अपने सेनापति को मरा पाकर वहां से दुम दबाकर भाग गईं.

शिवाजी की बढ़ती हुई शक्ति से चिंतित हो कर मुगल बादशाह औरंगजेब ने दक्षिण में नियुक्त अपने सूबेदार को उन पर चढ़ाई करने का आदेश दिया. लेकिन सुबेदार को मुंह की खानी पड़ी. शिवाजी से लड़ाई के दौरान उसने अपना पुत्र खो दिया और खुद उसकी अंगुलियां कट गई. उसे मैदान छोड़कर भागना पड़ा. इस घटना के बाद औरंगजेब ने अपने सबसे प्रभावशाली सेनापति मिर्जा राजा जयसिंह के नेतृत्व में लगभग 1,00,000 सैनिकों की फौज भेजी.

शिवाजी को कुचलने के लिए राजा जयसिंह ने बीजापुर के सुल्तान से संधि कर पुरन्दर के क़िले को अधिकार में करने की अपने योजना के प्रथम चरण में 24 अप्रैल, 1665 ई. को 'व्रजगढ़' के किले पर अधिकार कर लिया. पुरन्दर के किले की रक्षा करते हुए शिवाजी का अत्यन्त वीर सेनानायक 'मुरार जी बाजी' मारा गया. पुरन्दर के क़िले को बचा पाने में अपने को असमर्थ जानकर शिवाजी ने महाराजा जयसिंह से संधि की पेशकश की. दोनों नेता संधि की शर्तों पर सहमत हो गए और 22 जून, 1665 ई. को 'पुरन्दर की सन्धि' सम्पन्न हुई.

अपनी सुरक्षा का पूर्ण आश्वासन प्राप्त कर छत्रपति शिवाजी आगरा के दरबार में औरंगजेब से मिलने के लिए तैयार हो गए. वह 9 मई, 1666 ई को अपने पुत्र शम्भाजी एवं 4000 मराठा सैनिकों के साथ मुगल दरबार में उपस्थित हुए, परन्तु औरंगजेब द्वारा उचित सम्मान न प्राप्त करने पर शिवाजी ने भरे हुए दरबार में औरंगजेब को 'विश्वासघाती' कहा, जिसके परिणमस्वरूप औरंगजेब ने शिवाजी एवं उनके पुत्र को 'जयपुर भवन' में कैद कर दिया. वहां से शिवाजी 13 अगस्त, 1666 ई को फलों की टोकरी में छिपकर फरार हो गए और 22 सितम्बर, 1666 ई. को रायगढ़ पहुंचे. लंबी बीमारी के चलते 1680 में वीर छत्रपति शिवाजी ने दम तोड़ दिया और उनके साम्राज्य को उनके बेटे संभाजी ने संभाल लिया.

मुग़ल बादशाह बहादुरशाह प्रथम

बहादुर शाह प्रथम का जन्म 14 अक्तूबर, सन् 1643 ई. में बुरहानपुर, भारत में हुआ था. बहादुर शाह प्रथम दिल्ली का सातवाँ मुग़ल बादशाह (1707-1712 ई.) था. 'शहज़ादा मुअज्ज़म' कहलाने वाले बहादुरशाह, बादशाह औरंगज़ेब का दूसरा पुत्र था. अपने पिता के भाई और प्रतिद्वंद्वी शाहशुजा के साथ बड़े भाई के मिल जाने के बाद शहज़ादा मुअज्ज़म ही औरंगज़ेब के संभावी उत्तराधिकारी बना. बहादुर शाह प्रथम को 'शाहआलम प्रथम' या 'आलमशाह प्रथम' के नाम से भी जाना जाता है.

बहादुर शाह प्रथम को सन् 1663 ई. में दक्षिण के दक्कन पठार क्षेत्र और मध्य भारत में पिता का प्रतिनिधि बनाकर भेजा गया. सन1683-1684 ई. में उन्होंने दक्षिण बंबई (वर्तमान मुंबई) गोवा के पुर्तग़ाली इलाक़ों में मराठों के ख़िलाफ़ सेना का नेतृत्व किया, लेकिन पुर्तग़ालियों की सहायता न मिलने की स्थिति में उन्हें पीछे हटना पड़ा. आठ वर्ष तक तंग किए जाने के बाद उन्हें उनके पिता ने 1699 में क़ाबुल (वर्तमान अफ़ग़ानिस्तान) का सूबेदार नियुक्त किया.

औरंगज़ेब की मृत्यु के बाद उसके 63 वर्षीय पुत्र 'मुअज्ज़म' (शाहआलम प्रथम) ने लाहौर के उत्तर में स्थित 'शाहदौला' नामक पुल पर मई, 1707 में 'बहादुर शाह' के नाम से अपने को सम्राट घोषित किया. बूँदी के 'बुधसिंह हाड़ा' तथा 'अम्बर' के विजय कछवाहा को उसने पहले से ही अपने ओर आकर्षित कर लिया था. उनके माध्यम से उसे बड़ी संख्या में राजपूतों का समर्थन प्राप्त हो गया. उत्तराधिकार को लेकर बहादुरशाह प्रथम एवं आजमशाह में सामूगढ़ के समीप 'जाजऊ' नामक स्थान पर 12 जून, 1707 को युद्ध हुआ, जिसमें आजमशाह तथा उसके दो बेटे 'बीदर बख़्त' तथा 'वलाजाह' मारे गये. बहादुरशाह प्रथम को अपने छोटे भाई 'कामबख़्श' से भी मुग़ल सिंहासन के लिए लड़ाई लड़नी पड़ी. कामबख़्श ने 13 जनवरी, 1709 को हैदराबाद के नजदीक बहादुशाह प्रथम के विरुद्ध युद्ध किया. युद्ध में पराजित होने के उपरान्त कामबख़्श की मृत्यु हो गई.

