12 May 2022

मुग़ल बादशाह जहाँदारशाह

जहाँदारशाह बहादुरशाह प्रथम के चार पुत्रों में से एक था. बहादुरशाह प्रथम के मरने के बाद उसके चारों पुत्रों 'जहाँदारशाह', 'अजीमुश्शान', 'रफ़ीउश्शान' एवं 'जहानशाह' में उत्तराधिकार के लिए संघर्ष छिड़ गया. इस संघर्ष में ज़ुल्फ़िक़ार ख़ाँ के सहयोग से जहाँदारशाह के अतिरिक्त बहादुरशाह प्रथम के अन्य तीन पुत्र आपस में संघर्ष के दौरान मारे गये. 51 वर्ष की आयु में जहाँदारशाह 29 मार्च, 1712 को मुग़ल राजसिंहासन पर बैठा. ज़ुल्फ़िक़ार ख़ाँ इसका प्रधानमंत्री नियुक्त किया गया, तथा असद ख़ाँ 'वकील-ए-मुतलक़' के पद पर बना रहा. ये दोनों बाप-बेटे ईरानी अमीरों के नेता थे. 

जहाँदारशाह के शासन काल के बारे में इतिहासकार 'खफी ख़ाँ' का कहना है, "नया शासनकाल चारणों और गायकों, नर्तकों एवं नाट्यकर्मियों के समस्त वर्गों के लिए बहुत अनुकूल था." जहाँदारशाह ने सिर्फ़ 1712 से 1713 ई. तक ही शासन किया. जहाँदारशाह के शासनकाल में प्रशासन की पूरी बागडोर ज़ुल्फ़िक़ार ख़ाँ के हाथों में थी. दरबार में अपनी स्थिति मज़बूत बनाने तथा साम्राज्य को बचाने के लिए यह आवश्यक था कि, राजपूत राजाओं तथा मराठों के साथ मैत्रीपूर्ण सम्बन्ध स्थापित किया जाय. इसलिए उसने राजपूतों की तरफ़ मैत्रीपूर्ण क़दम बढ़ाते हुये, आमेर के जयसिंह को मालवा का सूबेदार नियुक्त किया, तथा 'मिर्जा राजा' की पदवी दी. मारवाड़ के अजीत सिंह को 'महाराजा' की पदवी दी और गुजरात का शासक नियुक्त किया. उसने जजिया कर को भी समाप्त कर दिया.

 ज़ुल्फ़िक़ार ख़ाँ ने चूड़ामन जाट तथा छत्रसाल बुन्देला के साथ भी मेल-मिलाप किया तथा केवल बन्दा बहादुर के विरुद्ध दमन की नीति को जारी रखा. जागीरों और ओहदों की अंधाधुंध वृद्धि पर रोक लगाकार ज़ुल्फ़िक़ार ख़ाँ ने साम्राज्य की वित्तीय स्थिति को सुधारने का प्रयास किया, किन्तु उसने एक ग़लत प्रवृत्ति 'इजारा व्यवस्था' को बढ़ावा दिया. इसके अन्तर्गत एक निश्चित दर पर भू-राजस्व वसूल करने के बदले में सरकार ने 'इजारेदार' (लगान के ठेकेदारों) और बिचैलियों के साथ यह करार करना आरम्भ कर दिया था कि, वे सरकार को एक निश्चित मुद्रा राशि दें. बदले में किसानों से जितना लगान वसूल कर सकें, उतना वसूलने के लिए उन्हें आज़ाद छोड़ दिया गया. इससे किसानों का उत्पीड़न बढ़ा. ज़ुल्फ़िक़ार ख़ाँ वज़ीर की शक्ति में वृद्धि करके शक्तिशाली होना चाहता था, जिसके कारण शाही सामंतों ने ज़ुल्फ़िक़ार ख़ाँ के विरुद्ध षड़यंत्र करना प्रारंभ कर दिया. ज़ुल्फ़िक़ार ख़ाँ ने अपने सारे प्रशासनिक दायित्व अपने एक नजदीकी व्यक्ति 'सुभगचन्द्र' के हाथों में दे दिया था.

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