29 May 2022

दुनिया के पहले शल्य चिकित्सक महर्षि सुश्रुत

सुश्रुत प्राचीन भारत के प्रसिद्ध चिकित्साशास्त्री तथा विश्व के पहले शल्य चिकित्सक थे. इन्हें "शल्य चिकित्सा का जनक" माना जाता है. सुश्रुत ने प्रसिद्ध चिकित्सकीय ग्रंथ 'सुश्रुत संहिता' की रचना की थी. इस ग्रंथ में शल्य क्रियाओं के लिए आवश्यक यंत्रों (साधनों) तथा शस्त्रों (उपकरणों) आदि का विस्तार से वर्णन किया गया है. 
'सुश्रुत संहिता' के प्रणेता आचार्य सुश्रुत का जन्म छठी शताब्दी ईसा पूर्व में काशी में हुआ था. उनका जन्म विश्वामित्र के वंश में हुआ था. इन्होंने धन्वन्तरि से शिक्षा प्राप्त की थी.

भारतीय चिकित्सा पद्धति में 'सुश्रुत संहिता' को विशेष स्थान प्राप्त है. इसमें शल्य चिकित्सा के विभिन्न पहलुओं को विस्तार से समझाया गया है. शल्य क्रिया के लिए सुश्रुत 125 तरह के उपकरणों का प्रयोग करते थे. ये उपकरण शल्य क्रिया की जटिलता को देखते हुए खोजे गए थे. इन उपकरणों में विशेष प्रकार के चाकू, सुइयाँ, चिमटियाँ आदि हैं. सुश्रुत ने 300 प्रकार की ऑपरेशन प्रक्रियाओं की खोज की. आठवीं शताब्दी में 'सुश्रुत संहिता' का अरबी भाषा में अनुवाद 'किताब-ए-सुश्रुत' के रूप में हुआ था. सुश्रुत ने कॉस्मेटिक सर्जरी में विशेष निपुणता हासिल कर ली थी.

एक बार आधी रात के समय सुश्रुत को दरवाजे पर दस्तक सुनाई दी. उन्होंने दीपक हाथ में लिया और दरवाजा खोला. दरवाजा खोलते ही उनकी नजर एक व्यक्ति पर पड़ी. उस व्यक्ति की आँखों से अश्रु-धारा बह रही थी और नाक कटी हुई थी. उसकी नाक से तीव्र रक्त बह रहा था. व्यक्ति ने आचार्य सुश्रुत से सहायता के लिए विनती की. सुश्रुत ने उसे अन्दर आने के लिए कहा. उन्होंने उसे शांत रहने को कहा और दिलासा दिया कि सब ठीक हो जायेगा. वे अजनबी व्यक्ति को एक साफ और स्वच्छ कमरे में ले गए. कमरे की दीवार पर शल्य क्रिया के लिए आवश्यक उपकरण टंगे थे. उन्होंने अजनबी के चेहरे को औषधीय रस से धोया और उसे एक आसन पर बैठाया. उसको एक गिलास में मद्य भरकर सेवन करने को कहा और स्वयं शल्य क्रिया की तैयारी में लग गए. उन्होंने एक पत्ते द्वारा जख्मी व्यक्ति की नाक का नाप लिया और दीवार से एक चाकू व चिमटी उतारी. चाकू और चिमटी की मदद से व्यक्ति के गाल से एक मांस का टुकड़ा काटकर उसे उसकी नाक पर प्रत्यारोपित कर दिया. इस क्रिया में होने वाले दर्द को वह व्यक्ति मद्यपान के कारण महसूस नहीं कर पाया. इसके बाद उन्होंने नाक पर टांके लगाकर औषधियों का लेप कर दिया. व्यक्ति को नियमित रूप से औषाधियाँ लेने का निर्देश देकर सुश्रुत ने उसे घर जाने के लिए कहा.

सुश्रुत नेत्र शल्य चिकित्सा भी करते थे. 'सुश्रुत संहिता' में मोतियाबिंद के ऑपरेशन करने की विधि को विस्तार से बताया गया है. उन्हें शल्य क्रिया द्वारा प्रसव कराने का भी ज्ञान था. सुश्रुत को टूटी हुई हड्डी का पता लगाने और उनको जोड़ने में विशेषज्ञता प्राप्त थी. शल्य क्रिया के दौरान होने वाले दर्द को कम करने के लिए वे मद्यपान या विशेष औषधियाँ देते थे. सुश्रुत श्रेष्ठ शल्य चिकित्सक होने के साथ-साथ श्रेष्ठ शिक्षक भी थे. उन्होंने अपने शिष्यों को शल्य चिकित्सा के सिद्धांत बताये और शल्य क्रिया का अभ्यास कराया. प्रारंभिक अवस्था में शल्य क्रिया के अभ्यास के लिए फलों, सब्जियों और मोम के पुतलों का उपयोग करते थे. मानव शरीर की अंदरूनी रचना को समझाने के लिए सुश्रुत शव के ऊपर शल्य क्रिया करके अपने शिष्यों को समझाते थे. सुश्रुत ने शल्य चिकित्सा में अद्भुत कौशल अर्जित किया तथा इसका ज्ञान अन्य लोगों को कराया. उन्होंने शल्य चिकित्सा के साथ-साथ आयुर्वेद के अन्य पक्षों, जैसे- शरीर संरचना, काया-चिकित्सा, बाल रोग, स्त्री रोग, मनोरोग आदि की जानकारी भी दी.

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