अपनी विजय के बाद बहादुर शाह प्रथम ने अपने समर्थकों को नई पदवियाँ तथा ऊचें दर्जे प्रदान किए. मुनीम ख़ाँ को वज़ीर नियुक्त किया गया. औरंगज़ेब के वज़ीर, असद ख़ाँ को 'वकील-ए-मुतलक़' का पद दिया था, तथा उसके बेटे ज़ुल्फ़िक़ार ख़ाँ को मीर बख़्शी बनाया गया. बहादुरशाह प्रथम गद्दी पर बैठने वाला सबसे वृद्ध मुग़ल शासक था. जब वह गद्दी पर बैठा, तो उस समय उसकी उम्र 63 वर्ष थी. वह अत्यन्त उदार, आलसी तथा उदासीन व्यक्ति था. इतिहासकार ख़फ़ी ख़ाँ ने कहा है कि, बादशाह राजकीय कार्यों में इतना अधिक लापरवाह था, कि लोग उसे "शाहे बेख़बर" कहने लगे थे. बहादुर शाह प्रथम के शासन काल में दरबार में षड्यन्त्र बढ़ने लगा. बहादु शाह प्रथम शिया था, और उस कारण दरबार में दो दल विकसित हो गए थे-(1.) ईरानी दल (2.) तुरानी दल. ईरानी दल 'शिया मत' को मानने वाले थे, जिसमें असद ख़ाँ तथा उसके बेटे जुल्फिकार ख़ाँ जैसे सरदार थे. तुरानी दल 'सुन्नी मत' के समर्थक थे, जिसमें 'चिनकिलिच ख़ाँ तथा फ़िरोज़ ग़ाज़ीउद्दीन जंग जैसे लोग थे.

बहादुर शाह प्रथम ने उत्तराधिकार के युद्ध के समाप्त होने के बाद सर्वप्रथम राजपूताना की ओर रुख़ किया. उसने मारवाड़ के राजा अजीत सिंह को पराजित कर, उसे 3500 का मनसब एवं महाराज की उपाधि प्रदान की, परन्तु बहादुर शाह प्रथम के दक्षिण जाने पर अजीत सिंह, दुर्गादास एवं जयसिंह कछवाहा ने मेवाड़ के महाराज अमरजीत सिंह के नेतृत्व में अपने को स्वतंत्र घोषित कर लिया और राजपूताना संघ का गठन किया. बहादुर शाह प्रथम ने इन राजाओं से संघर्ष करने से बेहतर सन्धि करना उचित समझा और उसने इन शासकों को मान्यता दे दी.

8 जून 1707 ई. आगरा के पास जांजू के पास लड़ाई लड़ी गई, जिसमें बहादुरशाह की जीत हुई. इस लड़ाई में गुरु गोविन्द सिंह की हमदर्दी अपने पुराने मित्र बहादुरशाह के साथ थी. कहा जाता है कि गुरु जी ने अपने सैनिकों द्वारा जांजू की लड़ाई में बहादुरशाह का साथ दिया, उनकी मदद की. इससे बादशाह बहादुरशाह की जीत हुई. बादशाह ने गुरु गोविन्द सिंह जी को आगरा बुलाया. उसने एक बड़ी क़ीमती सिरोपायो (सम्मान के वस्त्र) एक धुकधुकी (गर्दन का गहना) जिसकी क़ीमत 60 हज़ार रुपये थी, गुरुजी को भेंट की. मुग़लों के साथ एक युग पुराने मतभेद समाप्त होने की सम्भावना थी. गुरु साहब की तरफ से 2 अक्टूबर 1707 ई. और धौलपुर की संगत तरफ लिखे हुक्मनामा के कुछ शब्दों से लगता है कि गुरुजी की बादशाह बहादुरशाह के साथ मित्रतापूर्वक बातचीत हो सकती थी. जिसके खत्म होने से गुरु जी आनंदपुर साहिब वापस आ जांएगे, जहाँ उनको आस थी कि खालसा लौट के इकट्ठा हो सकेगा. पर हालात के चक्कर में उनको दक्षिण दिशा में पहुँचा दिया जहाँ अभी बातचीत ही चल रही थी.

