27 June 2022

रानी अवन्तीबाई लोधी

रानी अवन्तीबाई लोधी भारत के प्रथम स्वाधीनता संग्राम में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाली प्रथम महिला शहीद वीरांगना थीं. रानी अवन्तिबाइ लोधी का जन्म 16 अगस्त 1831 में हुआ था. 1857 की क्रांति में रामगढ़ की रानी अवंतीबाई रेवांचल में मुक्ति आंदोलन की सूत्रधार थी. 1857 के मुक्ति आंदोलन में इस राज्य की अहम भूमिका थी, जिससे भारत के इतिहास में एक नई क्रांति आई. 1817 से 1851 तक रामगढ़ राज्य के शासक लक्ष्मण सिंह थे. उनके निधन के बाद विक्रमाजीत सिंह ने राजगद्दी संभाली. उनका विवाह बाल्यावस्था में ही मनकेहणी के जमींदार राव जुझार सिंह की कन्या अवंतीबाई से 
हुआ. विक्रमाजीत सिंह बचपन से ही वीतरागी प्रवृत्ति के थे अत: राज्य संचालन का काम उनकी पत्नी रानी अवंतीबाई ही करती रहीं. उनके दो पुत्र हुए-अमान सिंह और शेर सिंह. अंग्रेजों ने तब तक भारत के अनेक भागों में अपने पैर जमा लिए थे जिनको उखाड़ने के लिए रानी अवंतीबाई ने क्रांति की शुरुआत की और भारत में पहली महिला क्रांतिकारी रामगढ़ की रानी अवंतीबाई ने अंग्रेजों के विरुद्ध ऐतिहासिक निर्णायक युद्ध किया जो भारत की आजादी में बहुत बड़ा योगदान है जिससे रामगढ़ की रानी अवंतीबाई का नाम पूरे भारत में अमरशहीद वीरांगना रानी अवंतीबाई के नाम से हैं.

रामगढ़ के राजा विक्रमाजीत सिंह को विक्षिप्त तथा अमान सिंह और शेर सिंह को नाबालिग घोषित कर रामगढ़ राज्य को हड़पने की दृष्टि से अंग्रेज शासकों ने पालक न्यायालय (कोर्ट ऑफ वार्ड्स) की कार्यवाही की एवं राज्य के प्रशासन के लिए सरबराहकार नियुक्त कर शेख मोहम्मद तथा मोहम्मद अब्दुल्ला को रामगढ़ भेजा, जिससे रामगढ़ रियासत "कोर्ट ऑफ वार्ड्स" के कब्जे में चली गयी. अंग्रेज शासकों की इस हड़प नीति का परिणाम भी रानी जानती थी, फिर भी दोनों सरबराहकारों को उन्होंने रामगढ़ से बाहर निकाल दिया. 1855 ई. में राजा विक्रमादित्य सिंह की एक दुर्घटना में मृत्यु हो गयी. अब नाबालिग पुत्रों की संरक्षिका के रूप में राज्य शक्ति रानी के हाथों आ गयी. रानी ने राज्य के कृषकों को अंग्रेजों के निर्देशों को न मानने का आदेश दिया, इस सुधार कार्य से रानी की लोकप्रियता बढ़ी.

1857 ईस्वी में सागर एवं नर्मदा परिक्षेत्र के निर्माण के साथ अंंग्रेजों की शक्ति में वृद्धि हुई. अब अंग्रेजों को रोक पाना किसी एक राजा या तालुकेदार के वश का नहीं रहा. रानी ने राज्य के आस-पास के राजाओं, परगनादारों, जमींदारों और बड़े मालगुजारों का विशाल सम्मेलन रामगढ़ में आयोजित किया, जिसकी अध्यक्षता गढ़ पुरवा के राजा शंकरशाह ने की. इस गुप्त सम्मेलन के बारे में जबलपुर के कमिश्नर मेजर इस्काइन और मण्डला के डिप्टी कमिश्नर वाडिंग्टन को भी पता नहीं था. गुप्त सम्मेलन में लिए गए निर्णय के अनुसार प्रचार का दायित्व रानी पर था. एक पत्र और दो काली चूड़ियों की एक पुड़िया बनाकर प्रसाद के रूप में वितरित करना. पत्र में लिखा गया- "अंग्रेजों से संघर्ष के लिए तैयार रहो या चूड़ियां पहनकर घर में बैठो." पत्र सौहार्द और एकजुटता का प्रतीक था तो चूड़ियां पुरुषार्थ जागृत करने का सशक्त माध्यम बनी. पुड़िया लेने का अर्थ था अंग्रेजों के विरुद्ध क्रांति में अपना समर्थन देना.

देश के कुछ क्षेत्रों में क्रांति का शुभारम्भ हो चुका था. 1857 में 52वीं देशी पैदल सेना जबलपुर सैनिक केन्द्र की सबसे बड़ी शक्ति थी. 18 जून को इस सेना के एक सिपाही ने अंग्रेजी सेना के एक अधिकारी पर घातक हमला किया. जुलाई 1857 में मण्डला के परगनादार उमराव सिंह ठाकुर ने कर देने से इनकार कर दिया और इस बात का प्रचार करने लगा कि अंग्रेजों का राज्य समाप्त हो गया. अंग्रेज, विद्रोहियों को डाकू और लुटेरे कहते थे. मण्डला के डिप्टी कमिश्नर वाडिंग्टन ने मेजर इस्काइन से सेना की मांग की. पूरे महाकौशल क्षेत्र में विद्रोहियों की हलचलें बढ़ गईं. गुप्त सभाएं और प्रसाद की पुड़ियों का वितरण चलता रहा.

