30 May 2022

कबीरदास

संत कबीरदास हिंदी साहित्य के भक्ति काल के इकलौते ऐसे कवि हैं, जो आजीवन समाज और लोगों के बीच व्याप्त आडंबरों पर कुठाराघात करते रहे. वह कर्म प्रधान समाज के पैरोकार थे और इसकी झलक उनकी रचनाओं में साफ़ झलकती है. लोक कल्याण हेतु ही मानो उनका समस्त जीवन था. कबीर को वास्तव में एक सच्चे विश्व - प्रेमी का अनुभव था. कबीर की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि उनकी प्रतिभा में अबाध गति और अदम्य प्रखरता थी. समाज में कबीर को जागरण युग का अग्रदूत कहा जाता है. कबीरदास के जन्म के संबंध में अनेक किंवदन्तियाँ हैं. कबीर पन्थियों की मान्यता है कि कबीर का जन्म काशी में लहरतारा तालाब में उत्पन्न कमल के मनोहर पुष्प के ऊपर बालक के रूप में हुआ. कुछ लोगों का कहना है कि वे जन्म से मुसलमान थे और युवावस्था में स्वामी रामानंद के प्रभाव से उन्हें हिन्दू धर्म की बातें मालूम हुईं. 

एक दिन, एक पहर रात रहते ही कबीर पंचगंगा घाट की सीढ़ियों पर गिर पड़े. रामानन्द जी गंगा स्नान करने के लिये सीढ़ियाँ उतर रहे थे कि तभी उनका पैर कबीर के शरीर पर पड़ गया. उनके मुख से तत्काल `राम-राम' शब्द निकल पड़ा. उसी राम को कबीर ने दीक्षा-मन्त्र मान लिया और रामानन्द जी को अपना गुरु स्वीकार कर लिया. कबीर का अधिकांश जीवन काशी में व्यतीत हुआ. वे काशी के जुलाहे के रूप में ही जाने जाते हैं. कई बार कबीरपंथियों का भी यही विश्वास है कि कबीर का जन्म काशी में हुआ. किंतु किसी प्रमाण के अभाव में निश्चयात्मकता अवश्य भंग होती है. बहुत से लोग आजमगढ़ ज़िले के बेलहरा गाँव को कबीर साहब का जन्मस्थान मानते हैं. वे कहते हैं कि ‘बेलहरा’ ही बदलते-बदलते लहरतारा हो गया. फिर भी पता लगाने पर न तो बेलहरा गाँव का ठीक पता चला पाता है और न यही मालूम हो पाता है कि बेलहरा का लहरतारा कैसे बन गया और वह आजमगढ़ ज़िले से काशी के पास कैसे आ गया ? वैसे आजमगढ़ ज़िले में कबीर, उनके पंथ या अनुयायियों का कोई स्मारक नहीं है.

कबीर के माता- पिता के विषय में भी एक राय निश्चित नहीं है. "नीमा' और "नीरु' की कोख से यह अनुपम ज्योति पैदा हुई थी, या लहर तालाब के समीप विधवा ब्राह्मणी की पाप- संतान के रुप में आकर यह पतितपावन हुए थे, ठीक तरह से कहा नहीं जा सकता है. कई मत यह है कि नीमा और नीरु ने केवल इनका पालन- पोषण ही किया था. एक किवदंती के अनुसार कबीर को एक विधवा ब्राह्मणी का पुत्र बताया जाता है, जिसको भूल से रामानंद जी ने पुत्रवती होने का आशीर्वाद दे दिया था. एक जगह कबीर ने कहा है :- "जाति जुलाहा नाम कबीरा बनि बनि फिरो उदासी.' कबीर के एक पद से प्रतीत होता है कि वे अपनी माता की मृत्यु से बहुत दु:खी हुए थे. उनके पिता ने उनको बहुत सुख दिया था. वह एक जगह कहते हैं कि उसके पिता बहुत "गुसाई' थे. ग्रंथ साहब के एक पद से विदित होता है कि कबीर अपने वयनकार्य की उपेक्षा करके हरिनाम के रस में ही लीन रहते थे.

कबीर पढ़े-लिखे नहीं थे- अपनी अवस्था के बालकों से एकदम भिन्न रहते थे. कबीरदास की खेल में कोई रुचि नहीं थी. मदरसे भेजने लायक़ साधन पिता-माता के पास नहीं थे. जिसे हर दिन भोजन के लिए ही चिंता रहती हो, उस पिता के मन में कबीर को पढ़ाने का विचार भी न उठा होगा. यही कारण है कि वे किताबी विद्या प्राप्त न कर सके.  उन्होंने स्वयं ग्रंथ नहीं लिखे, मुँह से बोले और उनके शिष्यों ने उसे लिख लिया. कबीर का विवाह वनखेड़ी बैरागी की पालिता कन्या 'लोई' के साथ हुआ था. कबीर को कमाल और कमाली नाम की दो संतान भी थी. ग्रंथ साहब के एक श्लोक से विदित होता है कि कबीर का पुत्र कमाल उनके मत का विरोधी था. बूड़ा बंस कबीर का, उपजा पूत कमाल. हरि का सिमरन छोडि के, घर ले आया माल. 