बादशाह बहादुरशाह कछवाहा राजपूतों के विरुद्ध कार्यवाही करने कूच किया था कि उसके भाई कामबख़्श ने बग़ावत कर दी. बग़ावत दबाने के लिए बादशाह दक्षिण की तरफ़ चला और विनती करके गुरु जी को भी साथ ले गया. नांदेड़ में 1708 ई. में गुरु गोविन्द सिंह की हत्या के बाद सिक्खों ने बन्दा सिंह के नेतृत्व में मुग़लों के विरुद्ध विद्रोह कर दिया. उसने मुसलमानों के विरुद्ध लड़ने के लिए पंजाब के विभिन्न हिस्सों में सिक्खों को इकट्ठा किया तथा कैथल, समाना, शाहबाद, अम्बाला, क्यूरी तथा सधौरा पर क़ब्ज़ा कर लिया. उसकी सबसे बड़ी विजय सरहिन्द के गर्वनर नजीर ख़ाँ के विरुद्ध थी, जिसे उसने हराकर मार डाला. उसके बारे में कहा जाता है कि, उसको गुरु गोबिंद सिंह जी का आशीर्वाद प्राप्त था. उसने स्वयं को 'सच्चा बादशाह' घोषित किया, अपने टकसाल चलायीं और एक स्वतंत्र सिक्ख राज्य की स्थापना का प्रयत्न किया. बन्दा ने सरहिन्द, सोनीपत, सधौरा, एवं उत्तर प्रदेश के कई स्थानों पर लुटेरों के साथ खूब लूटपाट की. बहादुर शाह प्रथम ने सिख नेता बन्दा को दण्ड देने के लिए 26 जून, 1710 को सधौरा में घेरा डाला. यहाँ से बन्दा लोहागढ़ के क़िले में आ गया. बहादुरशाह ने लोहगढ़ को घेरकर सिखों से कड़ा संघर्ष किया. 1711 ई.में मुग़लों ने पुनः सरहिन्द पर अधिकर कर लिया. लोहगढ़ का क़िला गुरु गोविन्द सिंह ने अम्बाला के उत्तर-पूर्व में हिमालय की तराई में बनाया था. बहादुर शाह प्रथम ने बुन्देला सरदार 'छत्रसाल' से मेल-मिलाप कर लिया. छत्रसाल एक निष्ठावान सामन्त बना रहा. बादशाह ने जाट सरदार चूड़ामन से भी दोस्ती कर ली. चूड़ामन ने बन्दा बहादुर के ख़िलाफ़ अभियान में बादशाह का साथ दिया.

बहादुर शाह प्रथम को 'शाहे बेख़बर' कहा जाता था. राजपूतों की भांति मराठों के प्रति भी बहादुर शाह प्रथम की नीति अस्थिर रही. बहादुर शाह प्रथम की क़ैद से मुक्त शाहू ने आरंभ में तो मुग़ल आधिपत्य स्वीकार कर लिया, परन्तु जब बहादुर शाह प्रथम ने उसके 'चौथ' और 'सरदेशमुखी' वसूल करने के अधिकार को स्पष्टतया स्वीकार नहीं किया, तब उसके सरदारों ने मुग़ल सीमाओं पर आक्रमण करके मुग़लों के अधीन शासकों द्वारा मुग़ल सीमाओं पर भी आक्रमण करने की ग़लत परंपरा की नींव डाली. इस प्रकार मुग़लों की समस्या को बहादुर शाह प्रथम ने और गम्भीर बना दिया. बहादुर शाह प्रथम ने मीरबख़्शी के पद पर आसीन ज़ुल्फ़िक़ार ख़ाँ को दक्कन की सूबेदारी प्रदान कर एक ही अमीर को एक साथ दो महत्त्वपूर्ण पद प्रदान करने की भूल की. उसके समय में ही वज़ीर के पद के सम्मान में वृद्धि हुई, जिसके कारण वज़ीर का पद प्राप्त करने की प्रतिस्पर्द्धा बढ़ी.

बहादुर शाह प्रथम के विषय में प्रसिद्ध लेखक 'सर सिडनी ओवन' ने लिखा है कि, "यह अन्तिम मुग़ल सम्राट था, जिसके विषय में कुछ अच्छे शब्द कहे जा सकते हैं. इसके पश्चात् मुग़ल साम्राज्य का तीव्रगामी और पूर्ण पतन मुग़ल सम्राटों की राजनीतिक तुच्छता और शक्तिहीनता का द्योतक था." सर सिडनी ओवन का कथन काफ़ी हद तक सही जान पड़ता है, क्योंकि वे मुग़ल शासक जो अपने ऐशो-आराम में ही डूबे रहते थे, जिन्हें शासन व साम्राज्य की कोई चिंता ही नहीं थी.

बहादुर शाह प्रथम के दरबार में 1711 में एक डच प्रतिनिधि शिष्टमण्डल 'जेसुआ केटेलार' के नेतृत्व में गया. इस शिष्टमण्डल का दरबार में स्वागत किया गया. इस स्वागत में एक पुर्तग़ाली स्त्री 'जुलियानी' की महत्त्वपूर्ण भूमिका थी. उसकी इस भूमिका के लिए उसे 'बीबी फिदवा' की उपाधि दी गयी. 27 फ़रवरी, 1712 को बहादुर शाह प्रथम की मृत्यु हो गयी. मृत्यु के पश्चात् उसके चारों पुत्रों, जहाँदारशाह, अजीमुश्शान, रफ़ीउश्शान और जहानशाह में उत्तराधिकार का युद्ध आरंभ हो गया. फलतः बहादुरशाह का शव 10 सप्ताह तक दफनाया नहीं जा सका.

मुग़ल बादशाह जहाँदारशाह

जहाँदारशाह बहादुरशाह प्रथम के चार पुत्रों में से एक था. बहादुरशाह प्रथम के मरने के बाद उसके चारों पुत्रों 'जहाँदारशाह', 'अजीमुश्शान', 'रफ़ीउश्शान' एवं 'जहानशाह' में उत्तराधिकार के लिए संघर्ष छिड़ गया. इस संघर्ष में ज़ुल्फ़िक़ार ख़ाँ के सहयोग से जहाँदारशाह के अतिरिक्त बहादुरशाह प्रथम के अन्य तीन पुत्र आपस में संघर्ष के दौरान मारे गये. 51 वर्ष की आयु में जहाँदारशाह 29 मार्च, 1712 को मुग़ल राजसिंहासन पर बैठा. ज़ुल्फ़िक़ार ख़ाँ इसका प्रधानमंत्री नियुक्त किया गया, तथा असद ख़ाँ 'वकील-ए-मुतलक़' के पद पर बना रहा. ये दोनों बाप-बेटे ईरानी अमीरों के नेता थे.