इस बीच राजा शंकरशाह और राजकुमार रघुनाथ शाह को दिए गए मृत्युदण्ड से अंग्रेजों की नृशंसता की व्यापक प्रतिक्रिया हुई. वे इस क्षेत्र के राज्यवंश के प्रतीक थे. इसकी प्रथम प्रतिक्रिया रामगढ़ में हुई. रामगढ़ के सेनापति ने भुआ बिछिया थाना में चढ़ाई कर दी. जिससे थाने के सिपाही थाना छोड़कर भाग गए और विद्रोहियों ने थाने पर अधिकार कर लिया. रानी के सिपाहियों ने घुघरी पर चढ़ाई कर उस पर अपना अधिकार कर लिया और वहां के तालुकेदार धन सिंह की सुरक्षा के लिए उमराव सिंह को जिम्मेदारी सौंपी. रामगढ़ के कुछ सिपाही एवं मुकास के जमींदार भी नारायणगंज पहुंचकर जबलपुर-मण्डला मार्ग को बंद कर दिया. इस प्रकार पूरा जिला और रामगढ़ राज्य में विद्रोह भड़क चुका था और वाडिंग्टन विद्रोहियों को कुचलने में असमर्थ हो गया था. वह विद्रोहियों की गतिविधियों से भयभीत हो चुका था.

मण्डला नगर को छोड़कर पूरा जिला स्वतंत्र हो चुका था. अवंती बाई ने मण्डला विजय के लिए सिपाहियों सहित प्रस्थान किया. रानी की सूचना प्राप्त होने पर शहपुरा और मुकास के जमींदार भी मण्डला की और रवाना हुए. मण्डला पहुंचने के पूर्व खड़देवरा के सिपाही भी रानी के सिपाहियों से मिल गए. खैरी के पास अंग्रेज सिपाहियों के साथ अवंती बाई का युद्ध हुआ. वाडिंग्टन पूरी शक्ति लगाने के बाद भी कुछ न कर सका और मण्डला छोड़ सिवनी की ओर भाग गया. इस प्रकार पूरा मण्डला जिला एवं रामगढ़ राज्य स्वतंत्र हो गया. इस विजय के उपरांत आन्दोलनकारियों की शक्ति में कमी आ गई, किन्तु उल्लास में कमी नहीं आयी. रानी रामगढ़ वापस हो गईं. अंग्रेज सेनापति को अपनी जान लेकर भागना पड़ा लेकिन ब्रितानी भी हार मानने वाले नहीं थे. वाशिंगटन के नेतृत्व में अधिक सैन्यबल के साथ पुनः रामगढ़ पर आक्रमण किया गया. इस बार भी रानी के कृतज्ञ और बहादुर सैनिकों ने ब्रितानियों को मैदान छोड़ने के लिए बाध्य किया. यह युद्ध बड़ा लोमहर्षक था. दोनों तरफ के अनेक बहादुर सिपाही वीरगति को प्राप्त हुए. रानी की ललकार पर रामगढ़ की सेना दुश्मनों पर टूट पड़ती.

अवंतिका बाई के सफल नेतृत्व के कारण वाशिंगटन को पुनः मैदान छोड़ना पड़ा. रानी के सिपाही लड़ते-लड़ते थक चुके थे. राशन की कमी होने लगी. फिर भी रानी ने सैनिकों में उत्साह भरा, उनकी कठिनाइयों को दूर करने का प्रयास किया. उन्हें पता था कि ब्रितानी अपनी हार सदा स्वीकार नहीं करेंगे. नए सिरे से सैनिकों का संगठन किया गया. रानी की शंका सही सिद्ध हुई. तीसरी बार बड़ी तैयारी के साथ ब्रितानी सिपाही रामगढ़ पर टूट पड़े. घमासान युद्ध हुआ. रानी बहादुरी से लड़ीं. अनेक सिपाही मारे गए. रानी समझ गईं कि विजय भी उनके पक्ष में नहीं. वह अपने कुछ सैनिकों के साथ जंगलों की तरफ भाग गईं और गुरिल्ला युद्ध का संचालन करने लगीं. आशा थी कि रीवां नरेश रामगढ़ की मदद करेंगे. पर उन्होंने ब्रितानियों का साथ दिया. 

हिम्मत की भी हद होती है। केवल बहादुरी से काम कब तक चलता? न संगठित सेना थी, न विशाल आधुनिक शास्त्रागार ही. रानी ने अंग्रेज़ों के हाथों मरने की अपेक्षा स्वयं अपनी जान देना ज़्यादा उचित समझा. उन्होंने खुद ही अपनी तलवार से अपना सीना चीर लिया. भारत माँ को मुक्ति के लिए इस महान नारी के बलिदान को हम सदा याद रखेंगे.

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