09 June 2022

राजगुरु

शिवराम हरि राजगुरु भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के एक प्रमुख क्रान्तिकारी स्वतंत्रता सेनानी थे. इन्हें भगत सिंह और सुखदेव के साथ 23 मार्च 1931 को फाँसी पर लटका दिया गया था. भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में राजगुरु की शहादत एक महत्वपूर्ण घटना थी. शिवराम हरि राजगुरु का जन्म सन् 1908 में पुणे जिला के खेडा गाँव में हुआ था. इनके पिता का नाम श्री हरि नारायण और माता का नाम पार्वती बाई था. राजगुरु के पिता का निधन इनके बाल्यकाल में ही हो गया था. इनका पालन-पोषण इनकी माता और बड़े भैया ने किया. राजगुरु बचपन से ही बड़े वीर, साहसी और मस्तमौला थे. भारत माँ से प्रेम तो बचपन से ही था. इस कारण अंग्रेज़ों से घृणा तो स्वाभाविक ही थी. ये बचपन से ही वीर शिवाजी और लोकमान्य तिलक के बहुत बड़े भक्त थे. राजगुरु का पढ़ाई में मन नहीं लगता था, इसलिए इनको अपने बड़े भैया और भाभी का तिरस्कार सहना पड़ता था. माँ बेचारी कुछ बोल न पातीं. जब राजगुरु तिरस्कार सहते-सहते तंग आ गए, तब वे अपने स्वाभिमान को बचाने के लिए घर छोड़ कर चले गए. इन्हें कसरत (व्यायाम) का बेहद शौक था और छत्रपति शिवाजी की छापामार युद्ध-शैली के बड़े प्रशंसक थे.

घर छोड़कर जाने के बाद इन्होने सोचा की अब जबकि घर के बंधनों से स्वाधीन हूँ तो भारत माता की बेड़ियाँ काटने में अब कोई दुविधा नहीं है. वे कई दिनों तक भिन्न-भिन्न क्रांतिकारियों से भेंट करते रहे. अंत में उनकी क्रांति की नौका को चंद्रशेखर आज़ाद ने पार लगाया. चन्द्रशेखर आजाद से इतने अधिक प्रभावित हुए कि उनकी पार्टी हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी से तत्काल जुड़ गये. आजाद की पार्टी के अन्दर इन्हें रघुनाथ के छद्म-नाम से जाना जाता था, राजगुरु के नाम से नहीं. पण्डित चन्द्रशेखर आज़ाद, सरदार भगत सिंह और यतीन्द्रनाथ दास आदि क्रान्तिकारी इनके अभिन्न मित्र थे. राजगुरु एक अच्छे निशानेबाज भी थे. एक क्रांतिकारी घटना में सुखदेव, भगत सिंह व राजगुरु ने ब्रिटिश अधिकारी जॉन सॉन्डर्स की हत्या कर दी. यह घटना 17 दिसंबर 1928 को लाहौर में हुई थी. उन तीनों ने उस ब्रिटिश अधिकारी को इसलिए मारा था क्योंकि वो लाला लाजपत राय की मृत्यु का बदला लेना चाहते थे. साइमन कमीशन के विरोध के दौरान पुलिस ने लाला लाजपत राय को बहुत गहरी चोटें पहुंचाई जिसकी वजह से उनकी मृत्यु हो गई थी.

ब्रिटिश सरकार ने शिवराम राजगुरु, भगत सिंह व सुखदेव को जॉन सॉन्डर्स की हत्या के अपराध के रूप में फांसी की सजा सुनाई. सजा के मुताबिक, उन तीनों क्रांतिकारियों को 24 मार्च 1931 को फांसी होनी थी. परंतु ब्रिटिश सरकार ने लोगों के विद्रोह के भय से, फांसी की सजा की वास्तविक दिनांक से एक दिन पहले ही यानि 23 मार्च 1931 को भगत सिंह व सुखदेव सहित राजगुरु को लाहौर की जेल में फांसी दे दी. भगत सिंह, सुखदेव व राजगुरु का अंतिम संस्कार पंजाब के फिरोजपुर जिले के हुसैनवाला गांव में सतलज नदी के किनारे पर किया गया था.

जब तीनों वीर क्रांतिकारियों की मृत्यु की सूचना प्रेस व न्यूज़ में आई तब युवाओं ने ब्रिटिश सरकार के खिलाफ रोष जाहिर किया. पंजाब के फिरोजपुर जिले के हुसैनवाला गांव में शिवराम राजगुरु, भगत सिंह तथा सुखदेव के अंतिम संस्कार के बाद वहां पर स्मृति स्थल बनाया गया. प्रत्येक वर्ष 23 मार्च को राजगुरु, भगत सिंह तथा सुखदेव के सम्मान में राष्ट्र शहीद दिवस मनाया जाता है. राजगुरु के सम्मान में, उनके जन्म स्थान खेड़ का नाम बदलकर उसे “राजगुरूनगर” कर दिया गया. इसके अलावा दिल्ली विश्वविद्यालय के एक कॉलेज का नाम भी “शहीद राजगुरू कॉलेज आफ अप्लाइड साइंसेज फॉर वूमेन” रखा गया. साण्डर्स का वध करने में इन्होंने भगत सिंह तथा सुखदेव का पूरा साथ दिया था जबकि चन्द्रशेखर आज़ाद ने छाया की भाँति इन तीनों को सामरिक सुरक्षा प्रदान की थी. राजगुरु, भगत सिंह और सुखदेव का बलिदान आज भी भारत के युवकों को प्रेरणा प्रदान करता है.

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