जहाँदारशाह के शासन काल के बारे में इतिहासकार 'खफी ख़ाँ' का कहना है, "नया शासनकाल चारणों और गायकों, नर्तकों एवं नाट्यकर्मियों के समस्त वर्गों के लिए बहुत अनुकूल था." जहाँदारशाह ने सिर्फ़ 1712 से 1713 ई. तक ही शासन किया. जहाँदारशाह के शासनकाल में प्रशासन की पूरी बागडोर ज़ुल्फ़िक़ार ख़ाँ के हाथों में थी. दरबार में अपनी स्थिति मज़बूत बनाने तथा साम्राज्य को बचाने के लिए यह आवश्यक था कि, राजपूत राजाओं तथा मराठों के साथ मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध स्थापित किया जाय. इसलिए उसने राजपूतों की तरफ़ मैत्रीपूर्ण क़दम बढ़ाते हुये, आमेर के जयसिंह को मालवा का सूबेदार नियुक्त किया, तथा 'मिर्जा राजा' की पदवी दी. मारवाड़ के अजीत सिंह को 'महाराजा' की पदवी दी और गुजरात का शासक नियुक्त किया. उसने जजिया कर को भी समाप्त कर दिया.

ज़ुल्फ़िक़ार ख़ाँ ने चूड़ामन जाट तथा छत्रसाल बुन्देला के साथ भी मेल-मिलाप किया तथा केवल बन्दा बहादुर के विरुद्ध दमन की नीति को जारी रखा. जागीरों और ओहदों की अंधाधुंध वृद्धि पर रोक लगाकार ज़ुल्फ़िक़ार ख़ाँ ने साम्राज्य की वित्तीय स्थिति को सुधारने का प्रयास किया, किन्तु उसने एक ग़लत प्रवृत्ति 'इजारा व्यवस्था' को बढ़ावा दिया. इसके अन्तर्गत एक निश्चित दर पर भू-राजस्व वसूल करने के बदले में सरकार ने 'इजारेदार' (लगान के ठेकेदारों) और बिचैलियों के साथ यह करार करना आरम्भ कर दिया था कि, वे सरकार को एक निश्चित मुद्रा राशि दें. बदले में किसानों से जितना लगान वसूल कर सकें, उतना वसूलने के लिए उन्हें आज़ाद छोड़ दिया गया. इससे किसानों का उत्पीड़न बढ़ा. ज़ुल्फ़िक़ार ख़ाँ वज़ीर की शक्ति में वृद्धि करके शक्तिशाली होना चाहता था, जिसके कारण शाही सामंतों ने ज़ुल्फ़िक़ार ख़ाँ के विरुद्ध षड़यंत्र करना प्रारंभ कर दिया. ज़ुल्फ़िक़ार ख़ाँ ने अपने सारे प्रशासनिक दायित्व अपने एक नजदीकी व्यक्ति 'सुभगचन्द्र' के हाथों में दे दिया था.

मुग़ल बादशाह फर्रुखशियर

फ़र्रुख़सियर एक मुग़ल बादशाह था जिसने 1713 से 1719 तक हिन्दुस्तान पर हुकूमत की. उसका पूरा नाम अब्बुल मुज़फ़्फ़रुद्दीन मुहम्मद शाह फ़र्रुख़ सियर था. 1715 ई. में अंग्रेजो का एक शिष्टमंडल जाॅन सुरमन की नेतृत्व में भारत आया. यह शिष्टमंडल उत्तरवर्ती मुग़ल शासक फ़र्रूख़ सियर की दरबार में 1717 ई. में पहुँचा. उस समय फ़र्रूख़ सियर जानलेवा घाव से पीड़ित था. इस शिष्टमंडल में हैमिल्टन नामक डाॅक्टर थे जिन्होनें फर्रखशियर का इलाज किया था. इससे फ़र्रूख़ सियर खुश हुआ तथा अंग्रेजों को भारत में कहीं भी व्यापार करने की अनुमति तथा अंग्रेज़ों द्वारा बनाऐ गए सिक्के को भारत में सभी जगह मान्यता प्रदान कर दिया गया. फ़र्रूख़ सियर द्वारा जारी किये गए इस घोषणा को ईस्ट इंडिया कंपनी का मैग्ना कार्टा कहा जाता है. मैग्ना कार्टा सर्वप्रथम 1215 ई. में ब्रिटेन में जाॅन-II के द्वारा जारी हुआ था.

फर्रुखशियर के पिता अजीम ओशान की 1712 में जहांदर शाह द्वारा हत्या कर दी गई थी और जहांदर शाह ने उनके पिता की मृत्यु कर मुगल सम्राट बने थे अपने पिता की मौत का बदला लेने के लिए फर्रूखसियर ने 10 जनवरी 1713 में समूगढ के युद्ध में जहांदरशाह की सेनाओं को पराजित किया और उसकी हत्या कर दी और दिल्ली पहुंचकर लाल किले पर अपने आप को मुगल साम्राट घोषित किया. इस प्रकार उन्होंने अपने पिता की मौत का बदला ले लिया. अपने पूरे 6 वर्ष के कार्यकाल में फर्रूखसियर सैयद बंधुओं के चंगुल से आजाद ना हो सके. उन्होंने सैयद हुसैन अली खान को अपना वजीर घोषित किया जबकि वह उसको वजीर घोषित नहीं करना चाहते थे परंतु शायद बंधुओं के दबाव पर उन्होंने उसको अपना वजीर घोषित किया. उन्होंने अजीत सिंह के रोकने का पूर्ण प्रयत्न किया परंतु अजीत सिंह को रोकने में सफल नहीं रहे क्योंकि लगातार दक्षिण भारत में व्यस्त रहने के कारण उत्तर भारत में कई राजपूत एवं जाट शक्तियां वापस बनाई थी 1615 मे अजीत सिंह की बेटी से विवाह कर अजीत सिंह को रोक लिया परंतु बंदा सिंह बहादुर ग्रुप से उनको बड़ी मेहनत करनी पड़ रही थी. बंदा सिंह बहादुर ने 1708 में मुगलों के नाक में दम कर रखा था परंतु 1716 में उन्होंने बंदा सिंह बहादुर को पकड़ लिया और 40 सिखों की हत्या कर दी. बाद में उन्होंने बंदा सिंह बहादुर को पराजित कर उसकी दोनों आंखें फोड़ दी और उनकी खाल निकाल ली और बहुत ही बुरी तरीके से उनके शरीर के टुकड़े-टुकड़े कर दिए. इसे पूरे सिख लोगों में मुगलों के विरुद्ध एक आक्रोश की भावना पैदा हो गयी.