कबीर जी ने सोचा कि गुरु किये बिना काम बनेगा नहीं. उस समय काशी में रामानन्द नाम के संत बड़े उच्च कोटि के महापुरुष माने जाते थे. कबीर जी ने उनके आश्रम के मुख्य द्वार पर आकर विनती कीः "मुझे गुरुजी के दर्शन कराओ." उस समय जात-पाँत का बड़ा आग्रह रहता था और फिर काशी ! वहाँ पण्डितों और पाण्डे लोगों का अधिक प्रभाव था. कबीर जी ने देखा कि हर रोज सुबह तीन-चार बजे स्वामी रामानन्द खड़ाऊँ पहनकर 'टप...टप....' आवाज़ करते गंगा में स्नान करने जाते हैं. कबीर जी ने गंगा के घाट पर उनके जाने के रास्ते में और सब जगह बाड़ कर दी. एक ही मार्ग रखा और उस मार्ग में सुबह के अन्धेरे में कबीर जी सो गये. गुरु महाराज आये तो अन्धेरे के कारण कबीर जी पर पैर पड़ गया. उनके मुख से उदगार निकल पड़ेः "राम... राम... राम...." कबीर जी का तो काम बन गया. गुरुजी के दर्शन भी हो गये, उनकी पादुकाओं का स्पर्श भी मिल गया और गुरुमुख से रामनाम का मंत्र भी मिल गया. अब दीक्षा में बाकी ही क्या रहा ? कबीर जी नाचते, गाते, गुनगुनाते घर वापस आये. रामनाम की और गुरुदेव के नाम की रट लगा दी. अत्यंत स्नेहपूर्वक हृदय से गुरुमंत्र का जप करते, गुरुनाम का कीर्तन करते साधना करने लगे. जो महापुरुष जहाँ पहुँचे हैं वहाँ की अनुभूति उनका भावपूर्ण हृदय से चिन्तन करने वाले को भी होने लगती है. 

काशी के पण्डितों ने देखा कि यवन का पुत्र कबीर रामनाम जपता है, रामानन्द के नाम का कीर्तन करता है ! उस यवन को रामनाम की दीक्षा किसने दी ? क्यों दी ? मंत्र को भ्रष्ट कर दिया ! पण्डितों ने कबीर से पूछा:- "रामनाम की दीक्षा तेरे को किसने दी ?" "स्वामी रामानन्दजी महाराज के श्रीमुख से मिली।" "कहाँ दी ?" "सुबह गंगा के घाट पर." पण्डित रामानन्द जी के पास पहुँचे और कहा कि आपने यवन को राममंत्र की दीक्षा देकर मंत्र को भ्रष्ट कर दिया, सम्प्रदाय को भ्रष्ट कर दिया. गुरु महाराज ! यह आपने क्या किया ? गुरु महाराज ने कहा- "मैंने तो किसी को दीक्षा नहीं दी." "वह यवन जुलाहा तो रामानन्द..... रामानन्द.... मेरे गुरुदेव रामानन्द" की रट लगाकर नाचता है, आपका नाम बदनाम करता है." "भाई ! मैंने उसको कुछ नहीं कहा. उसको बुलाकर पूछा जाय, पता चल जायेगा." काशी के पण्डित इकट्ठे हो गये. कबीर जी को बुलाया गया. गुरु महाराज मंच पर विराजमान हैं. सामने विद्वान् पण्डितों की सभा बैठी है. रामानन्दजी ने कबीर से पूछाः "मैंने तुझे कब दीक्षा दी ? मैं कब तेरा गुरु बना ?" कबीर जी बोलेः "महाराज ! उस दिन प्रभात को आपने मेरे को पादुका का स्पर्श कराया और राममंत्र भी दिया, वहाँ गंगा के घाट पर." रामानन्द जी कुपित से हो गये. कबीर जी को अपने सामने बुलाया और गरज कर बोलेः "मेरे सामने तू झूठ बोल रहा है ? सच बोल...." "प्रभु ! आपने ही मुझे प्यारा रामनाम का मंत्र दिया था...."  रामानन्दजी को गुस्सा आ गया. खडाऊँ उठाकर दे मारी कबीर जी के सिर पर. "राम... राम...राम....! इतना झूठ बोलता है....." 

कबीर जी बोल उठेः "गुरु महाराज ! तबकी दीक्षा झूठी तो अबकी तो सच्ची...! मुख से रामनाम का मंत्र भी मिल गया और सिर में आपकी पावन पादुका का स्पर्श भी हो गया." स्वामी रामानन्द जी उच्च कोटि के संत-महात्मा थे. घड़ी भर भीतर गोता लगाया, शांत हो गये. फिर पण्डितों से कहाः "चलो, यवन हो या कुछ भी हो, मेरा पहले नम्बर का शिष्य यही है." ब्रह्मनिष्ठ सत्पुरुषों की विद्या या दीक्षा प्रसाद खाकर मिले तो भी बेड़ा पार करती है और मार खाकर मिले तो भी बेड़ा पार कर देती है. कबीर ने काशी के पास मगहर में देह त्याग दी. ऐसी मान्यता है कि मृत्यु के बाद उनके शव को लेकर विवाद उत्पन्न हो गया था. हिन्दू कहते थे कि उनका अंतिम संस्कार हिन्दू रीति से होना चाहिए और मुस्लिम कहते थे कि मुस्लिम रीति से. इसी विवाद के चलते जब उनके शव पर से चादर हट गई, तब लोगों ने वहाँ फूलों का ढेर पड़ा देखा. बाद में वहाँ से आधे फूल हिन्दुओं ने ले लिए और आधे मुसलमानों ने. मुसलमानों ने मुस्लिम रीति से और हिंदुओं ने हिंदू रीति से उन फूलों का अंतिम संस्कार किया मगहर में कबीर की समाधि है. जन्म की भाँति इनकी मृत्यु तिथि एवं घटना को लेकर भी मतभेद हैं किन्तु अधिकतर विद्वान् उनकी मृत्यु संवत 1575 विक्रमी (सन 1518 ई.) मानते हैं, लेकिन बाद के कुछ इतिहासकार उनकी मृत्यु 1448 को मानते हैं.  

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