मराठों के विरुद्ध भी फर्रूखसियर की नीति कुछ अलग थी. सैयद हुसैन अली खान जो कि वजीर था वह फर्रूखसियर को अपना गुलाम बनाना चाहता था परंतु फर्रूखसियर ने उसके आदेशों को ना मानना शुरू कर दिया, जिसके तहत उसने ढक्कन में मराठों से सहायता मांगी. उसने मराठों को दक्कन में सरदेशमुखी और चौथ वसूलने के लिए इजाजत दे दी जिससे फर्रूखसियर काफी नाराज हो गया. फर्रुखशेयर ने अता हुसैन अली को पराजित करने का फैसला किया परंतु ऐसा करने में सफल नहीं हो सका क्योंकि सैयद बंधु बहुत ही ताकतवर मंत्री थे और उनका प्रभाव संपूर्ण मुगल दरबार में था. हुसैन अली बहुत ही ताकतवर मंत्री था अंततः उसने मराठों से संबंध स्थापित किए और 1719 में फर्रुखसियार का वध करवा दिया गया. किसी ना किसी कारणों से उस वक्त उनकी उम्र मात्र 33 वर्ष की थी और उसके बाद उसने दो मुगल सम्राटों के छोटे-छोटे कार्यकाल के लिए गद्दी पर बैठाया और इससे अपनी ताकत को और बढ़ाया. कोई भी मुगल सम्राट सैयद बंधु के चंगुल से बच नहीं पा रहा था अंततः मोहम्मद शाह ने 1719 में मुगल सम्राट बने. उन्होंने चीनकिलिच खां यानी आशाफ जा प्रथम जो कि बाद में चलकर हैदराबाद के निजाम बने उनकी सहायता लेकर सैयद बंधुओं को खत्म किया 1723 में और एक स्वतंत्र मुगल सम्राट के रूप में उभरे. सम्राट बनने के बाद मुगल साम्राज्य कुछ खास विस्तार नहीं किया बल्कि मुगल साम्राज धीरे-धीरे खत्म होना शुरू हो गया.

मुग़ल सम्राज्य (1719 से 1857)

रफ़ी उद-दाराजात अथवा रफ़ीउद्दाराजात अथवा रफ़ी उद-दर्जत का जन्म- 1 दिसम्बर, 1699 को हुआ था और वह दसवाँ मुग़ल बादशाह था. वह रफ़ी उस-शहान का पुत्र तथा अज़ीमुश्शान का भाई था. फ़र्रुख़सियर के बाद 28 फ़रवरी, 1719 को सैयद बंधुओं के द्वारा उसे बादशाह घोषित किया गया था. बादशाह रफ़ी उद-दाराजात बहुत ही अल्प समय (28 फ़रवरी से 4 जून, 1719 ई.) तक ही शासन कर सका. सैय्यद बन्धुओं ने फ़र्रुख़सियर के विरुद्ध षड़यन्त्र रचकर 28 अप्रैल, 1719 को गला घोंट कर उसकी हत्या कर दी. मुग़ल साम्राज्य के इतिहास में किसी अमीर द्वारा किसी मुग़ल बादशाह की हत्या का यह पहला उदाहरण था. इसके बाद सैय्यद बन्धुओं ने रफ़ी उद-दाराजात को सिंहासन पर बैठाया. रफ़ी उद-दाराजात सबसे कम समय तक शासन करने वाला मुग़ल बादशाह था. इसके काल की उल्लेखनीय घटना 'नेकसियर' का विद्रोह था. नेकसियर को विरोधियों ने सम्राट घोषित कर आगरा की गद्दी पर बैठा दिया था. नेकसियर अकबर द्वितीय का पुत्र था. रफ़ी उद-दाराजात की मृत्यु क्षय रोग के कारण हुई.

रफ़ीउद्दाराजात की मृत्यु के बाद मुग़ल साम्राज्य में हस्तक्षेप की नीति अपनाने वाले सैय्यद बन्धुओं ने रफ़ीउद्दौला को दिल्ली में मुग़ल वंश की गद्दी पर बैठा दिया. गद्दी पर बैठने के बाद रफ़ीउद्दौला ने 'शाहजहाँ शानी', 'शाहजहाँ द्वितीय' की उपाधियाँ धारण कीं. रफ़ीउद्दौला मुग़ल वंश का 11वाँ बादशाह था. वह जून, 1719 से सितम्बर, 1719 ई. (4 महीने) तक ही मुग़ल साम्राज्य का बादशाह रहा. वह दूसरा सबसे कम समय तक शासन करने वाला मुग़ल सम्राट था. अपने भाई रफ़ीउद्दाराजात की भाँति रफ़ीउद्दौला भी सैयद बन्धुओं के हाथ की कठपुतली ही बना रहा. अल्प काल के समय में ही सैयद बन्धुओं ने उसे भी गद्दी से उतार दिया. जिस प्रकार रफ़ीउद्दाराजात की मृत्यु क्षय रोग के कारण हुई, उसी प्रकार इसकी मृत्यु भी पेचिश रोग के कारण हुई. जबकि कुछ इतिहासकारों का यह मानना है कि उसकी हत्या कर दी गई थी.

रफ़ीउद्दाराजात की मृत्यु के बाद नेकसियर मुग़ल वंश का 12वाँ बादशाह बना. वह चालीस वर्ष की आयु में 1719 ई. में मुग़ल राजगद्दी पर बैठा. नेकसियरऔरंगज़ेब का पौत्र और अकबर द्वितीय का पुत्र था. वह उन पाँच कठपुतली बादशाहों में से तीसरा था, जिन्हें सैयद बन्धुओं ने सिंहासनासीन किया था. सैयद बन्धुओं ने उसे 1719 ई. में दिल्ली में मुग़ल गद्दी का अधिकारी बनाया था. नेकसियर केवल थोड़े दिनों के लिए ही बादशाह बन पाया. मुहम्मद इब्राहीम को राजगद्दी पर बैठाने के लिए सैयद बन्धुओं ने उसे गद्दी से उतार दिया.

नेकसियर के बाद मुहम्मद इब्राहीम मुग़ल वंश का 13वाँ बादशाह बना. वह सैयद बन्धुओं द्वारा 1719 ई. में मुग़ल साम्राज्य का शासक बनाया गया था. मुहम्मद इब्राहीम बहादुरशाह प्रथम के तीसरे पुत्र रफ़ीउश्शान का पुत्र था. सैयद बन्धुओं ने जिन चार नाममात्र के मुग़ल बादशाहों को गद्दी पर बैठाया था, यह उनमें से एक था. इसे भी कुछ समय बाद ही सैयद बन्धुओं ने गद्दी से उतार दिया, और धोखे से मरवा दिया. उस समय दिल्ली के बादशाहों को बनाना और बिगाड़ना इन सैयद बन्धुओं के हाथों में ही था. इसीलिए सैयद बन्धु भारत के इतिहास में बादशाह बनाने वालों के नाम से मशहूर हैं.

मुहम्मुमद इब्हराहीम के बाद मुहम्मदशाह रौशन अख़्तर मुग़ल वंश का 14वाँ बादशाह बना. उसने लम्बे समय 1719 से 1748 ई. तक मुग़ल साम्राज्य पर शासन किया. वह जहानशाह का चौथा बेटा था. मुहम्मदशाह के शासन काल में बंगाल, बिहार तथा उड़ीसा में मुर्शिद कुली ख़ाँ, अवध में सआदत ख़ाँ तथा दक्कन में निजामुलमुल्क ने अपनी स्वतंत्र सत्ता स्थापित कर लीं. इसके अतिरिक्त इसके काल में गंगा तथा दोआब क्षेत्र में रोहिला सरदारों ने भी अपनी स्वतंत्र सत्ता स्थापित कर ली थी. मुहम्मदशाह अयोग्य शासक था. वह अपना अधिकांश समय पशुओं की लड़ाई देखने तथा वेश्याओं और मदिरा के बीच गुजारता था. इसी कारण उसे 'रंगीला' के उपनाम से भी जाना जाता था.

इसके दरबार में सैय्यद बन्धुओं के बढ़ते हुए प्रभुत्व के कारण एक रोष उत्पन्न हुआ तथा उन्हें समाप्त करने का षडयंत्र किया गया. इस षडयंत्र में ईरानी दल का नेता मुहम्मद अमीन ख़ाँ, मुहम्मदशाह तथा राजमाता कुदसिया बेगम शामिल थीं. 8 अक्टूबर, 1720 को हैदर बेग़ ने छुरा घोपकर हुसैन अली की हत्या कर दी. अपने भाई का बदला लेने के लिए अब्दुल्ला ख़ाँ ने विशाल सेना लेकर मुहम्मदशाह के विरुद्ध चढ़ाई कर दी. 13 नवम्बर, 1720 को हसनपुर के स्थान पर अब्दुल्ला ख़ाँ हार गया, उसे बन्दी बना लिया गया और विष देकर मार डाला गया. इस प्रकार मुहम्मदशाह के शासनकाल में सैय्यद बन्धुओं का पूरी तरह से अन्त हो गया. फ़ारस के शासक नादिरशाह ने 1739 में मुहम्मदशाह के समय में ही दिल्ली पर आक्रमण किया था. बाजीराव प्रथम के नेतृत्व में 500 घुड़सवार लेकर मार्च, 1737 ई. में उसने दिल्ली पर चढ़ाई की, परन्तु सम्राट ने इसका कोई विरोध नहीं किया.

मुहम्मद शाह रौशन के बाद इसका बेटा अहमद शाह बहादुर 1748 में 23 वर्ष की आयु में 15वां मुगल सम्राट बना. इसकी माता उधमबाई थी, जो कुदसिया बेगम के नाम से प्रसिद्ध थीं. अहमद शाह बहादुर बचपन से ही काफी लाड-प्यार में बड़े हुए. इस समय मुगल साम्राज्य अपने आप में कमजोर होता जा रहा था और कम नेतृत्व क्षमता साफ तौर पर नजर आ रही थी जिसके कारण फिरोज जंग तृतीय नामक एक वजीर का उदय हुआ और बाद में 1754 में उसने अहमद शाह बहादुर को अपनी ताकत के दम पर कैद कर लिया और आलमगीर को सम्राट बनाया. अहमदशाह बचपन से ही आलसी थे. उनको तलवारबाजी चलाना नहीं आता था. अपनी माता कोदिया बेगम के और अपने पिता मोहम्मदशाह के बलबूते के दम पर उन्हें सम्राट की प्राप्त हुई थी. सम्राट बनने के बाद ये हमेशा हरम में लिप्त रहते थे जिसके कारण उनका ध्यान शासन की ओर नहीं जाता था. उन्होंने सफदरजंग को अवध का नवाब घोषित किया और अपनी सारी शक्तियां अपने वजीर के हाथ में दे दी. जिसके कारण बाद में फिरोजजंग ने सदाशिव राव भाऊ जो कि मराठा सरदार थे उनकी सहायता से अहमद शाह बहादुर को कैद कर लिया और वहां उनको और उनकी माता कुदसिया बेगम को अंधा कर दिया गया. इस घटना के बाद जनवरी 1775 में सामान्य तौर पर उनकी मृत्यु हो गई.

अहमद शाह बहादुर के बाद अज़ीज़-उद्दीन आलमगीर द्वितीय 3 जून 1754 को मुगल सम्राट बना. ये जहांदार शाह का पुत्र था. 1754 में इमाद उल मुल्क की मदद से जो कि उस वक्त काफी ताकतवर मुगल मंत्री था उसकी सहायता से आलमगीर द्वितीय ने सत्ता प्राप्त की और उन्होंने अपना संपूर्ण जीवन जेल में ही काटा था. जिसके कारण इन को सत्ता चलाने या फिर मंत्रियों को काबू में रखने की क्षमता नहीं थी और उनके पास किसी भी तरीके का सैन्य ज्ञान भी नहीं था. जिसके कारण ही इमाद उल मूल्क पर ही उन्हें सभी कार्य करना पड़ता था. आलमगीर द्वितीय एक बहुत ही कमजोर और दूरदर्शी शासक था. 1756 में मराठों के प्रभाव से बचने के लिए उन्होंने फ्रेंच ईस्ट इंडिया कंपनी से मदद मांगी. इन्होंने उत्तर भारत में अहमद शाह दुर्रानी के आक्रमणों को रोकने के लिए अपनी बेटी का विवाह तिमुर शाह दुर्रानी जो कि अहमद शाह का पुत्र था उसके साथ कर दिया और दुर्रानी साम्राज्य के साथ मैत्रीपूर्ण संबंध स्थापित किए. आलमगीर द्वितीय बहुत ही कमजोर शासक थे उन्होंने मोहम्मद शाह की पुत्री का विवाह अहमद शाह दुर्रानी से करवा दिया. 1757 ईस्वी में अली वर्दी खान की मृत्यु हो गई जो कि बंगाल के नवाब थे और सिराजुद्दोला उनके बाद नबाव बने. सिराजुद्दौला को 1757 ईस्वी में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने प्लासी के युद्ध में हरा दिया जिसके बाद मीर जाफरको नवाब घोषित किया गया. परंतु आलमगीर द्वितीय इस बात से नाखुश थे परंतु इमादुल मुलक की तानाशाही की वजह से मीर जाफर को बंगाल का नवाब घोषित कर दिया गया.

अपनी ताकत को बढ़ाने के लिए उसने इमिद उल मुलक को खत्म करना ही सही समझा जिसके बाद उसने सदाशिवराव भाऊ को दिल्ली में आने का न्योता दिया. इससे इमाद उल मुल्क और नजीब खान रोहिल्ला दोनों ही आलमगीर द्वितीय से काफी ना खुश हो गए. जिसके बाद उन दोनों ने साजिश रचकर 1759 ईस्वी में आलमगीर द्वितीय की हत्या करवा दी. जिसके बाद उनके पुत्र शाह आलम द्वितीय वहां से भाग निकला और वहां से भाग कर पटना की ओर भाग गया. उसके बाद उन्होंने शाहजहां तृतीय को वापस मुगल सम्राट बनाया. ये मुहम्मद कम बख्श का ज्येष्ठ पुत्र था, जो औरंगज़ेब का कनिष्ठ पुत्र था.

इस घटना के बाद शाह आलम द्वितीय अपने पिता की मौत का बदला लेने के लिए इमाद उल मुल्क और शाहजहां तृतीय के विरुद्ध षड्यंत्र रचना शुरू कर दिया. उन्होंने अपनी एक बहुत बड़ी सेना बनाई और शाहजहां तृतीय और इमादउल मुलक को हटाने के लिए सदाशिवराव भाऊ से सहायता मांगी. सदाशिवराव भाऊ ने उनकी मदद की और इमादउल मुलक को खत्म कर शाहजहां तृतीय को गद्दी से हटाकर 1760 में शाह आलम को दिल्ली का मुगल सम्राट बनाया गया. इसके बाद 1760 से लेकर 1806 तक इन्होने शासन किया. 1764 में अवध के नवाब, बंगाल के नवाब और मुगल सम्राट की सेनाओं ने बक्सर के युद्ध में अंग्रेजो के खिलाफ लड़ाई भी लड़ी. बक्सर के युद्ध में उन्होंने अवध के नवाब सूजाउददौला और बंगाल के नवाब मीर कासिम और खुद को ही अपनी बड़ी मुगल सेनाओं को लेकर बक्सर में पहुंचे जहां पर उन्हें ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी की सेनाओं से उनका सामना हुआ. परंतु उस युद्ध में पराजित हुए और अंत में उन्हें 1765 में इलाहाबाद की संधि करनी पड़ी यह उनके लिए बहुत शर्मनाक हार थी. जिसके कारण मुगल सम्राट ने अंग्रेजों को बंगाल, बिहार, उड़ीसा की दीवानी इलाहाबाद की संधि के तहत अंग्रेजों को दे दी. अंग्रेजों की यह बहुत बड़ी सफलता थी और मुगल कमजोर हो गए.

1764 से लेकर 1771 ईसवी तक वे अवध के नवाब के संरक्षण में रहे उस वक्त उनके बेटे ने मुगल दरबार के सभी राज्य को संभाला. परंतु 1771 में महादजी शिंदे के नेतृत्व में मराठा सेना ने वापस उन्हें दिल्ली का सुल्तान बनाया और दिल्ली की गद्दी वापस दिलाई. महादाजी से प्रसन्न होकर उन्होंने उसे अमीरुल हमारा और वकील उल मुतल्क की उपाधि प्रदान की. उन्होंने अपनी सेना को यूरोपियन तरीके से तैयार करने की पूरी कोशिश की जिसकी कमान उन्होंने मिर्जा नजफ खान जो कि परसिया से 1740 में में भारत आए थे उनको दी. उन्होंने मुगल सेना को वापस तैयार करने की पूरी कोशिश की परंतु ऐसा करने में सफल नहीं हुए और 1771 में उनकी मृत्यु हो गई. शाह आलम का ध्यान भारतीय कला की तरफ बिल्कुल नहीं था और वह एक कमजोर शासक थे. हालांकि उन्होंने दिल्ली सल्तनत को वापस ताकतवर बनाने का पूरा प्रयास किया परंतु ऐसा करने में भी सफल नहीं हो सके.

1788 ई0 मे गुलाम कादिर जो रोहिला सरदार था उसने शाह आलम को कैद कर लिया और आलम की दोनों आंखें फोड़ दी और उनके बच्चों का रेप किया गया. कुछ बचने के लिए नदी में कूद गई. महादजी शिंदे ने जल्द से दिल्ली पर आक्रमण किया और गुलाम कादिर को खत्म कर दिया. एक बार फिर शाह आलम को बचा लिया. 1803 में एक बार फिर अंग्रेजों ने दिल्ली पर आक्रमण किया और महादाजी सिंधिया के वारिस दौलतराव शिंदे को पराजित कर दिल्ली पर अपना कब्जा कर लिया और मुगल सम्राट को कठपुतली मुगल सम्राट बना दिया. मात्र एक नाम मात्र के सम्राट और अंग्रेजों ने उनके ऊपर राज करना शुरू कर दिया. इसके तहत संपूर्ण ताकत अंग्रेजों के हाथ में चली गई 1806 मे उनकी मृत्यु हो गयी. उनका राज अपनी मृत्यु के समय से दिल्ली तक ही सीमित रह गया.

शाह आलम द्वितीय के बाद अकबर द्वितीय 1806 में अगला मुगल सम्राट बना. उन्होंने 1806 से 1837 तक शासन किया. वह शाह आलम द्वितीय के दूसरे पुत्र और बहादुर शाह ज़फ़र के पिता थे. उन्होंने हिंदू मुस्लिमों को एक करने के लिए एक नया त्योहार मनाना शुरू किया जिसको फूल वालों की सैर कहा जाता है और वह आगे चलकर उनके पुत्रों ने भी इस त्यौहार को मनाना चालू रखा और आज तक दिल्ली में त्योहार मनाया जाता है. उसके समय तक भारत का अधिकांश राज्य अंग्रेज़ों के हाथों में चला गया था और 1803 ई. में दिल्ली पर भी उनका क़ब्ज़ा हो गया. वह ईस्ट इंडिया कम्पनी की कृपा के सहारे नाम मात्र का ही बादशाह था. 1835 में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने सम्राट का अपमान करने के लिए उनके नाम के सिक्के चलाना बंद कर दिया. इस बात को लेकर वे काफी नाराज हो गए परंतु उन्होंने अंग्रेजों के साथ एक समझौता कर ली थी जिसके तहत साम्राज्य का सारा कारोबार ईस्ट इंडिया कंपनी के हाथ में था.

अकबर द्वितीय से गवर्नर-जनरल लॉर्ड हेस्टिंग्स की ओर से कहा गया कि वह कम्पनी के क्षेत्र पर अपनी बादशाहत का दावा छोड़ दे. लॉर्ड हेस्टिंग्स ने ईस्ट इंडिया कम्पनी की ओर से मुग़ल बादशाह को दी जाने वाली सहायता आदि की भी नज़रबन्दी कर दी. इसके बाद अकबर द्वितीय ने राममोहन राय को 'राजा' की उपाधि प्रदान की तथा उनसे इंग्लैंण्ड जाकर बादशाह की पेंशन बढ़ाने की सिफ़ारिश करने का आग्रह किया. इंग्लेंड की महारानी ने इस बात से साफ इंकार कर दिया और इस कारण से दिल बहुत ही दुखी हो और अंत में निजाम हैदराबाद के नवाब ने भी सम्मान करना छोड़ दिया. वह मिजा फखरू को गददी पर देखना चाहते थे परंतु वजीर और कई सारे मंत्रियों के कहने पर बहादुर शाह जफर को गददी दिलाई. जफर 1837 में मुगल सम्राट बने और अंतिम मुगल सम्राट के रूप में जाने जाते हैं. 1857 में उनकी गद्दी खत्म कर दी गई और उनको बर्मा भेज दिया गया जहां 1862 में उनकी मृत्यु हो गई. इस तरह 332 सालों से चले आये महान मुगल साम्राज्य का 1857 में अंत हो गया.